यहां चंद रुपयो में बिकता है ईमान, मजदूरो की जान और माल दोनों भ्रष्ट अधिकारियों के हाथ!

मजदूरो की मेहनत के करोड़ो पचा चुके है दमन के ठेकदार और कंपनी प्रबंधन। | Kranti Bhaskar
Daman Labour

संध प्रदेश दमण एवं संध प्रदेश दादरा नगर हवेली में, श्रमिकों के हक की बात करने तथा श्रमिकों के हितो की लड़ाई लड़ने एवं उन्हे न्याय दिलाने का तो कई राजनीतिक दल एवं संस्थाए दावा करती रहती है। वैसे दोनों संध प्रदेशों में स्थापित श्रम विभाग एवं श्रम विभाग के अधिकारियों का भी यही कार्य है की दोनों प्रदेशों में श्रमिकों को न्याय मिले और उनका शोषण ना हो पाए। लेकिन क्रांति भास्कर को दोनों संध प्रदेशों के श्रमिकों द्वारा जो जानकारी मिली है वह कुछ और ही बयान करती है। क्रांति भास्कर की टीम एक लंबे समय से दोनों संध प्रदेशों के श्रमिकों की समस्याओं एवं उनके साथ होने वाले न्याय अन्याय की जानकारी बटोर रही है अभी तक जितनी भी जानकारी क्रांति भास्कर की टीम को मिली है उससे तो यही लगता है की श्रमिकों के शोषण में, राजनीतिक दल एवं अन्य संस्थाओं के साथ श्रम विभाग के अधिकारियों का भी बराबर हाथ है तथा इकाई प्रबंधन एवं ठेकदार से साँठ-गांठ कर, श्रम निरीक्षक श्रमिकों का शोषण बदस्तूर जारी रखने में इकाई प्रबंधन एवं ठेकदार की मदद करते रहे है। अब ऐसा क्यो कहा जा रहा है यह जानने के लिए आप पहले इस खबर में श्रमिकों द्वारा बताई गई, श्रमिकों की उन तमाम समस्याओं एवं मजबूरीयों के बारे जानिए, उसके बाद आप सवय आंकलन कीजिए की हकीकत क्या है और आज भी श्रमिक कितने मजबूर है।

बताया जाता है कि संध प्रदेश दमण एवं संध प्रदेश दादरा नगर हवेली में ऐसी कई बड़ी इकाइयां स्थापित है जो श्रमिकों की भर्ती के लिए श्रमिक एवं कंपनी प्रबंधन के बीच किसी ना किसी ठेकदार को बिछोलिए के तौर पर रखती है। कई कंपनियाँ श्रमिकों का वेतन ठेकेदार के खाते डालती है तो कई इकाइयां ठेकदार को उसका हिस्सा देकर श्रमिकों का वेतन सीधे श्रमिकों को अदा कर देती है। कई इकाइया तो आज भी ठेकदारों को श्रमिकों का वेतन नगद अदा किया करती है। जिन इकाइयो द्वारा सीधे श्रमिकों को वेतन मिलता है वह तो ठेकदार के झांसे और ठगी का शिकार होने से बच जाते है लेकिन जिन इकाइयो द्वारा ऐसा नहीं होता और श्रमिकों का सारा वेतन ठेकदार को दे दिया जाता है और ठेकदार अपनी मर्जी से तथा अपनी सुविधा अनुसार श्रमिकों को वेतन अदा करता है उन इकाइयो के श्रमिक अपने आप को ठेकदार के झांसे और ठगी से बचाने में असफल देखे गए।

सेकड़ों नियमो के बाद भी ठेकदार श्रमिक को ठगने में कामयाब!

ज्ञात हो कि श्रमिकों की भर्ती से लेकर श्रमिकों को वेतन अदा करने की तारीख़ तक के ऐसे कई नियम है जो श्रमिकों के हितो की रक्षा के लिए सरकार द्वारा बनाए गए। बात चाहे श्रमिक की नियुक्ति के समय उसके पहचान पत्र की हो या उसे वेतन अदा करने की दिनांक की या फिर पी-एफ की लगभग सभी मामलों में सरकार एवं प्रशासन द्वारा बनाए गए नियम तय है, इसके अलावे श्रमिक संबन्धित मामलों में, इकाइया एवं ठेकदार, सरकार द्वारा बनाए गए नियमो का पालन करते है या नहीं इसकी देख रेख के लिए भी श्रम विभाग एवं श्रम विभाग के अधिकारी उपस्थित है। लेकिन सरकार द्वारा बनाए गए नियम एवं इन तमाम इंतजामों के बाद भी कभी इकाई प्रबंधन तो कभी ठेकदार, मजदूर को ठग ही लेते है, और उस ठगी को रोकने में अब तक दोनों संध प्रदेशों के श्रम निरीक्षक नाकाम देखे गए।

आज भी देना पड़ता है हफ़्ता या हिस्सा!

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सबसे पहले तो आप यह जान लीजिए कि, संध प्रदेश दमण एवं संध प्रदेश दादरा नगर हवेली में स्थित ऐसी कई इकाइयां है जिनमे आज भी श्रमिकों का ठेका लेने तथा ठेका चलाने के लिए किसी ना किसी को हफ्ता अथवा ठेके से होने वाली आम्दानी का हिस्सा देना पड़ता है, अब यह हिस्सा उन मजदूरो के हिस्से से काटा जाता है या ठेकदार की आम्दानी से इसका आंकलन तो श्रमिकों को न्याय दिलाने का दावा करने वाली संस्थाए करें या फिर सवय श्रम विभाग के अधिकारी इस मामले में जांच कर हकीकत का पता लगाए तो ही बेहतर होगा।

वर्क कोंटरेक्ट के बिना ठेका चालने वाले ठेकदारों की दोनों संध प्रदेशों में भरमार!

वैसे नियमो को धतता बताने में इकाइया भी कही से कम नहीं, दोनों संध प्रदेशों में कितनी इकाइया है और कितने ठेकदार इसकी जानकारी और आंकड़े ही जनता के सामने आ जाए तो श्रम विभाग एवं इस विभाग के अधिकारी पूरी तरह बे-नकाब हो जाएंगे, क्यो की दोनों संध प्रदेशों में सेकड़ों ऐसी कई इकाइया है जो बिना किसी वर्क कोंटरेक्ट के ठेकदार से काम लेते है और ठेकदार द्वारा मजदूर लिया करती है, ठेकेदार भी बे-हिचक कंपनी में वर्क कोंटरेक्ट के बिना, श्रमिकों की सप्लाई करते है, अब यदि वर्क कोंटरेक्ट ही नहीं तो श्रम विभाग को कैसे पता चलेगा की किस इकाई में किस ठेकदार का ठेका चल रहा है, ऐसे में बिना वर्क कोंटरेक्ट के ठेका चलाकर इकाई एवं ठेकदार दोनों ही श्रम विभाग को अंधेरे में रखे हुए है समय रहते इस मामले में भी प्रशासन को अवश्य विचार करना चाहिए ताकि विभाग के पास ठेकेदारो की पूरी जानकारी रह सके है।

श्रमिक को लूटने के कई तरीको से अंजान है श्रम विभाग!

वैसे ठेकेदारो का एक और बड़ा घाल-मेल भी बताया जाता है वह यह है की कई इकाइया ऐसी है जिनमे ठेकदार कंपनी प्रबंधन के कुछ लोगो को साथ मिलाकर, फर्जी श्रमिकों की एंट्री करवाकर इकाई को चुना लगाता है, इतना ही नहीं ऐसे ऐसे श्रमिकों को काम पर बताया जाता है जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता, अब ऐसे ठेकदारों पर क्या कार्यवाही होनी चाहिए तथा यह किस अपराध में आता है इसकी जानकारी तो प्रशासन के पास अधिक होगी। यह और बात है कि फर्जी श्रमिकों की एंट्री का एक और भी कारण है वह यह है की दो – चार दिन काम करने वाले श्रमिकों को कुछ इकाइया वेतन नहीं देती, तो ठेकदार चार दिन काम करके चले गए श्रमिक के नाम पर अन्य किसी श्रमिक से माह के बाकी दिन काम करवा लेता है ताकि 4 दिन काम करने वाले श्रमिक का वेतन भी कंपनी लिया जा सके। वैसे तो यह मामला काफी चिंता वाला है। चिंता 4 दिन के वेतन को लेकर नहीं बल्कि जो काम कर रहा है उसके नाम व पहचान को लेकर, लेकिन इस विषय में कभी और बात करेंगे, फिलवक्त पुनः दो – चार दिन के वेतन मुद्दे पर चलते है। कई इकाइया ऐसी है जिनमे चंद दिनों के काम-काज का वेतन ठेकेदार द्वारा श्रमिकों को नहीं दिया जाता, ऐसा नहीं है की कंपनी श्रमिक का वेतन डकार जाती है, कंपनी श्रमिक का वेतन अदा करती है लेकिन माह की तय तारीख़ के अनुसार, लेकिन ठेकदार श्रमिक को झांसा देकर, दो-चार दिन काम करने वाले श्रमिक का वेतन यह कह कर हड़प करने में कामयाब हो जाता है कि कंपनी प्रतिमाह काम करने वाले को ही वेतन अदा करती है अथवा कम से कम माह के 20 दिन काम करने पर ही वेतन अदा किया जाएगा। कई ठेकदार तो श्रमिक को काम पर रखने समय उनसे इस मामले में लिखत पढ़त भी करवा लेते है की उन्हे दो-चार दिन के काम का वेतन नहीं मिलेगा, ठेकदार की असली कमाई भी यही है क्यो की ठेकदार के पास ऐसे कई श्रमिक आते है जो दो-चार दिन में काम कर लौट जाते है और माह के अंत में वह रकम लाखो रुपये का रूप ले लेती है, अब इसे श्रमिकों का शोषण ना कहा जाए तो क्या कहा जाए और यह तो ऐसा शोषण है जिसके लिए ठेकदार श्रमिक का अंगूठा तक लगवा लेता है ताकि चार दिन का वेतन मांगने पर उस अशिक्षित श्रमिक को उसका अंगूठा लगाया गया कागज़ दिखाकर उसे श्रम विभाग जाने से रोका जा सके। वैसे भी भला 2 या 4 दिन के वेतन की शिकायत लेकर श्रमिक कहा चक्कर काटे उसे तो यह तक पता नहीं रहता की नियम क्या है श्रम विभाग कहा है और श्रम अधिकारी की ठेकदार या इकाई के साथ सांठ गाठ है भी या नहीं, वही दूसरी और उस श्रमिक को यह भय भी होता है की कही चार दिन की मजदूरी वसूलने में अन्य चार दिन व्यर्थ ना चले जाए क्यो की यदि ऐसा हुआ तो उसका परिवार भूखा ही रह जाएगा!

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कई ठेकदारों ने पी-एफ विभाग का कार्यालय तक नहीं देखा, पी-एफ विभाग के अधिकारी घौर निंद्रा में!

दोनों संध प्रदेशों में ऐसे भी कई ठेकदार है जिनहोने अभी तक वापी का पी-एफ का कार्यालय नहीं देखा, इकाई कहती है ठेकदार को पी-एफ का पैसा दे दिया ठेकदार कहता है कंपनी पी-एफ जमा करेगी, श्रमिक करे तो क्या करे ठेकदार और इकाई से हक के लिए लड़ने और उलझने की उसकी हेसियत नहीं अगर उलझ गए और इकाई तथा ठेकदार ने काम से निकाल दिया तो परिवार का पेट कैसे भरेगा बस इसी चिंता में मजदूर जलता रहता है और इकाइया तथा ठेकदार मजदूर की मजदूरी का नाजायज़ फाइदा उठाने में कामियाब हो जाते है। इकाई और ठेकदारों के लिए ऊपर से सोने पर सुहागा तो यह है की इस बात की जानकारी होने के बाद भी वापी पी-एफ विभाग के अधिकारियों को मामले में संज्ञान लेने की फुर्सत नहीं। अब ऐसा क्यो क्या जा रहा है यह भी जान लीजिए, तो बात यह है कि, कुछ महीनो पहले कुछ एक मामलो में होने वाली पी-एफ चोरी की जानकारी क्रांति भास्कर द्वारा वापी पी-एफ विभाग के अधिकारियों को दी गई थी, लेकिन उन्होने कहा की जानकारी पोर्टल पर डाल दो वहा से जब जानकारी हमारे पास आएगी तब देखा जाएगा कि उस पर क्या कार्यवाही करनी है। क्रांति भास्कर की टीम द्वारा जानकारी पोर्टल पर भी डाल दी गई लेकिन कई माह बीत जाने के बाद भी कार्यवाही के नाम पर कोई संज्ञान नहीं देखने को मिला। वैसे अगर वापी पी-एफ विभाग के होनहार और पढेलिखे अधिकारी, इकाइयो में काम करने वाले अशिक्षित श्रमिकों से भी यही उम्मीद करते है की वह अपनी शिकायते भी पोर्टल पर डाले, तो फिर ऐसे अधिकारियों को अवश्य किसी खास अवार्ड से नवाजा जाना चाहिए और सरकार को ऐसे अधिकारियों के लिए किसी नए अवार्ड का इजात करना चाहिए, अवार्ड इस लिए क्यो की ऐसे अधिकारी ही है जिनकी बदोलत आज भी पी-एफ चोरी हो रहा है, ऐसे अधिकारी ही है जिनकी बदोलत सरकारे आरोपो का दंश झेल रहे है और ऐसे अधिकारी ही है जिनकी बदोलत ठेकदार और उधोगपति मालामाल हो रहे है और ऐसे अधिकारी ही है जिनकी बदोलत श्रमिक बदहाल दिखाई देते है। या तो फिर वापी पी-एफ विभाग के अधिकारियों को पूरा विश्वास है की ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा सिस्टम उनही के जैसे केवल और केवल पूंजीपतियों पैरवी करने बैठा है या फिर उनका भी हिस्सा इकाइयो एवं ठेकदारों से तय है? यदि ऐसा नहीं तो अधिकारी शिकायतकर्ता से क्यो नहीं मिलते? अधिकारी शिकायतकर्ता को जवाब क्यो नहीं देते? अधिकारी शिकायतकर्ता को क्यो चक्कर कटवाते है और अधिकारी शिकायतों पर त्वरित कार्यवाही क्यो नहीं करते? यदि समय हो और पी-एफ विभाग के वरीय अधिकारी, वापी पी-एफ विभाग के अधिकारियों की करतूतों एवं कारगुजारियों में सहभागी ना हो तो, वापी के पी-एफ विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली एक बार जांच अवश्य करवा ले हो सकता है उनकी जांच से आने वाले समय में लाखों श्रमिक लाभन्वित हो जाए।

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हादसे के बाद श्रमिक श्रमिक को मिलने वाले मुआवजे में भी कमीशनखोरी!

अब उस समस्या के बारे में बात करते है जिसमे कमीशनखोरी कही ना कही मानवजाती को शर्मशार करने का काम करती है, संध प्रदेश दमण एवं संध प्रदेश दादरा नगर हवेली की इकाइयो में होने वाले हादसे के बाद यदि किसी श्रमिक का कोई अंग खराब हो जाता है तो उसके बदले उसे इकाई द्वारा नियमानुसार मुआवजा अदा किया जाता है, पहले तो श्रमिक को यह पता नहीं होता है की ऐसे मामले में उसे कहा गुहार लगानी है तो अधिकतर मामलो में वह इकाई के चक्कर ही काटता रहता है बाद में उसे पता चलने पर वह श्रम विभाग में श्रम निरीक्षक के पास पहुँच तो जाता है लेकिन श्रम विभाग एवं विभागीय अधिकारियों द्वारा उम्मीद के अनुरूप सहयोग नहीं मिलने पर उक्त श्रमिक ऐसे दलालो के चंगुल में फंस जाता है जो उसे पहले उसका हक दिलाने की बात करते है लेकिन इकाई से मुआवजा मिलने के बाद उससे मोटा कमीशन मांगते है, श्रम विभाग के अधिकारियों को चाहिए की ऐसे मामलों में कमीशनखोरी बंद करने के लिए श्रमिक को मिलने वाली रकम का चेक देने के बजाए सीधे उसके खाते में श्रम विभाग दारा चेक डिपॉजिट करवाया जाए या फिर ई-भुगतान करवाया जाए ताकि दलालो के पास श्रमिक को लूटने का कोई विकल्प ना बच सके।

इस पूरे मामले को देखने के बाद इस बात से तो इन्कार करना काफी मुश्किल है कि श्रम विभाग के अधिकारियों एवं श्रम निरीक्षक के जानकारी के बिना दोनों संध प्रदेशों में श्रमिकों के साथ यह सब घटित होता रहा, ऐसे में सवाल यह उठता है की दोनों श्रम निरीक्षकों ने अब तक श्रमिकों के नाम पर कितनी काली कमाई की? क्या उस काली कमाई में श्रम निरीक्षक के वरीय अधिकारी भी हिस्सेदार रहे? यदि नहीं तो क्या वरीय अधिकारी दोनों प्रदेशों के श्रम निरीक्षकों की सीबीआई जांच करवाकर यह पता लगाएगी की किस अधिकारी के हिस्से श्रमिक का कितना श्राप है? समय रहते इस मामले में प्रशासक प्रफुल पटेल भी एक बार विचार अवश्य करें क्यो की इस मामले श्रमिकों द्वारा बताई गए समस्याए किसी एक श्रमिक के संबंध में नहीं यह लाखो श्रमिकों के हित्त कि बात है जिसे नजरंदाज करना, श्रमिकों को नजरंदाज करना होगा। क्रांति भास्कर श्रमिकों के मामले में अपनी मुहिम जारी रखेगी और इस मामले में श्रमिकों की आवाज बनकर प्रशासन से उनके लिए न्याय की गुहार लगती रहेगी। शेष फिर।