किसान आंदोलन का एक महीना और सरकार का अड़ियल रवैया

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भारत में किसान आंदोलन की शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत के वक्त तकरीबन 1859 से हुई थी और तब से लेकर किसान अपने हक की मांग करता आ रहा है इसके अनंतर फिर

1872 में कूका विद्रोह, 1874 में दक्कन विद्रोह, 1879 से रामोसी किसान विद्रोह, ताना भगत आंदोलन 1914, गांधी जी का 1917 में चंपारण सत्याग्रह और 1918 में खेड़ा सत्याग्रह, 1919 में उत्तर प्रदेश किसान आंदोलन, 1920 का मोपला विद्रोह 1922 में बारदोली सत्याग्रह, 1946 में तेभागा आंदोलन तथा 1946 में ही तेलंगाना किसान आन्दोलन प्रमुख रूप से हुए. लेकिन ब्रिटिश दासता से लेकर इतने किसान आंदोलन होने के बावजूद भी किसानों को अपना उचित इख्तियार ना मिला. वहीं 21वीं सदी की शुरुआत के उपरांत तो मानो ऐसा प्रतीत हुआ कि किसानों के मुद्दों को लेकर सियासत की आवाज हर जगह गूंजने लगी हो. इस दौर में तो किसानों के मुद्दों को राजनीतिक मुद्दों के रूप में तब्दील कर कट्टरता का बीज बो दिया है.

गौर करने योग्य है कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने से लेकर अब तक किसान आत्महत्याओं के तथ्यांक काफी बढ़ गए हैं द वायर की रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के कार्यकाल में किसान आत्महत्या दर में 45 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है हालांकि यह अल्फाज कांग्रेस पार्टी के है रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि औसतन 35 किसान रोज आत्महत्या कर रहे हैं. वहीं पिछले 3 सालों में 38000 किसानों ने आत्महत्या की है

2020 में भारत की केंद्र सरकार ने जून माह के पहले सप्ताह में तीन कृषि आध्यादेशों को प्रख्यापित किया जो कृषि उपज, कृषि बिक्री, कृषि विपणन आदि से संबंधित थे इन 3 विधेयकों में  किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा अधिनियम पर किसानों के (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौते

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तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम थे जिन्हें 22 सितंबर तक संसद में पारित कर दिया गया और 28 सितंबर को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो गए. लेकिन भारतीय किसानों को यह कृषि बिल बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं लगे परिणाम स्वरूप 9 अगस्त से किसानों ने कृषि कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन का आगाज़ किया और लगभग 27 नवंबर से मुख्य रूप में किसान विरोध प्रदर्शन सड़कों पर देखने मिला यह किसान आंदोलन विशिष्ट रूप से पंजाब और हरियाणा के किसानों ने मिलकर शुरू किया एवं निरंतर किसान विरोध प्रदर्शन को चलते हुए तकरीबन एक महीना हो चुका है इसके बावजूद भी सरकार अपने अड़ियल रवैये पर कायम है.

किसान विरोध प्रदर्शन को लेकर 8 दिसंबर को भारत बंद किया गया जिसमें ट्रांसपोर्ट, दुकानें, रेस्टोरेंट आदि को बंद किया गया. इसके साथ किसान विरोध प्रदर्शन के समर्थन में कई खिलाड़ियों एवं कलाकारों ने अपने अवॉर्ड्स वापस करने की घोषणा की. आपको आगाह कर दें कि इससे पहले संसद में प्रस्तावित कृषि विधेयक को किसान विरोधी बताकर केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर ने इस्तीफा दे दिया था.

कृषि कानूनों के विरोध को लेकर दिल्ली आ रहे किसानों पर पुलिस द्वारा रोकने हेतु वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया लेकिन इसके बावजूद भी किसानों को पुलिस प्रशासन एवं सरकार रोक ना सकी. सूत्रों के मुताबिक लगभग 500 से अधिक किसान संघ कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं और 14 मिलियन से अधिक ट्रक ड्राइवर, बस ड्राइवर, ऑटो ड्राइवर आदि परिवहन यूनियनें किसानों के अनुमोदन में आयीं साथ ही किसान आंदोलन में प्रदर्शनकारियों के लिए गुरुद्वारे की ओर से लंगर की व्यवस्था भी की गई.

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सबसे ज्यादा कृषि बिल के खिलाफ किसानों का विरोध प्रदर्शन पंजाब हरियाणा व उत्तर प्रदेश में हुआ लेकिन कर्नाटक, तमिलनाडु, ओडिशा, केरल, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के हिस्सों में भी कृषि बिल के विरोध में किसानों का प्रदर्शन हुआ है किसान यूनियनों ने घोषणा की कि 4 दिसंबर को वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और निगमों के नेताओं के पुतले जलाएंगे इसके बाद पीएम मोदी व कई नेताओं के पुतले जलाए गए.

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कृषि कानूनों के विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों द्वारा धनसा सीमा, झरोदा कलां सीमा, टिकरी सीमा, सिंघू सीमा, कालिंदी कुंज सीमा, चिल्ला सीमा, बहादुरगढ़ सीमा और फरीदाबाद सीमा सहित कई सीमाओं को अवरुद्ध कर दिया गया. किसान आंदोलन में किसानों ने तीनों कृषि कानून निरस्त करने की मांग सहित और अन्य मांगे भी की. लेकिन मौजूदा सरकार के केंद्रीय मंत्रियों ने लगातार कृषि कानूनों को सही ठहराया. इस आंदोलन के दौरान सत्तासीन मंत्रियों ने किसानों को मनाने की बहुत कोशिशें की लेकिन उनकीं मागों को नहीं माना और समझाइश दी कि कृषि कानून किसान हितैषी हैं वर्तमान सरकार के केन्द्रीय मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह, नरेंद्र सिंह तोमर, पियूष गोयल, प्रकाश जावड़ेकर आदि मंत्रियों ने किसान आंदोलन में किसानों से वार्ता की और कृषि आध्यादेशों को सही बताया लेकिन किसानों की मांगों को नहीं माना. वहीं इस किसान आंदोलन में पीएम मोदी ने चुप्पी तोड़ते हुए यही कहा कि कृषि कानून किसानों के हित में है साथ ही कहा कि विपक्ष कृषि कानूनों को लेकर किसानों को गुमराह कर रहा है. किसान आंदोलन के समर्थन में देश के कई विपक्षी दल खुलकर सामने आए जिनमें कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, आरजेडी, बसपा सहित आदि राजनीतिक दलों ने किसान आंदोलन का समर्थन किया तथा किसानों के साथ विपक्षी नेताओं में राहुल गांधी, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, प्रियंका गांधी, सीताराम येचुरी, ममता बनर्जी, बहिन मायावती सहित आदि विपक्षी नेताओं ने किसान आंदोलन का समर्थन कर कृषि कानूनों का विरोध किया.

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कृषि कानून के विरोध में प्रमुख रूप से किसान नेताओं में सतनाम सिंह पन्नू, जोगिंदर सिंह, सुरजीत सिंह, बलवीर सिंह, कमलप्रीत, बलवंत बहराम, राकेश टिकैत सहित आदि नेताओं ने विरोध प्रदर्शन में किसानों का साथ दिया.

वहीं किसान आंदोलन के समर्थन में सरकार के रवैये से आहत होकर संत बाबा राम सिंह ने हरियाणा के करनाल में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली तथा अब तक किसान विरोध प्रदर्शन में 22 किसानों की मौत हो चुकी है लेकिन फिर भी सरकार को अपने कृषि कानून मुनासिब लग रहे हैं

विचारणीय है कि किसान आंदोलन को लेकर सरकार बार-बार यह कह रही है हम किसान हितेषी हैं और किसानों का हित चाहते हैं तो सरकार किसानों की मांगों को पूरा क्यों नहीं कर रही है?

लेखक: सतीष भारतीय.