20 दिन का बिज़ली बिल भी माफ़ ना हो सका, 20 लाख करोड़ के आर्थिक पेकेज़ में।

विशेष । गरीबों, मजदूरों के लिए अच्छे अच्छे भाषण देना ओर बात है ओर उनका पालन करना या करवाना ओर बात। लॉकडाउन के पहले चरण में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश वासियों से यह अपील की थी कि इस संकट के समय में गरीबों, मजदूरों का साथ दे, उनसे ना किराया ना मांगे, ना मकान से निकाले ओर ना ही किसी का वेतन काटे। यदि प्रधान मंत्री कि इस अपील का लोग पूरा पूरा पालन करते तो शायद आज वो पलायन देखने को नहीं मिलता।

इस अपील कि पूँजीपतियों, उधोगपतियों ओर मकान मालिकों ने कितनी लाज़ रखी, इसका अंदाजा गरीब और लाचार मजदूरों का धन कि कमी के चलते जारी पलायन साफ़ बताता है। वैसे एक कहावत है कि “जैसा राजा वैसी ही प्रजा या जैसी प्रजा वैसा ही राजा”। इस कहावत के जरिये हम यह बताना चाहते है कि यदि सरकार सवय गरीब और लाचार मजदूरों को किसी प्रकार कि रियायत नहीं दे रही तो फिर सरकार, पूँजीपतियों, उधोगपतियों ओर मकान मालिकों से ऐसी उम्मीद कैसे कर सकती है? दरअसल किराया ना लेना और वेतन ना काटने कि अपील यह भी साफ़ बताती है कि हम कैसे है? यह सवाल शायद कइयों को खले लेकिन सोचने वाली बात यह भी है कि प्रधान मंत्री को ऐसी अपील क्यो करनी पड़ी? वैसे एक बार यह सवाल आप अपने आप से अवश्य कीजिएगा आपको इस सवाल का जवाब भी अवश्य मिल जाएगा। वैसे कई लोगों ने इस अपील कि लाज़ भी रखी और उम्मीद से अधिक सहयोग किया, इतना ही नहीं एक कदम ओर आगे बढ़ाते हुए इस संकट कि घड़ी में कई दानदाता आगे आए ओर सरकार कि मदद कि। वैसे कोविड-19 संकट से लड़ने के लिए अब तक सरकार को कुल किनती दान राशि मिली इसके आंकड़े भी जनता जानना चाहती है।

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जनता से टैक्स वसूली जारी।

जनता आज भी उन सभी वस्तुओं कि खरीद पर टैक्स अदा कर रही है, जिन पर पहले से टैक्स लागू है। बेंको को ऋण पर ब्याज़ अदा कर रही है। लोकडाउन के चलते अभी तक किसी को बिज़ली बिल, पानी और हाउस टैक्स जैसे बिल तो नहीं मिले, लेकिन बिल कि राशि के संबंध में रजिस्टर मोबाइल नंबर पर उपभोगताओं को मेसेज़ आने शुरू हो चुके है, ऐसे में जनता को लोकडाउन खुलने के बाद अभी तो स्कूल फ़ीस के बोझ की चिंता भी है।

lockdown 0420 दिन का बिज़ली बिल भी माफ़ ना हो सका, 20 लाख करोड़ के आर्थिक पेकेज़ में।

12 मई 2020 को लॉकडाउन-4 का संकेत देते हुए 20 लाख करोड़ के आर्थिक पेकेज़ कि बात कहीं। इस आर्थिक पेकेज़ के विषय में जब दिनांक 13 मई 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सितारामण ने जानकारी देना आरंभ किया तो जनता को लगा कि सबसे पहले जनता कि आम जरूरतों का ध्यान रखा जाएगा, उन्हे टैक्स से छूट मिलेगी, प्रतिमाह बिज़ली, पानी गैस जैसे बिलों में राहत मिलेगी, बेंकों से लिए गए ऋण में अथवा ब्याज में कुछ छूट मिलेगी, लेकिन वित्त मंत्री ने एम-एस-एम-ई और उधोगों पर प्राथमिकता दिखाकर उन आम गरीब और लाचार मजदूरों के साथ मध्यम-वर्गीय जनता कि उम्मीदों पर भी अल्प विराम लगा दिया। वित्त मंत्री अग्रेजी में घोषनाए करती गई और मीडिया उसका हिन्दी अनुवाद समझने और समझाने में लग गई, जब अनुवाद पूर्ण हुआ तो पता चला, गरीब और मध्यम-वर्गीय जनता कि थाली में अभी चाँद का प्रतिबिंब ही आया है।

lockdown 02पूर्व में लिया लोन चुकाया नहीं जा रहा, ऐसे में सरकार ओर लोन बांटने निकली।

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लॉकडाउन में जनता कि सबसे बड़ी अवश्यता है अनाज, दवा और अन्य रोज़मर्रा कि जरूरतों की। जनता को लगता था कि अनाज, दवा और रोज़मर्रा कि जरूरतों कि खरीद पर सरकार कुछ दिनों तक टैक्स में छूट दे देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिन लोगों ने पूर्व में बेंको से ऋण ले रखा है वह चाहते थे कि वह लॉकडाउन के चलते वह डिफ़ाल्टर ना बने और उन्हे ऋण अथवा ब्याज़ कि रकम में कुछ छूट मिले, लेकिन लगता है कि सरकार तो यही चाहती है कि लोग ओर लोन ले, ताकि वह अपने कारोबार के जरिए सरकारी खजाने में चार चाँद लगा सके। कुछ लोग तो बिज़ली बिल और गैस बिल जैसे बिलों को माफ़ करने कि उम्मीद लगाए बैठे थे लेकिन अब तक सरकार ने जो घोषणाएँ कि है उन्हे देखकर कहीं से यह नहीं लगता कि जनता कि यह उम्मीदे पूरी होंगी।

lockdown 002इस वक्त मंगल गृह पर जीवन ढूँढने कि कोई आवश्यकता नहीं।

जनता से वसूले गए टैक्स से किसी भी प्रकार के जारी विकास कार्य पर रोक लगा देनी चाहिए, क्यो कि इस वक्त ना मंगल गृह पर जीवन ढूँढने कि आवश्यकता है ना आलीशान अरबों रुपये कि सड़के और हवा से बाते करने वाले ब्रिजो कि आवश्यकता है, जनता इस वक्त भूख से लड़ रही है अपने अपने घर और गांव जाने के लिए पैदल यात्रा कर रही है ऐसे में सबसे पहले तो जो जहा जाना चाहता है उसे रोकने के बजाय उसे वह पहुंचाना आवश्यक हो जाता है क्यो कि रोकने पर जाने वालों ने रुकने से इंकार कर दिया है और इसी लिए लोग अब भी हजारों किलोमीटर के रास्ते पर पैदल ही निकल पड़े है।