डी-आई-ए ने मांगा इकाइयों से पांच लाख का चंदा

संध प्रदेश दमन में वैसे तो डी-आई-ए ओधोगिक इकाइयों की काफी हिमायती रही, प्रशासन से दमन के उधोगों के विकास व व्यसथा को लेकर हमेशा इकाइयों के हकों की बात करती रही, लेकिन हालही में डी-आई-ए द्वारा जारी किए गए एक पत्र को देख कर लगता है उधोगों की हिमायती डी-आई-ए उधोगों पर अनावश्यक बोझ डाल रही है। दिनांक 06 जनवरी 2015 को जारी किए गए डी-आई-ए के पत्र में,डी-आई-ए ने पहले तो अपने अस्तित्व और ताकित की मिशाल दी,फिर बताया की किस तरह प्रशासन व विधुत विभाग से लड़कर उक्त डी-आई-ए ने इकाइयों पर बढ़ते विधुत बोझ से छुटकारा दिलाया, फिर यह भी बताया आने वाले समय में भी विधुत समस्या से जुड़े मुद्दों को डी-आई-ए उठाती रहेगी, एवं 2014-2015 के लिए विधुत मामलों में इकाइयों के हक में जे-इ-आर-सी अपना फ़ैसला सुना सकती है यह भी बात कहीं। इस पूरे पत्र में विधुत विभाग के कई विषयों का जिक्र है।

लेकिन इसके बाद उक्त डी-आई-ए ने उधोगों से अपील की,कि वह डी-आई-ए को पांच लाख रुपये का चंदा दे। यही से हेरत और हेरानी दोनों एक साथ अपने फॅन को उठाती दिखाई दे रही है,केवल एक इकाई से पांच लाख की मांग की गई तो अन्य कितनी इकाइयों से कितनी रकम की मांग की गई होगी,मामला केवल इसी एक सवाल पर नहीं टीका है,डी-आई-ए ने अपने पत्र में सवंम ही चंदे की रकम भी तय करदी की किसे कितना चंदा देना है,भला यह तो किसी मजाक से कम नहीं,कि कोई सवंम कैसे तय कर दे की आपको कितना चंदा देना है,जबकि चंदा देना वाले की हेसियत या चंदा देने वाले की इच्छा पर निर्भर होता है की उसे चंदा देना भी है या नहीं,लेकिन यहां मामला बिल्कुल इतर देखा गया।

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वैसे तो यहां के कई इकाइयों से यह सुनने को मिलता रहता है की अब यहां इकाइयों को निरंतर कार्यरत रखना कठिन है,बोझ बढ़ रहा है,तो फिर डी-आई-ए सवंम क्यों ऐसा बोझ इकाइयों के माथे मंढ रही है,खेर यह तो पहला मामला है जो क्रांति भास्कर के पास आया है, लेकिन ऐसे और कितने मामले होंगे जिसमे डी-आई-ए ने ऐसे चंदा उगाही की हो, और इस मामले में एक प्रबुध उधोगपति ने तो यह तक कह डाला की डी-आई-ए ने आज तक जितना भी चंदा उगाही की है उसकी जांच होनी चाहिए, तथा अब तक डी-आई-ए द्वारा जमा किए गए धन एवं खर्च किए गए धन का ब्योरा डी-आई-ए के तमाम सदस्यों से सामने रखना चाहिए।

दमन में स्थापित वेलनोन पोलिएस्टर लिमिटेड के वाइस-प्रेसीडेंट, डी-आई-ए के सचिव है, और यह वहीं इकाई है जिसके प्रमुख एवं खास कर्मचारी ने बताया की इकाई से प्रतिमाह पचास-पचास हजार रुपये दमन विधुत विभाग के अभियंताओं को देने की बात कहीं थी,अब वहीं इकाई के वाइस प्रेसीडेंट, डीआईए के सचिव बनकर उधोगों के हकों की पहरवी करने जे-इ-आर-सी की सुनवाई में जाते है तो इस मामले में क्या कहां जाए और किसे कहां जाए यह तो दमन प्रशासन के विधुत सचिव संदीप कुमार को सोचना चाहिए। लेकिन कहीं न कहीं उक्त इकाई की अनियमितताओं एवं टैक्स चोरी करने के मामलों में उक्त इकाई के वाइस प्रेसीडेंट क्या डीआईए के सचिव होने का फाइदा नहीं उठाते होंगे,डीआईए के सचिव होने के नाते प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों से अपना मन चाहा काम नहीं करवाते होंगे,इस मामले में में चाहे जो भी हो कहीं न कहीं डीआईए एवं प्रशासन दोनों की गरिमा को ठेस अवश्य पहोच रही है।

हालांकि डी-आई-ए को लेकर एवं डी-आई-ए के अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारियों को लेकर क्रांति भास्कर ने पहले भी कई ख़बरों को प्रकाशित किया है, तथा डीआईए की कार्यप्रणाली एवं डीआईए के कमिटी सदस्यों की प्रशासन एवं नेताओं से साठ-गाठ की बात कहीं है, संध प्रदेश दमन के इस डीआईए के अध्यक्ष पारिख को किसकी सहमति एवं स्वीकृति से अध्यक्ष चुना गया यह तो जग जाहिर है, और अध्यक्ष चुनने की चयन प्रक्रिया का कितने हद तक पालन किया गया, यह भी अन्य सदस्य जानते है, लेकिन इस तरह उधोगों पर चंदा देने का बोझ डालना कितना मुनासिब है यह तो समिति और अध्यक्ष पर निर्भर करता है, लेकिन पूर्व में जमा किए गए चंदे एवं खर्च के हिसाब को तमाम सदस्यों के सामने जाहिर करने की जरूरत दिखाई देती है।

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वैसे तो डी-आई-ए की कमिटी में किसी सदस्य की कार्यप्रणाली पर कोई सवाल खड़े नहीं होते,लेकिन इस कमिटी में कुछ लोग ऐसे अवश्य है जिन्होने केवल अपने मनोरथ पूर्ण करने के लिए डी-आई-ए के नाम की चादर ओढ़ रखी है,डी-आई-के सदस्यों को चाहिए की डी-आ-ए एवं दमन में स्थापित उधोगों के हितों की बात करने वाले एवं अपने निजी हितों के लिए डी-आई-ए का इस्तमाल करने वालों में फर्क कर ले,और डी-आई-ए की गरिमा बरकरार रखे।  हालांकि डी-आई-ए के कुछ खास सदस्यों की कार्यप्रणाली एवं एवं साठ-गाठ के कुछ खास मामले में क्रांति भास्कर के पास आए है, जिनका खुलासा भी जल्द क्रांति भास्कर करेगी।