कोरोना काल में, गोदी मीडिया जनता को गुमराह तो नहीं कर रही है?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक कोरोना के कारण 2 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गवा चुके है। लेकिन क्या लोगों कि मौत का जिम्मेदार सिर्फ कोरोना ही है? यह सवाल इस लिए क्यों कि सोशल मीडिया पर सेकड़ों ऐसे विडियों वायरल हो रहे है जो छाती पीट पीट कर कोरोना के अलावे भी कई सवालों को जन्म दे रहे है और कई आरोप लगा रहे है, पर उन सवालों और आरोपों पर गोदी मीडिया में कोई चर्चा क्यों नहीं?

  • अस्पताल में बेड ना मिलने और बेड मिलने से हुई देरी के चलते जिसकी जान गई उसकी मौत का जिम्मेदार कौन?
  • ऑक्सीज़न ना मिलने कि वजह से और ऑक्सीज़न कि कालाबाजारी के चलते जो लोग ऑक्सीज़न नहीं खरीद पाए और अपनी जान गवा दी उनकी मौत का जिम्मेदार कौन?
  • अस्पताल प्रबंधन कि लापरवाही के चलते जिनके परिजनों कि जान चली गई उनकी मौत का जिम्मेदार कौन?
  • हालांकि इन सवालों के अलावे भी सोशल मीडिया पर कई ऐसे आरोप लग रहे है जिनका जवाब जनता को देना वाला कोई नहीं।

आज तक के जाने माने न्यूज एंकर रोहित सरदाना कि मौत पर भी कई सवाल खड़े हुए, दिन भर रोहित कि मौत पर आज तक की टिम आसू बहाती रही, लेकिन उन सवालों का जवाब नहीं तलाश पाई जो रोहित अपने पीछे छोड़ गए। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत पटेल ने रोहित कि मृत्यु पर एक के बाद एक कई ट्वीट किए यह सभी ट्वीट आपके सामने है…


सभी ट्वीट देख लिए तो जरा सोचिए कि अपने आप को सबसे आगे बताने वाला आजतक कहा है? रोहित कि मृत्यु पर प्रशांत के ट्वीट देखकर क्या लगता है? आज तक पर, रोहित के परिवार को क्यों नहीं बुलाया गया? रोहित के परिवार के साथ बातचीत कर उसे जनता को क्यों नहीं दिखाया गया? क्या रोहित के परिवार के सदस्य भी आम जनता कि तरह स्वास्थ्य व्यवस्था से नाखुश है और उनकी आवाज को भी गोदी मीडिया दबाने का काम कर रहा है या सच खोजने से आज तक को कोई रोक रहा है? सवाल थोड़े तल्ख है क्यों कि बात केवल रोहित कि नहीं है बात तो आम आदमी कि है क्यों कि जब एक बड़े टीवी चेनल के जाने माने न्यूज एंकर की मृत्यु का सच सामने नहीं आ सकता तो उन गरीबों कि मौत का सच कैसे सामने आएगा जो सोशल मीडिया पर चीख चीख कर देश कि सरकार और मीडिया दोनों को कि कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे है?

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रोहित की म्रत्यु पर पत्रकार प्रज्ञा और पत्रकार धर्मेन्द्र के यह विडियों देखिए इन दो विडियों को देखकर आपको क्या लगता है हकीकत क्या है अपने आप से सवाल कीजिए क्यों सरकार ने अब तक अपने आप से सवाल करने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है? दोनों विडियों आपके सामने है….

दिन रात न्यूज चैनलों पर डिबेट देखकर क्या लगता है? क्या ऐसा नहीं लगता है कि देश के बड़े बड़े न्यूज चैनल दिन भर डिबेट में बड़े बड़े डाक्टरों को बुलाकर ऑक्सीज़न पर बहस कर और नेताओं को बुलाकर उन्हे सफाई देने का मौका दे रहे है? जबकि उन टीवी चैनलों को उन लोगों को डिबेट में बुलाना चाहिए जिनहोने अपने परिवार के सदस्यों को खो दिया, उनसे यह पूछना चाहिए कि उन्होने किस अस्पताल को कितना बिल चुकाया? उन्हे अस्पताल में कैसी सेवाएँ मिली? क्या डाक्टर बिस्वरूप जैसे लोगो को डिबेट में बुलाना नहीं चाहिए जो यह दावा कर रहे है कि कोरोना एक अंतर्राष्ट्रीय एक क्षडियंत्र है? या फिर देश कि मीडिया यह तय कर चुकी है कि वो जो दिखाएगी वही देखना होगा जनता क्या देखना चाहती है उससे उनका कोई लेना-देना नहीं? डाक्टर बिस्वरूप का यह विडियों भी आपके सामने है….

सोचने वाली बात यह है कि जब देश में पहली बार कोरोना आया तभी यह घोषणा कर दी गई थी कि कोरोना कि दूसरी लहर आएगी, अब जब कोरोना कि दूसरी लहर चल रही है तो कह दिया है कि कोरोना कि तीसरी लहर आएगी, क्या तीसरी आएगी तब चौथी, और चौथी आएगी तब पाँचवी लहर कि घोषणा होगी? यह सब क्या हो रहा है? सरकारों को यह कैसे पता चलता है कि इसके बाद कोई लहर आएगी भी या नहीं? कोरोना अपने साथ कोई लिखित संदेश तो लेकर आता नहीं कि वह अगली बार कब आएगा? ऐसे में अभी से तीसरी लहर कि बात कहीं ना कहीं पैनिक पैदा कर, वैक्सीन लगवाने के लिए कोई मार्केटिंग तो नहीं? यह सवाल क्यों किया जा रहा है यह जानने के लिए आप एक बार अपने मोबाइल का केलकुलेटर निकालकर, देश कि आबादी 135 करोड़ को वैक्सीन का एक डोज़ कितने में लगेगा और एक डोज़ के लिए वैक्सीन पर कितना खर्च होगा, गुणा कीजिए। उसके बाद कितने डोज़ लगेंगे, कितनी वैक्सीन का वेस्टेज होगा, स्टोरेज का खर्चा, वैक्सीन लगाने का अन्य खर्चा यह सब जोड़िए। फोर्ब्स के मुताबिक सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के चेयरमैन साइरस पूनावाला की कुल संपत्ति 11.5 अरब डॉलर है, जो सालभर में लगभग दोगुनी हो गई।

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इतनी बड़ी रकम के पीछे का सच कुछ भी हो सकता है। क्यों कि वैक्सीन लगाने के बाद भी कोई गारंटी नहीं। एक और पत्रकार बंधु है गिरिजेश वशिष्ठ इनका यह विडियों देखिए यह भी काफी तेजी से वायरल हो रहा है और कई सवालों को जन्म दे रहा है। लेकिन गोदी मीडिया यह सब नहीं दिखा रहा है गोदी मीडिया के पास विज्ञापन दिखने के लिए समय है लेकिन वह सच दिखने के लिए समय नहीं है जो जनता देखना चाहती है? खेर जनता भी सब देख रही है समझ रही है लेकिन उसे पता नहीं है कि उसे जो बदलाव चाहिए वह वो बलदाव कैसे लाए।

एक माह होने को आया है लोग NDTV के रवीश कुमार का इंतजार कर रहे है लोगों का यह इंतजार देखकर दूसरे पत्रकारों को ईमानदारी का दामन थामना चाहिए, ट्रोल तो रवीश भी बहोत हुए, लेकिन उन्होने इस युग में जो अपना दर्शक वर्ग बनाया है वह दूसरे पत्रकारों को चेलेंज के रूप में लेना चाहिए, ताकि पत्रकारिता से समाज को वो मिले जिसके लिए पत्रकारिता की उत्पत्ति हुई थी।