गिरता रुपया, बढ़ती महंगाई, गांव हो या शहर, हर जगह दिखेगा असर

गुरुवार को रुपये ने एक बार फिर अपना पिछला निचला स्तर तोड़कर गिरावट का नया स्तर हासिल किया है। रुपये की इस कमजोरी का असर हर किसी पर पड़ेगा चाहे वह गांव में रहता हो या शहर में। आयातक, नियार्तक, विदेश में पढ़ने वाले छात्र, निवेशक, सामान्य उपभोक्ता सभी को रुपये की इस कमजोरी का असर झेलना होगा। वर्ष 2023 में दुनिया आर्थिक मंदी का सामना कर सकती है। वर्ल्ड बैंक ने इसको लेकर चेतावनी जारी की है। इसके पीछे वजह, दुनिया भर के सेंट्रल बैंकों द्वारा आर्थिक नीतियों को सीमित किया जाना बताया गया है। वर्ल्ड बैंक ने अपनी नई रिपोर्ट में प्रोडक्शन तेज करने के साथ ही सप्लाई की बाधाओं को दूर करने के लिए भी कहा है, ताकि महंगाई नियंत्रित रह सके। रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक मंदी के कई इंडिकेटर्स इस बारे में पहले से ही संकेत दे रहे हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि 1970 की मंदी से उबरने के बाद अब ग्लोबल इकोनॉमी सबसे कठिन दौर में है।

डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी की वजह दरअसल अमेरिकी फेडरल रिजर्व की कल की ब्याज दर में 0.75 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। यही नहीं यूरो और स्टर्लिंग समेत छह प्रमुख मुद्राओं की तुलना में डॉलर की मजबूती को आंकने वाला डॉलर सूचकांक सबसे ऊंचे स्तर 111.65 पर पहुंच गया है।

 

एचडीएफसी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा, फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख और रूस तथा रूस-यूक्रेन के बीच तनाव और बढ़ने से प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर में तेजी आई। अन्य एशियाई मुद्राओं की तरह रुपया भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। घरेलू अर्थव्यवस्था में मजबूती आने के बाद भी रुपये में गिरावट का मौजूदा रुख जारी रह सकता है।

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आर्थिक मंदी के कारण 

  • आर्थिक मंदी का प्रमुख कारण धन का प्रवाह रुक जाना है। धन के प्रवाह से आशय है कि लोगों की खरीदने की क्षमता घट जाना है और इसलिए वह बचत भी कम कर पाते हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती है, जिससे महंगाई दर बढ़ जाती है और लोग अपनी आवश्यकता की चीजे नहीं खरीद पाते है।
  • डॉलर के मुकाबले रुपये की घटती हुई कीमत भी इसका मुख्य कारण है।
  • आयात के मुकाबले निर्यात में गिरावट होने से देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाता और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी देखने को मिलती है।
  • अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर की वजह से भी दुनिया में आर्थिक मंदी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका असर भारत पर भी हो रहा है।
  • मंदी के समय निवेश कम हो जाता है क्योंकि लोगों की आय कम हो जाती है।

बढ़ेगी आम आदमी की मुसीबत

रुपये में जैसे-जैसे कमजोरी बढ़ेगी आम आदमी की मुसीबत भी बढ़ेगी। इसकी वजह है हमारे देश का बहुत सारी चीजों के लिए आयात पर निर्भर रहना। ज्यादातर आयात-निर्यात अमेरिकी डॉलर में ही होता है इसलिए बाहरी देशों से कुछ भी खरीदने के लिए हमें अधिक मात्रा में रुपये खर्च करने पड़ेंगे। हम अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी ईंधन यानी कच्चा तेल और कोयला आयात करते हैं। यूक्रेन संकट के बाद कच्चा तेल महंगा हुआ है। इससे आयात महंगा होता गया और व्यापार घाटा बढ़ता गया। कमजोर रुपये से आयात महंगा बना रहेगा और इससे घरेलू उत्पादन और जीडीपी को अल्पअवधि में नुकसान पहुंचेगा।

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महंगाई की मार में तेजी आएगी

धिकतर मोबाइल और गैजेट का आयात चीन और अन्य पूर्वी एशिया के शहरों से होता और अधिकतर कारोबार डॉलर में होता है। विदेशों से आयात होने के कारण इनकी कीमतों में इजाफा तय है, मतलब मोबाइल और अन्य गैजेट्स पर महंगाई बढ़ेगी और आपको ज्यादा खर्च करना होगा। आपके किचन में इस्तेमाल होने वाले सरसों और रिफाइंड तेल सब महंगे हो जाएंगे। इसके अलावा जिन भी पैकेज्ड वस्तुओं में खाने के तेल का इस्तेमाल होता है, वो भी महंगी हो जाएंगी जैसे आलू के चिप्स, नमकीन वगैरह।

व्यापार घाटा बढ़ा

देश का व्यापार घाटा भी बढ़ा है। जून में देश का व्यापार घाटा 26.18 अरब डॉलर रहा। भले इस अवधि में देश का एक्सपोर्ट 23.5% बढ़ा है, लेकिन इसके मुकाबले में आयात कहीं और ज्यादा बढ़ा है। जून 2022 में देश का आयात सालाना आधार पर 57.55% बढ़ गया है। ऐसे में व्यापार घाटा भी बढ़ा है. जून 2021 में भारत का व्यापार घाटा महज 9.60 अरब डॉलर था।

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आरबीआई लगातार कर रहा प्रयास

इस बीच देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भी तेज गिरावट आई है। रुपये को संभालने के लिए आरबीआई ने खुले मार्केट में डॉलर की बिक्री भी की है, लेकिन ये प्रयास नाकाफी दिखाई दे रहे हैं। पिछले कुछ महीनों के आंकड़े बता रहे हैं कि रिजर्व बैंक लगातार खुले बाजार में अपने डॉलर की बिकवाली कर रहा है।

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आरबीआई ने 2022-23 के लिए महंगाई दर 6.7 फीसदी रहने का अनुमान जताया है। वहीं जीडीपी ग्रोथ रेट 7.2 फीसदी रहने का अनुमान है। खाद्य पदार्थों की कीमत में इजाफे के चलते भारत की रिटेल महंगाई दर अगस्त में 7 फीसदी तक पहुंच गई थीं, जबकि जुलाई में यह 6.71 फीसदी थी। वहीं कंज्यूमर इंफ्लेशन रेट लगातार आठवें महीने, सेंट्रल बैंक द्वारा तय 4 फीसदी की लिमिट के ऊपर रहा है। हालिया वर्ल्ड बैंक रिपोर्ट बताती है कि केवल इंट्रेस्ट रेट्स बढ़ाना महंगाई को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए देशों को सामानों की उपलब्धता में भी इजाफा करना होगा। वर्ल्ड बैंक प्रेसीडेंट ने कहा कि पॉलिसी मेकर्स को खपत कम करने पर फोकस करने के बजाए उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।