पांच सालों से एक पत्र का जवाब नहीं दे सकी दमन-दीव प्रशासन! जानिए कोनसा पत्र है जिसका जवाब पांच साल से मंत्रालय मांग रहा है…

Administration of Daman & Diu
Administration of Daman & Diu

दिनांक 14-10-2010 को दमन-दीव व दानह के तत्कालीन वन एवं पर्यावरण सचिव पी-के गुप्ता द्वारा, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष को पत्र संख्या PCC/DMN/PCC-CONST/2003-2004/347 में दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के पुनर्गठन की मांग की गई, जिस मांग में दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के अधिकारियों के कार्यभार तथा पद को लेकर कुछ संसोधन करने को कहां गया।

इस नई कमिटी के गठन में केवल एक बदलाव करने को कहां गया और वह बदलाव यह था कि, दमन-दीव व दानह प्रदूषण

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नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव का कार्यभार वन संरक्षक के बजाए मुख्य वन संरक्षक के पास रखा जाए, तथा सदस्य सचिव के पद पर मुख्य वन संरक्षक कि नियुक्ति कि जाए। इस दिनांक 14-10-2010 को लिखे गए इस पत्र में साफ़ लिखा है कि इस मामले में दमन-दीव व दानह प्रशासक से स्वीकृति ली जा चुकी है तथा प्रशासक की स्वीकृति के बाद ही उक्त संसोधन कर दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के पुनर्गठन की मांग की गई है। इस मामले में जब प्रशासक से अनुमति लेने के बाद यह प्रस्ताव केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण को भेजा गया तो इस मामले में प्रशासक यह भी नहीं कह सकते कि यह मामला उनकी जानकारी में नहीं है।

यह पूरा मामला केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति द्वारा जारी किए गए एक नोटिफिकेशन को बदलने तथा उक्त नोटिफिकेशन में संसोधन करने का था जिसका नोटिफिकेशन संख्या है B-12015/7/04 एवं नोटिफिकेशन की दिनांक है 17-12-2004, इस नोटिफिकेशन के अनुसार दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव पद पर वन संरक्षक की नियुक्ति बताई गई है, जिसे बदलने के लिए नई कमिटी के गठन की मांग, तत्कालीन वन एवं पर्यावरण सचिव पी-के गुप्ता द्वारा की गई।

इस मामले में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दिनांक 2-04-2011 को केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष तथा दमन-दीव प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव को पत्र लिखकर इस मामले में चल रहे प्रोग्रेस की जानकारी दी।

इसके बाद दिनांक 23-06-2011 को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी एन-ए सिद्धिकी द्वारा दमन-दीव व दानह वन एवं पर्यावरण सचिव को पत्र लिखकर यह बताया की पर्यावरण अधिनियमानुसार, दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के पुनर्गठन की मांग की गई है तथा जो प्रस्ताव मंत्रालय को भेजा गया है उसमे सामाजिक वर्ग के दो सदस्याओं को नियुक्त करने का प्रावधान है तथा संध प्रदेश प्रशासन द्वारा प्रदेश से दो नाम भेजे जाए जिनहे दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति में सदस्य के तौर पर नियमानुसार नियुक्त किया जाएगा, तथा मंत्रालय द्वारा दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के पुनर्गठन  हेतु नोटिफिकेशन प्रदेश प्रशासन द्वारा उन दो नामों को मिलने के उपरांत किया जाएगा।

  • जब यह अफ़सरशाह मंत्रालयों को जवाब नहीं देते तो जनता को क्या खाख जवाब देंगे?

    • वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को ऐसे कामचोर आई-ए-एस अधिकारियों को कठोर दण्ड देना चाहिए ताकि आगे से यह अधिकारी जनता तथा मंत्रालय से जुड़ी फाइलों को सालों तक लंबित ना रखे!   

    • इस मामले को देखने के बाद लगता है मोदी सरकार में अंधेर-नगरी चौपट राजा जैसा हाल है, यहां सेकड़ों अधिकारी प्रतिमाह अपनी तंख्वाह तो समय पर लेते है लेकिन जनता के काम समय पर नहीं करते जिसका जीता जागता यह उदाहरण है।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी श्री शिद्धिकी द्वारा दिनांक 23-06-2011 को दमन-दीव व दानह वन एवं पर्यावरण सचिव द्वारा से इस पत्र का छ: माह तक कोई जवाब नहीं मिला तथा दमन-दीव व दानह वो दो नाम नहीं मिले जिसे प्रदूषण नियंत्रण समिति की सदस्यता के लिए शामिल करना था, शायद मंत्रालय को अंदाजा आ गया होगा की दमन-दीव व दानह में काम करने आए अधिकारी कितने बड़े कामचोर है ? जिनहे शायद कमाने से फुर्सत नहीं मिलती ? तो मंत्रालय को जवाब देने का समय कैसे मिलेगा ? इसी लिए दिनांक 20-01-2012 को पुनः वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने एक पत्र लिखा।

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इस बार पत्र दमन-दीव व दानह प्रशासक नरेन्द्र कुमार के नाम था, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रशासक नरेन्द्र कुमार से इस पत्र में पुनः वो दो नाम मांगे जिनहे प्रदूषण नियंत्रण समिति में सदस्य के रूप में नियुक्त करना है, तथा इसके साथ मंत्रालय ने लिखित रूप में प्रशासक नरेन्द्र कुमार से यह शिकायत की गई कि, दिनांक 23-06-2011 को वन एवं पर्यावरण सचिव को मंत्रालय द्वारा लिखे पत्र के छ: माह बीआईटी जाने के उपरांत भी अभी तक मंत्रालय को किसी प्रकार का जवाब तक नहीं मिला, एवं मंत्रालय को जवाब नहीं मिलने से अब तक यह मामला लंबित है, तथा जवाब नहीं मिलने तक यह मामला आगे भी लंबित रह सकता है यह शायद प्रशासक नरेन्द्र कुमार एवं वन एवं पर्यावरण सचिव को पता तो होगा ही। इस पूरे मामले में कभी दमन-दीव प्रदूषण नियंत्रण समिति तो कभी दमन-दीव व दानह प्रशासक तो कभी दिल्ली के मंत्रालयों में फाइले इधर से उधर होती रही, और जनता के पैसों पर अपनी आजीविका चलाने वाले सरकारी अधिकारियों को यह खयाल भी नहीं आया कि कार्य में विलंब के कारण जनता का कितना नुकसान हो रहा है, लेकिन मामला वहीं के वहीं अटका रहा।

इसके बाद पुनः एक बार मंत्रालय ने दिनांक 14-06-2012 को दमन-दीव व दानह प्रशासक नरेन्द्र कुमार को पत्र लिखकर सूचित किया कि लगभग पिछले दो-वर्षों से मामला केवल इस लिए लंबित है क्यों कि दमन-दीव प्रशासक एवं प्रशासन मंत्रालय के पत्र का कोई जवाब नहीं दे रहे है जिसके कारण दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के पुनर्गठन का काम रुका पड़ा है, मंत्रालय ने एक बार फिर प्रशासक नरेन्द्र कुमार को मंत्रालय द्वारा लिखे गए तमाम पत्रों का हवाला देते हुए कहाँ कि अब तक दमन-दीव व दानह प्रशासन द्वारा वो दो नाम नहीं मिले जिनहे प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य के तौर पर शामिल किया जाना है।

दमन-दीव व दानह की जनता में यदि प्रशासक पांच सालों में केवल दो नाम नहीं चुन पाए तो क्या दमन-दीव व दानह के नेताओं के लिए चिंता का विषय नहीं है? या क्या दोनों संध प्रदेशों में प्रशासक की नजर में कोई काबिल व्यक्ति ही नहीं जिनके नामों को वह मंत्रालय भेज़ सके? इस मामले में दोनों सांसदों को आवज़ उठाने की जरूरत है।

वैसे तो यह मामला चौकाने वाला है ही लेकिन इस भी अधिक चौकाने वाली बात यह है कि जो हाल इस मामले का वर्ष 2010 में था अब भी वहीं, बस आलम यह है कि अब वन एवं पर्यावरण मंत्रालय इस मामले में प्रशासक तथा दमन-दीव व दानह प्रशासन को पुनः पत्र लिखना बंद कर दिया शायद मंत्रालय समझ गया कि  मंत्रालय अपने कागज को जितना काला करेगा उतना हि काला चेहरा दमन-दीव व दानह के उन कामचोर अधिकारियों का होगा जो जनता कि मेहनत की कमाई से प्रतिमाह अपनी तंख्वाह तो पाते है लेकिन काम में वर्षों लगा देते है।

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हालांकि इस मामले के अलावे और ऐसे कितने मामले दमन-दीव व दानह प्रशासन में लंबित होंगे जिंका प्रशासन मंत्रालय को समय पर जवाब नहीं देती ? ऐसे कितने मामले होंगे जिनमे जनता का भविष्य और पैसे दोनों एक ऐसी खाई में धकेले जा रहे है जिनका लौटकर आना नामुमकिन है ?

भारत के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और भारत के राष्ट्रपति दोनों को इस मामले में सोचने के आवश्यकता है कि जनता से वसूले गए कर से अधिकारियों  को उनकी पगार मिलती है, और पगार समय तथा राशि निश्चित है तो फिर अधिकारियों को सोपे गए कार्यों कि समय सीमा क्यों तय नहीं है ? अगर एक दिन के कार्य में अधिकारी एक दशक लगाए तो इस देश का आर्थिक रूप से तथा विकासीय रूप से नुकसान होगा ? और क्या होगा जनता के भविष्य का और आने वाली पीढ़ी का ? इस मामले में सोचने की नहीं बल्कि कोई कदम उठाने की जरूरत है जिससे आने वाले समय में ना हि फाइल लंबित हो ना हि विकास!

  • क्या सांसद लालू पटेल और नट्टू पटेल को पता है?

  • दमन-दीव व दानह के लिए क्या यह एक शर्मिंदगी का विषय नहीं है ?

दमन-दीव व दानह के दोनों सांसद भाजपा से है और केंद्र में भाजपा की सरकार है, इसके बाद भी यह मामला अब तक लंबित क्यों यह काफी चिंता का विषय है, और क्या दमन-दीव व दानह के सांसदों को पता है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण में दो सिविल-सोसाइटी से नाम मांग रहा है जिनहे दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य member-of-parliament-daman-
पद पर नियुक्त किया जाए, और वो दो नाम पिछले पांच वर्षों से दमन-दीव व दानह प्रशासक एवं संबन्धित अधिकारी वन एवं पर्यावरण को उपलब्ध नहीं करा रहे है।

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दमन-दीव व दानह के लिए इस से बढ़ी शर्मिंदगी क्या होगी कि पांच वर्षों में प्रशासन सिविल-सोसाइटी में से वह दो नाम नहीं खोज पाई जिनहे वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास भेजा जा सके, या तो दमन-दीव व दानह प्रशासन ऐसा बताना चाहती है कि दमन-दीव व दानह में ऐसे व्यक्ति हि नहीं जिनके नाम प्रशासक वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सामने प्रस्तुत कर सके।

 

  • आते ही लगते है कार्यालय चमकाने, जरा देखिए पुरानी फाइले कितनी लंबित है!

जब दमन-दीव व दानह में नए प्रशासक आते है तो उन्हे आते ही अपने कार्यालय का नक्सा बदलना, रंग बदलना, फर्नीचर बदलना तो याद रहता है, लेकिन उन्हे यह नहीं दिखाई देता की वह जिस विकास निधि का उपयोग अपने कार्यालय को चमकाने में कर रहे है वह जनता के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई है, और उस पैसे को जनता ने कोई घोटाला कर के जमा नहीं किया है, लेकिन इसके बाद भी नए प्रशासक के आने के बाद देखा गया कि वह अपने कार्यालय में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य करवाते है, खेर इस बात से जनता को का हमे कोई गुरेज नहीं हो सकती, प्रशासक को अपने कार्यालय में परिवर्तन बदलाब या कैसा रख-रखाव रखना है यह तो उनपर निर्भर करता है, लेकिन अगर नए प्रशासक आने के बाद सबसे पहले अपने कार्यालय का नक्सा बदलने से पहले दमन-दीव व दानह के उन विभागों एवं विभागीय अधिकारियों का नक्सा बदले जिनके भ्रष्टाचार की फाइले और शिकायते प्रशासन में लंबित पड़ी है, और ऐसे मामलो को निपटाए जो सालों से टस के मस नहीं होते, जैसे कि यह मामला है, अगर प्रशासक इस बात पर ध्यान दे तो जनता के साथ साथ वह उन विरोधी नेताओं से भी अवश्य वाह वाही लुटेगे जिनहे प्रशासक की कार्यप्रणाली पर संदेह रहा हो।

दमन-दीव व दानह के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा इस प्रकार की कार्यप्रणाली और कामचोरी दुबारा ना हो इसके लिए इस मामले में हुई देरी और कामचोरी के लिए भारत सरकार को चाहिए कि इस मामले में कामचोरी व लापरवाही करने वाले अधिकारियों को दण्डित करें, और दमन-दीव व दानह के दोनों सांसदों को भी चाहिए कि इस मामले में लापरवाही तथा मामले को लंबित रखने वाले अधिकाइयों पर उचित कार्यवाई करने के लिए भारत सरकार से मांग करे ताकि दमन-दीव व दानह की जनता की जनता को आगे चलकर इस प्रकार कि कोई और परेशानियों का सामना ना करना पड़े।

Investigative Report By C.M Jain