पहले दिन हुआ पूर्णिमा का श्राद्ध, आज प्रतिपदा का श्राद्ध

जोधपुर। अपने पूर्वजों और दिवंगतों की आत्मिक शांति और उनके प्रति श्रद्धा से जुड़ा ‘श्राद्ध पक्ष’ शुक्रवार से शुरू हुआ। पहले दिन पूर्णिमा का श्राद्ध मनाया गया। सुबह लोगों ने अपने पितरों की शांति और घर में बरकत के लिए पूर्णिमा श्राद्ध किया। शहर के पवित्र जलाशयों में विद्वजन पंडितों की तरफ से तर्पण कार्य करवाया गया। यमजानों ने अपने श्रद्धानुसार दान दक्षिणा भी दी। दोपहर में ब्राह्मण भोज के बाद घर के सदस्यों के अलावा परिचितों को भोज करवाया गया।

भारतीय कैलेंडर की तिथि अनुसार देवलोक हुए पूर्वजों के नाम पर पूर्णिमा पर सगोत्र उच्चारण कर तिल, जौ, कच्चे दूध, पुष्प, डाब के साथ घरों अथवा पवित्र जलाशयों पर तर्पण किया गया। शुक्रवार को पूर्णिमा के श्राद्ध पर शहर के गुलाबसागर, रानीसर पदमसर, हाथी बावड़ी, कायलाना एवं तख्त सागर में श्राद्ध कर्म संपन्न करवाए गए। सुबह इन पवित्र स्थलों पर काफी यजमानों की भीड़ देखने को मिली। यहां लोगों ने पितरों की शांति के लिए तर्पण किया। हिंदुओं में श्राद्ध पितरों का सबसे पड़ा पर्व माना जाता है। पूर्णिमा से अमावस्या तक यह 16 दिन का होने से इसे सोलह श्राद्ध कहते है लेकिन तिथियां घटने-बढऩे के साथ इसके दिन कम-ज्यादा होते है। इस बार श्राद्ध पक्ष (पितृपक्ष) की शुरुआत शुक्रवार को पूर्णिमा से हुई। प्रतिपदा तिथि का श्राद्ध 14 और द्वितीया का श्राद्ध 15 सितम्बर को होगा। सोमवार को द्वितीया तिथि दोपहर 2.35 बजे तक ही होने के कारण इस दिन श्राद्ध नहीं होगा। तृतीया का श्राद्ध 17 सितम्बर, चतुर्थी का श्राद्ध 18 सितम्बर, पंचमी का श्राद्ध 19 सितम्बर को होगा। छठ, सप्तमी, अष्टमी, नवमी व दशमी तिथि का श्राद्ध क्रमश: 20, 21, 22, 23, 24 सितम्बर को होगा। एकादशी और द्वादशी का श्राद्ध 25 सितम्बर को संयुक्त रूप से होगा। इसके बाद त्रयोदशी, चतुर्दशी और सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध क्रमश: 26, 27 और 28 सितम्बर को मनाया जाएगा। शास्त्रोक्त विधान के अनुसार एक पखवाड़े तक पितृपक्ष के दौरान मांगलिक कार्य टाले जाएंगे। ऐसी मान्यता है कि भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म और तर्पण करने से पितरों को शांति और मुक्ति मिलेगी। यदि किसी व्यक्ति को अपने पितरों की तिथि नहीं पता है तो वह अमावस्या के दिन श्राद्ध कर सकता है और अपनी सामथ्र्यनुसार एक या एक से अधिक ब्राह्मणों को भोजन करा सकता है। कई विद्वानों का यह भी मत है कि जिनकी अकाल मृत्यु हुई है या विष से अथवा दुर्घटना के कारण मृत्यु हुई है उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन करना चाहिए। एेसे परिजन जिनकी मृत्यु की तारीख (तिथि) पता नहीं हो तो उनका पितृपक्ष की विशेष तिथियों में श्राद्धकर्म किया जाता है। किसी परिजन की अल्पायु में मृत्यु हुई हो तो उसका पंचम तिथि और नवमी तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवगंत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है। अकाल मृत्यु वाले परिजन का श्राद्ध पक्ष की चतुर्दशी को व सर्वपितृमोक्ष अमावस्या पर श्राद्ध किए जाने से सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है।

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