मध्य प्रदेश वन विभाग में काले अग्रेज?

बिना नियम एवं नीतियों का म.प्र. वन विभाग? 

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आपको जानना आवश्यक है कि, म.प्र. वन विभाग में जो काले अग्रेज है? उन्हें यह अहसास दिलाना जरूरी है कि, देश को आजाद हुए 73 साल हो चुके है परन्तु देश की आजादी के इतने सालो बाद भी म.प्र. वन विभाग में अग्रेजो की नीतियों का अनुश्ररण आज भी किया जा रहा है। गोरे अग्रेज देशवासियों को आर्थिक, मानसिक एवं शारीरिक रूप से हमेशा से ही प्रताड़ित करते थे। पर अब गोरे अग्रेज तो रहे नहीं किन्तु काले अग्रेज विभाग में जरूर पैदा हो गये है? जो वन विभाग में कार्यरत मजदूरो/कम्प्यूटर आपरेटर का शोषण लगातार कर रहे है। म.प्र. वन विभाग की कार्य नीतियों पर सवाल उठना लाजमी है और जो भी वन विभाग को करीब से जानता है उसके लिए यह आशचर्य भी नहीं है। वैसे भी वन विभाग के किस्से जग जाहिर है। विभाग में भ्रष्टाचार एवं अनितिगत कार्यो की ऊपर से नीचे तक कितनी ही शिकायते कर दीजिए परन्तु जब-जब शिकायत में विभाग के किसी अधिकारी का नाम आता है तो, ऐसी शिकायतो को दबा दिया जाता है या जाॅच के नाम पर लीपा-पोती शुरू हो जाती है। ऐसा होना विभाग में नया नहीं है इसके कई उदारण आपको मिल जाएंगे। म.प्र. वन विभाग में कार्यरत कम्प्यूटर आपरेटर एवं मजदूरो की गाथा कुछ ऐसी है जो, किसी से छुपी भी नहीं है। आज उनकी स्थिति ऐसी है जैसे वे ना तो घर के है, ना घाट के? और शासन के लिए तो विभाग के आपरेटर केवल आंकड़ो का खेल है। हम आपका ध्यान कम्प्यूटर आपरेटरो एवं अन्य मजदूरो की मुख्य समस्याओं की ओर आकृषित कराना चाहते है। म.प्र. वन विभाग में कम्प्यूटर आपरेटरर्स एवं अन्य मजदूर वन वृत्त कार्यालयों, वनमण्डलो, कार्य आयोजना इकाईयों, परिक्षेत्रो एवं पार्को में हजारो की संख्या में कार्यरत है जिन्हें जाॅब दर पर या कलेक्टर रेट से वेतन का भुगतान किया जाता है परन्तु इनकी स्थिति काफी दयनीय बनी हुई है। वन विभाग में कार्यरत आपरेटरो के अनुसार विभाग में उनका कोई भविष्य ही नहीं दिख रहा है कई आपरेटरर्स तो ऐसे भी है जो, विभाग में लगभग अपना सारा जीवन दे चुके है परन्तु आज तक उनका विभाग में क्या अस्तित्व है इसका कुछ पता ही नहीं है। विभाग उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेता है। वन विभाग के कम्प्यूटर आपरेटरर्स द्वारा कई बार म.प्र. शासन एवं म.प्र. वन विभाग को अपनी मांगे सौंप चुका है जिसमें नियमितिकरण की मांग मुख्य है। माननीय उच्चय न्यायालय द्वारा भी कहा गया था की जो लोग विभाग में अपनी 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर चुके है उन्हें नियमित किया जाना चाहिए। यहां तक की प्रधानमंत्री जी का भी यहीं कथन था। परन्तु केन्द्र एवं राज्य में बीजेपी की सरकार होने के वावजूद अभी तक ऐसा संभव नहीं हो पाया है यहां भी एक विडम्बना ही है। जानकारी अनुसार विभाग में कार्यरत कम्प्यूटर आपरेटरो की स्थिति ईतनी खराब है कि, यहा कार्यरत आपरेटर्स के वेतन में सालो तक वृद्धि ही नहीं होती है जबकि विभाग में कार्यरत अन्य लोकसेवको को नियमित वेतन वृद्धि एवं अन्य सुविधाएं लगातार मिलती रहती है। जिससे कार्यरत आपरेटरर्स का मनोबल दिन प्रति दिन गिरता ही जा रहा है और इस वजह से कई आपरेटर्स तो डिप्रेरेशन जैसी बिमारियों से भी झूझ रहे है। पूरे म.प्र. में कार्यरत आपरेटर्स को भिन्न-भिन्न वन वृत्तो में भिन्न-भिन्न जाॅब दर निर्धारित है और इससे बुरा हाल तो कार्य आयोजना इकाईयों में कार्यरत जी.आई.एस. आपरेटर्स का है जिनके द्वारा मानचित्रों के डिजिटाईजेशन का उच्च तकनीकि कार्य करवाया जाता है परन्तु वेतन के नाम पर केवल ठगा ही जा रहा है। जबकि विभाग द्वारा मानचित्र डिजिटाईजेशन हेतु रेट पूर्व से ही निर्धारित है। जानकारी अनुसार वहीं दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी शाखा में कार्यरत जी.आई.एस. आपरेटर्स को 30 से 40 हजार रूपये मासिक वेतन एवं अन्य सुविधाएं प्रदाय की जाती है। इतना ही नहीं, हाल ही में केन्द्र सरकार द्वारा मजदूरो/कर्मचारियों हेतु उनके भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से आदेश जारी किये गये थे की ऐसे मजदूर/कर्मचारी जिनके पी.एफ./जी.पी.एफ. आदि नहीं कटते है उनका ई.पी.एफ. काटे जाना चाहिए। यह आदेश म.प्र. वन विभाग द्वारा भी जारी किया गया है परन्तु जानकारी अनुसार इतना लंबा समय गुजर जाने के उपरांत भी पूरे म.प्र. में किसी भी आपरेटर्स एवं अन्य मजदूरो का ई.पी.एफ. कटौती शुरू नहीं की गई है। जानकारी अनुसार इस संबंध में कई आपरेटर्स ने लिखित शिकायत भी की थी तथा विभाग को ई.पी.एफ. कटौती से संबंधित आवेदन भी प्रदाय किये गये थे परन्तु उसके उपरांत भी आज दिनांक तक ई.पी.एफ. कटौती शुरू नहीं की गई है। जबकि जारी आदेशों में स्पष्ट लेख है कि, यदि आदेश का पालन नहीं किया जाएगा तो संबंधित को आर्थिक दण्ड का भी प्रावधान है। इतना सब हो जाने के बाद भी विभागीय जिम्मेदार अधिकारी मौन धारण किये हुए है और आपरेटर्स एवं अन्य मजदूरो के भविष्य के साथ खुला खिलवाड़ कर रहे है। यदि इनकी जगह गोरे अग्रेज होते तो स्थिति फिर भी आज से काफी बेहतर होती ऐसा मानना है आपरेटर्स का। परन्तु विभाग में जो काले अग्रेज है वे केवल और केवल शोषण, शोषण और शोषण का रास्ता खोजते रहते है। आशचर्य की बात तो यह है कि, जिम्मेदार अधिकारी भी केवल आदेश जारी कर भूल गये है कि, ऐसा भी कोई आदेश उनके द्वारा जारी किया गया था। जिम्मेदारो ने कभी यह भी जानने की कोशिश नहीं की है कि ई.पी.एफ. से संबंधित जो आदेश जारी हुए थे उनका पालन भी किया जा रहा है अथवा नहीं? यह विडम्बना ही है कि, म.प्र. वन विभाग में आपरेटर्स एवं मजदूरो के भविष्य के साथ नंगा नाच किया जा रहा है? यदि शासन द्वारा जारी इन आदेशो पर ईमानदारी से अमल किया जाएगा तो अधिकारियों पर सीधे कार्यवाही होना स्वाभाविक है और इस नजरिये से देखा जाए तो लगभग आदे से अधिक अधिकारियों पर यह कार्यवाही होना तय है। बस यही कारण प्रतीत होता है की विभागीय जिम्मेदार अधिकारी इस आदेश की बात ही नहीं करना चाहते है। 

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