भीड़ जमा कर अपने भाव बढ़ाने में माहिर है यह नेता…

ऊपर से कड़क और अंदर से नरम…

जब भी दमन में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और जनसमस्याओं की बात आती रही वहा सबसे पहले दमन के नेता मनोज नायक ने प्रशासन के सामने उन मामलों के खिलाफ आवाज उठाई, इसके आलावे अशोक काशी, दीपेश टंडेल एवं खुशमन भी भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की लड़ाई में काफी आगे रहे, जनता को इनहोने कई बार जमा किया, आंदोलन किए, लेकिन पिछले रास्ते में पड़ी हुई इनकी नरमी कई सवाल खड़े कर रही है। यह सवाल इस लिए भी है क्यों की अब यह सभी एक ही पार्टी के झंडेतले भाजपा को आगे बढ़ाने का काम भी कर रहे है, जबकि पूर्व में यह भाजपा विरोधी होने की भूमिका भी अच्छी तरह निभा चुके है।

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अब दमन के इन क्रांतिकारी माने जाने वाले इन नेताओं को लेकर कई सवाल ऐसे उठ रहे है जिसकी कल्पना नहीं उन आंदोलनों में खड़ी जनता ने की होगी नहीं इनके विरोधियों ने लेकिन अब कई मामलों में घीरे यह नेता आनेवाले समय में जनता से कोनसा नया वादा करते है यह देखने की बात है। लेकिन पिछले कुछ आंदओलनों और इनकी कार्यप्रणाली की समीक्षा करे तो पता लगता है की इन नेताओं ने जनता से उनके हकों को दिलाने का वादा तो किया लेकिन बाद में इनके हकों के कारण शायद इनकी नरमी कहीं न कहीं इनकी अब तक की भूमिकाओं में सवालों की गंध ने जगह ले ली है। वहीं कुछेक मामले ऐसे है जिनमे भलेही यह प्रशासन का विरोध करते देखे गए हो लेकिन सत्ता पक्ष में रहने वाले इन नेताओं को शायद यह इल्म ही नहीं की सत्ता में सत्ता के विरोध के मायने क्या है।

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जनता को गुमराह कर अपने अपने स्वार्थसिद्ध करने की राजनीति तो वैसे बरसों पुरानी है लेकिन जनता से दगाबाजी का अंजाम तो केवल चुनावों में नजर आता है। बताया जाता है दमन मे भी जल्द पंचायत और निगम के चुनाव आने वाले है,शायद उन चुनावों का समय नजदीक आने तक यह पुनः अपने कड़े रुख में आ जाए लेकिन उसके बाद यह नरमी में कब तक लौटेंगे यह तो जनता भी जानती है।

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किन किन मामलों में उठाई प्रशासन के समक्ष आवाज,और क्यों बदल गए इनके सुर शायद यह सवाल इनसे जनता ही पूछे तो बेहतर होगा।