मै भी चौकीदार हूॅ?- श्री एन.के. सनोडिया, कार्य आयोजना अधिकारी, छिंदवाड़ा

म.प्र. वन विभाग भ्रष्टचार की चौपाल बन चुका है जिसमें केवल भ्रष्टाचार की ही कहानी गढ़ी जाती है। एक भ्रष्टाचार हुआ नहीं की दूसरा भ्रष्टाचार मुॅह उठाकर ताकने लगता है कि, मै भी हूॅ! मै भी हूॅ! यह कह पाना मुश्किल हो जाता है कि, कौन ईमानदार और कौन भष्ट?

वन विभाग को तो लोग वैसे भी पैसो की खान कहते है, क्योंकि कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की वजह से पूरा वन विभाग बदनाम है और विभाग में कुछ चम्मच ऐसे भी है जो चंद सिक्को के लिए इन भ्रष्ट अधिकारियों के इशारे पर काम करते है। जो इधर का उधर और इसके सर का उसके सर करते रहते है। जो दिखते तो पूर्ण रूप से लोकसेवक ही है परन्तु जब उनके बारे में पता चलता है तो, महसूस होता है कि, इनसे बड़ा कोई चम्मच भी नहीं है। चाहे विभाग की भण्डार शाखा हो, व्यय शाखा या स्थापना शाखा सभी जगह इन्हीं चम्मचों की भरमार है, और हो भी क्यों ना! क्योंकि जब किसी भ्रष्टचार में ये कर्मचारी फंसते है तो इनके आला भ्रष्ट अधिकारी ही अपनी शक्तियों का गलत उपयोग करके इन्हें बचाते है। हमारा देश भी जब गुलामी की जंजीरो में जकड़ा गया था तब भी उस गुलामी का कारण ऐसे ही चम्मच बने थे, जिसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ा था। आज हमारे देश में जो भ्रष्टाचार इतनी तेजी से फैला है और हर पग पर सिर्फ भ्रष्टचार नजर आता है इनमें इन जैसे चम्मचो का विशेष योगदार रहा है। क्योंकि यही चम्मच होते है जो नीति/नियमो को अनदेखी कर अपने अधिकारियो की मदद से भ्रष्टाचार को अंजाम देते है और अपनी एवं अपने भ्रष्ट अधिकारियों की जेबे भरते है।

ऐसी स्थिति में जब कोई भ्रष्टाचार को उजागर करता है तो, जिम्मेदार अधिकारी भी मौन साद लेते है। क्योकि उनकी जेबो में भी पैसे डाल दिये जाते है। आप समझ ही सकते है विभाग में भ्रष्टाचार कहां तक फैला हुआ होगा। ऐसे ही एक और भ्रष्टाचार की ओर आपका ध्यान आकृषित करना चाहते है। जहां भ्रष्टाचार करने का एक और तरीका पता चलेगा और आप भी सीख पाएंगे की भ्रष्टाचार कैसे-कैसे तरीके से किया जा सकता है?

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अब यह मामला ही देख लिजिए जहां 4 कमरो का एक आॅफिस है परन्तु चौकीदार कई है। जी हाॅ! “कार्यालय एक और चौकीदार अनेक” हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने क्या कह दिया की “मै भी चौकीदार हॅू” ये भ्रष्ट अधिकारी सभी को चौकीदार बनाने में तुले हुए है। शायद ये भ्रष्ट अधिकारी प्रधानमंत्री जी के संदेश का मतलब कुछ और ही निकाल बैठे है। हम आपसे यूही नहीं कह रहे है हमारे पास पूरे प्रमाण है, और प्रमाणो की क्या कहें। सूत्रो के अनुसार यह के अधिकारी खुद 2-2 पैसो के लिए किसी का भी गला काट दे? आपको आगे समझ ही आ जायेगा की ऐसा भी होता है विभाग में।

WP यह मामला है कार्य आयोजना इकाई छिन्दवाड़ा का। जहां चौकीदारो की कमी नहीं है अगर किसी और को अपने कार्यालय के लिए चाहिए तो यह से ले सकते है। यहां के चौकीदारो के नाम है (1) श्री सुभाष उईके वल्द श्री अरद उईके (2) श्री संजय जावरिया वल्द श्री संपत जावरिया (3) श्री मनीष वल्द श्री दीनाजी चौधरी (4) श्री अरूण ससनकर वल्द श्री मारोती (5) खेमराज सिंह मरावी वल्द श्री विरेन्द्र सिंग मरावी। चौकीदारो की सूची यहीं नहीं समाप्त होती है और भी दस्तावेजो को खंगाले तो इस कार्यालय में कई और भी चौकीदार निकल जाएंगे?

अब इनके मात्र, कुछ ही माह के कार्य के दिनांक पर गौर करते है जिससे भ्रष्टाचार का स्पष्ट पता चलेगा की कैसे होता है भ्रष्टाचार? प्रमाणक अनुसार चौकीदार नंबर 1 के द्वारा मई 2019 से जुलाई 2019, चौकीदार नंबर 2 के द्वारा मई 2019 से जुलाई 2019, चौकीदार नंबर 3 के द्वारा मई 2019 से जुलाई 2019, चौकीदार नंबर 4 के द्वारा मई 2019 से जुलाई 2019 और चौकीदार नंबर 5 के द्वारा भी मई 2019 से जुलाई 2019 को एक साथ चौकीदार या कार्यालय सुरक्षा या रात्रीकालीन सुरक्षा का कार्य किया गया था।  आपको ज्ञात हो की व्यय शाखा द्वारा यह प्रमाणक तैयार किये जाते है और अज्ञात सूत्रो के अनुसार कार्य आयोजना इकाई छिन्दवाड़ा के व्यय शाखा प्रभारी बहुत ही ईमानदार और नियमानुसार कार्य करने वाले है, जिनकी ईमानदारी अभिलेखो में झलकती भी है।

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अब आप भी थोड़ा प्रमाणको में ध्यान देंगे तो पाएंगे की प्रमाणको में कार्य करवाने वाले के हस्ताक्षर है, कार्य का शत् प्रतिशत निरीक्षण करने वाले के हस्ताक्षर है और कार्य को अप्रूव्ड करने वाले के भी हस्ताक्षर है। मतलब एक ने प्रमाणित किया की “उक्त कार्य मेरे द्वारा कराया गया”, दूसरे ने प्रमाणित किया की “उक्त कार्य का शत् प्रतिशत निरीक्षण मेरे द्वारा किया गया” और तीसरे ने तो इसे अप्रूव्ड ही कर दिया। ऐसी स्थिति में हम भी सोच में पड़ गए की जब कार्य कराने वाले ने प्रमाणित किया की कार्य मेरे द्वारा कराया गया दूसरे ने प्रमाणित किया की कार्य का शत् प्रतिशत निरीक्षण मेरे द्वारा किया गया ऐसी स्थिति में चौकीदार की जरूरत कार्यालय को क्यो पड़ी होगी? क्या सोचने लगे आप? आप भी चक्कर खा गये ना।

जब कार्य कराने वाले ने कार्य कराया और निरीक्षण करने वाले ने शत् प्रति निरीक्षण किया तो चौकीदारी भी इन्हीं से करवा लेते, आखिर कार्य करवाने वाले को कार्य करवाने के लिए इन चौकीदारो के पास खड़े रहकर कार्य करवाना पड़ा होगा और कार्य हो रहा है अथवा नहीं इसका निरीक्षण करने वाले ने प्रमाणित किया की शत् प्रतिशत निरीक्षण मेरे द्वारा किया तो स्वतः ही प्रतीत होता है की वे भी निरीक्षण हेतु तत्तसमय उस स्थान में उपस्थित होंगे, क्योंकि यह कोई लिखित दस्तावेज या कम्प्यूटर कार्य नहीं जिसका कार्य उपरांत निरीक्षण किया जा सके और वह भी शत् प्रतिशत। फिर चौकीदार के बजट का अतिरिक्त आर्थिक बोझ सरकार पर क्यो डाला गया? यहां आपको ज्ञात करा दे की शत् प्रतिशत निरीक्षण करने वाला कोई और नहीं वनक्षेत्रपाल स्तर का अधिकारी है जो, राजपत्रित होता है। आप स्वंय समझ सकते है की एक राजपत्रित अधिकारी का क्या महत्व होता है और जिन्होंने इसे अपूर्व किया है वहां भी एक आई.एफ.एस. अधिकारी है।

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हमारे संवाददाता ने उन भले मानुषो के बारे में जानने का प्रर्यास किया, जिनके नाम इन प्रमाणको में दिये गये है या जिनके नाम से आहरण किया गया है। तब हमारे संवाददाता को ज्ञात हुआ की जिन लोगो के नाम से आहरण किया गया है उनमें से कई लोगों के द्वारा तो कभी कार्यालय में कार्य ही नहीं किया गया है, बल्कि कोई शिक्षक काॅलोनी, छिन्दवाड़ा तो कोई खजरी छिन्दवाड़ा में रहता है और ये कार्य भी कुछ और करते है और जरूरत पड़ने पर इसका भी पूर्ण खुलासा किया जायेगा।

परंतु यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि, यह भ्रष्टाचार बिना कार्य आयोजना अधिकारी श्री एन.के. सनोड़िया की सहमति के संभव नहीं है। एक ही समय में 5-5 चौकीदारो का कार्य करना बताना, एक बड़े भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है, जिसकी जाॅच भविष्य में एक बड़े भ्रष्टाचार की पोल खोल सकती है? परन्तु उससे पहले तो यह सवाल भी खड़ा होता है कि, क्या प्रमाणको में जो हस्ताक्षर कर प्रमाणित किया गया है वे मर्जी से किये गये है? या किसी प्रकार का दबाब डालकर कराये गये है? क्योंकि एक छोटा कर्मचारी अपनी मर्जी से ऐसे प्रमाणको पर हस्ताक्षर करें वह संभव नहीं लगता है। तो एसी स्थिति में अब प्रश्न यह उठता है कि, इतने प्रमाण होने के उपरांत भी क्या म.प्र. सरकार द्वारा श्री एन.के. सनोडिया, कार्य आयोजना अधिकारी छिन्दवाड़ा के विरूद्ध कार्यवाही की जायेगी? या अन्य मामलो की तरह यह मामला भी दबा दिया जाएगा या लीपापोती वाली जाॅच की जाएगी। वैसे तो वन विभाग को जानने वालो को इस भ्रष्टाचार का अंजाम पता ही होगा?

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