सूचना आयुक्त मा. श्री राहुल सिंह का धमाका, लो.सू.अ. पर रू. 15000/- का जुर्माना

सूचना आयुक्त मा. श्री राहुल सिंह ने अपीलार्थी श्री राममूर्ति शाह के द्वारा की गई द्वितीय अपील पर लोक सूचना अधिकारी श्री एरेनियूस टोप्पो, लोक सूचना अधिकारी/संकुल प्राचार्य, शा. उच्चतर मध्ययमिक विद्यालय सिंगरोली, सिंगरोली (म.प्र.) के विरुद्ध दिनांक 25.08.2020 को रु. 15000/- का जुर्माना और सर्विस बुक में अंकन का सुनाया आदेश।

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अपीलार्थी द्वारा अपने आवेदन में दिनांक 31.10.2019 को लो.सू.अ. से 8 बिन्दुओ की जानकारी चाही गई थी, परंतु लो.सू.अ. ने जानकारी प्रदाय नहीं की तथा दिनांक 30.11.2019 को प्रथम अपील करने पर प्रथम अपीलीय अधिकारी ने भी कोई कार्यवाही नहीं की थी ।

आयुक्त मोहदय ने लो.सू.अ. के दिये गए तथ्यो से असहमति जताई और दोषी पाया गया। आयुक्त महोदय द्वारा कहा गया की 30 दिन मे अपीलकर्ता को सूचना नहीं देकर लो.सू.अ. ने सूचना का अधिकार कानून की धारा 7(1) का उलंघन किया है। वही लो.सू.अ. ने प्रथम अपीलीय अधिकारी की जानकारी नहीं देने के लिए युक्तियुक्त कारण नहीं बता कर सूचना के अधिकार कानून 2005 की धारा 7 की उपधारा 8(1) (2) (3) का भी उलंघन किया है। धारा 7(2) के तहत समय सीमा में लो.सू.अ. द्वारा जानकारी नहीं देने की स्थिति में आवेदक के अनुरोध को नामंज़ूर समझा गया है। यहां लो.सू.अ. द्वारा 7(8) (1) का उलंघन करते हुये आरटीआई आवेदन के अस्वीकृत का कारण नहीं बताया गया। लेकिन अपीलकर्ता के प्रति असहयोग रवैया रखते हुये लो.सू.अ. ने उनकी कोई मद्दद ना करते हुये धारा 5(3) का उलंघन भी किया है।

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आगे मा. सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह द्वारा कहा गया है कि, लो.सू.अ. के रवैये से यह जाहिर है कि, वह प्रकरण में सूचना के अधिकार कानून के नियमो को ताक पर रखते हुये जानकारी नहीं देना चाहते थे। इस प्रकरण में अपनी विधि विरुद्ध भूमिका के चलते लो.सू.अ. ने अपने आप को धारा 20 की कार्यवाही का भागी बनाया है।

मा. आयुक्त ने इस प्रकरण मे सूचना के अधिकार कानून, 2005 कि उल्लेखित धाराओ और मा. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कई आदेशो का भी उल्लेख किया है।

उक्त टीप करते हुये मा. सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह ने फैसला सुनाया की लो.सू.अ. द्वारा अपीलर्थी के आवेदन दिनांक 31.10.2019 से चाही गई जानकारी असदभावनापूर्वक, जानबूझकर और बिना किसी उचित एवं पर्याप्त कारणो से उपलब्ध न कराने तथा सूचना के अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के तहत राशि रु. 15000/- का जुर्माना वायक्तिगत रूप से लगता है।

मा. सूचना आयुक्त ने कहा की जुर्माने की राशि आदेश प्राप्ति के एक माह में नगद, डी.डी. अथवा बैंकर्स चेक के माध्यम से आयोग कार्यालय में जमा कराये। नियत अवधि में राशि जमा नहीं करने पर म.प्र. सूचना का अधिकार (फीस तथा अपील) नियम, 2005 के नियम 8(6) के तहत अग्रिम कार्यवाही की जाएगी।

आगे कहा गया की आयोग के पूर्व आदेश दिनांक 21.08.2020 में उल्लेखित किया गया कि लो.सू.अ. की लापरवाही के चलते शासन के ऊपर अनावश्यक रूप से 1318 पेज की फोटोकोपी के व्यय का भार पड़ा है। इस संबंध में आयोग द्वारा अपीलीय अधिकारी को आदेशित किया गया था की इस प्रकरण में हुये फोटो कॉपी व्यय की सम्पूर्ण राशि लो.सू.अ. की तंख्वाह से काट ली जाये। अपीलीय अधिकारी को आदेशित किया जाता है कि उक्त आदेश के परिपालन में प्रतिवेदन आयोग के समक्ष व्हाट्सएप्प/ईमेल के माध्यम से दिनांक 01.09.2020 तक प्रस्तुत करना सुनिचित करें।

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यह भी कहा की यह देखने में आया है कि, लो.सू.अ. पर अधिरोपित शास्ति की वसूली के प्रकरण वर्षो से लंबित है। जिनमें की लो.सू.अ. ने मा. न्यायालय के समक्ष याचिका भी प्रस्तुत की है और कोई स्थगन भी नहीं है। फिर भी शास्ति संबंधी आयोग का आदेश अंतिम होने के उपरांत भी राशि जमा नहीं की है। संबन्धित विभागो ने सूचना के उपरांत भी वसूली हेतु उचित कार्यवाही नहीं की है। एसी स्थिति में प्रथम अपीलीय अधिकारी को निर्देशित किया जाता है कि, राशि रु. 15000/- अधिरोपित शास्ति की टीप लो.सू.अ. की सेवा पुस्तिका में अंकित की जावे। जिससे लो.सू.अ. से सेवा काल में वसूली नहीं होने पर अंतिम भुगतान के समय उनके देयकों से यह राशि वसूल की जाकर शासकीय कोषालय में जमा कराई जा सके और कालांतर में उच्च न्यायालय से स्थगन प्राप्त किए जाने और आयोग का आदेश परिवर्तित हो जाने या शास्ति जमा करने संबंधी समस्त परिवर्तन भी अंकित किए जावे।

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मा. सूचना आयुक्त श्री राहुल सिंह के द्वारा सुनाया गया यह फैसला एक तराह से कबीले तारीफ भी है क्योकि कुछ लो.सू.अ. मा. न्यायालय में याचिका लगाकर दंड से बचने का प्रयास करते है परंतु मा. सूचना आयुक्त ने अपने इस फैसले से दोषी लो.सू.अ. का वाह रास्ता भी बंद कर दिया है।

अगर भविष्य में इस तराह से शुद्ध फैसले आते रहे तो भ्रष्ट लोक सूचना अधिकारियों को नियमो के विरुद्ध जाकर सूचना ना देने से पहले 10 बार सोचना पड़ेगा। परंतु यह भी सत्य है कि, ये दण्ड भ्रष्ट लोक सूचना अधिकारियों पर ना काफी है। क्योकि जहां करोड़ों अरबों के घोटाले करने वाले लोक सेवक है उनके लिए दण्ड की ये राशि और सर्विस बुक में अंकन शायद माएने नहीं रखता है? क्योकि येसे भी कई प्रकरण है जिसमे जानकारी नहीं प्राप्त होती है और जो किसी कारणवश सूचना आयोग तक नहीं पहुच पाते है।

भ्रष्टाचार की जड़े हमारे सिस्टम में इतनी गहरी हो गई है की आरटीआई जैसे कानून से भी इसे रोक पाना मुश्किल लगने लगा है। वर्तमान में जरूरत है कि, इस आरटीआई कानून और शशक्त और मजबूत बनाया जाये जिससे भ्रष्ट लोक सेवक इससे बचने के उपाय ना खोज पाये।

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