वापी के चला में ख़रीदी जमीन 11 रुपये फुट…

fortune square Chala Vapi
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VAPI : बात काले धन कि है इस लिए ख़बर कि शुरुआत, नोट बंदी से करते है, क्यो कि अब तक काले धन पर सरकार सबसे बड़ी चोट, नोट बंदी रही है। सरकार ने नोट बंदी काले धन के सफ़ाये के लिए की थी। लेकिन लगता है जिस तरह समय रहते चोट का घाव अपने आप ठीक हो जाता है और चोट का असर ख़त्म हो जाता है वैसे ही काले धन पर सरकार द्वारा नोट बंदी के नाम पर काले धन पर कि गई चोट का असर भी ख़त्म हो हो गया है और एक बार फिर काले धन का लेन-देन करने वालों ने अपने पांव पसारने शुरू कर दिए है।

जहां तक काले धन कि बात है तो किस व्यापार अथवा व्यवसाय में काले धन का लेन-देन नहीं होता यह तो कहना काफी मुश्किल है। लेकिन किन व्यापारों और व्यवसायों में काले धन का लेन-देन सबसे अधिक होता है यह कहना इतना मुश्किल नहीं। काले धन का निवेश करने और दो-नंबर के पैसे को ठिकाने लगाने के लिए, कई विकल्पों में से एक सरल विकल्प रियल स्टेट में निवेश बताया जाता है। रियल स्टेट एक ऐसा कारोबार है जिसमे सबसे अधिक काले धन का लेन-देन होता है। खरीद-बिक्री चाहे किसी जमीन कि हो या जमीन पर बनी इमारत में किसी मकान या दुकान कि काले धन के लेन-देन के बिना ना जमीन खरीदी जाती है ना जमीन में बनी इमारत में मकान, दुकान बेची जाती है।

मकान और दुकान खरीदने वाला ख़रीदार, बिल्डर को देने वाला काला धन, नगद कहा से लाया, किससे चुराया और कहा डाका डाला?  इससे बिल्डर को कोई फर्क नहीं पड़ता। बिल्डर भी जमीन खरीदते वक्त जो नगद रकम अदा करता है वह रकम बिल्डर को किसने दी, जिसने दी वह उस नगद रकम को कहा से लाया, इससे भी जमीन बेचने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ता। काले-धन के रूप में करोड़ों रुपये नगद देकर बिल्डर जमीन खरीदता रहता है और उसी जमीन पर इमारत बनाकर, काले धन की वसूली के लिए वह ग्राहकों से नगद काला धन मांगता है। वैसे आपको बता दे कि भारत सरकार के वित्त मंत्रालय तथा आयकर विभाग के नियमों के अनुसार काले धन कि लेन-देन अपराध है और ऐसा करने पर जुर्माना और दण्ड दोनों का प्रावधान है। भारत सरकार तथा वित्त मंत्रालय द्वारा टैक्स वसूलने के लिए आयकर विभाग कि स्थापना की यदि कोई टैक्स चोरी करता है तो उस पर भी आयकर अधिकारी कार्यवाही कर सकते है। लेकिन यदि आयकर अधिकारी अंखे बंद कर बैठे रहे और टैक्स चोरो को टैक्स चोरी करने देते रहे तो यह देश कैसे चलेगा, देश का विकास कैसे होगा? इस सवाल के बारे में आगे विस्तार से चर्चा करेंगे फिर्ल्वक्त पुनः मुद्दे पर आते है।

  • आयकर अधिकारियों की कार्यप्रणाली शंका के दायरे में।
  • जिस बिल्डिंग में आयकर विभाग के कार्यालय उस बिल्डिंग में भी टेक्स चोरी।
  • बिल्डरों की टैक्स चोरी से देश को करोड़ों का नुकसान। आयकर अधिकारी तो टैक्स चोरो के किराएदार है अब कार्यवाही कौन करेगा?
  • ई-डी और सीबीआई को जांच करने कि जरूरत!

मुद्दा है काले धन और नगद में लेन-देन करने का। तो आपको बता दे कि देश में ऐसे कई बिल्डर है जो नगद में करोड़ों के काले-धन की लेन-देन करते है। लेकिन फ़िलवक्त हम वापी, दमण और दादरा नगर हवेली के बिल्डरों की बात करते है। वापी, दमण तथा दादरा नगर हवेली में कई ऐसे बिल्डर है जो बे-धडक करोड़ों के काले-धन की लेन-देन कर रहे है। इतना ही नहीं वह ग्राहकों, ख़रीदारों के साथ खुलेआम धोखा-धड़ी भी कर रहे है। दिनांक 22-07-2019 को क्रांति भास्कर ने वापी के ऐसे ही एक बिल्डर दर्शक शाह और भावेश शाह के फॉर्च्यून ग्रुप तथा लेंडमार्क प्रोजेक्ट में, करोड़ों के काले-धन की लेन-देन पर प्रमुखता से ख़बर प्रकाशित की थी। दर्शक शाह और भावेश शाह फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक है और फॉर्च्यून ग्रुप के, वापी, दमण और दादरा नगर हवेली में कई प्रोजेक्ट है।

वापी के चला में ख़रीदी जमीन 11 रुपये फुट... - वापी समाचार

दिनांक 22-07-2019 को क्रांति भास्कर ने फॉर्च्यून ग्रुप के प्रोजेक्ट, लेंडमार्क के बारे में यह ख़बर प्रकाशित कि थी की उक्त बिल्डर वापी जीआईडीसी में स्थित लेंडमार्क प्रोजेक्ट में 5700 रुपये के दस्तावेज़ पर 16500 रुपये तक ग्राहकों से वसूल रहा है। जिसमे 5700 रुपये वाईट के और बाकी बची रकम ब्लेक में वसूली जा रही है। दिनांक 22-07-2019 को क्रांति भास्कर द्वारा प्रकाशित उक्त ख़बर आप क्रांति भास्कर कि वेबसाइट पर देख सकते है। अब सवाल यह है कि क्या आयकर अधिकारियों ने फॉर्च्यून ग्रुप के प्रोजेक्ट, लेंडमार्क में करोड़ों के काले धन मामले में कोई कार्यवाही कि या छापे-मारी कि? तो इसका जवाब है नहीं। अब कार्यवाही क्यो नहीं कि यह सवाल तो वित्त मंत्रालय के वित्त मंत्री को वापी में बैठे आयकर अधिकारियों से करना चाहिए। क्यो की आयकर अधिकारियों का यही काम है कि वह काले-धन और नगद में हो रही करोड़ों की लेन-देन में होने वाली टैक्स चोरी को रोके और टैक्स चोरी करने वालों पर नियमानुसार कार्यवाही करें।

सभी प्रोजेक्टो में रेरा नियमों का उलंधन। रेरा रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग।

वैसे सोचने वाली बात यह भी है कि आज एक दूध का पेकेट खरीदते वक्त भी उतनी ही क़ीमत अदा कि जाती है जीतने का दुकानदार बिल देता है, और दुकादार उतनी ही रकम का बिल बनाता है, जितनी क़ीमत दूध पर अंकित होती है। अंकित रकम यानि बिल की रकम से अधिक रकम वसूलने को, सीधी भाषा में ग्राहक के साथ धोखा-धड़ी कह सकते है। अब यदि दस्तावेज़ को बिल मान लिया जाए तो फॉर्च्यून ग्रुप के लेंडमार्क प्रोजेक्ट में दुकान ख़रीदारों से, दस्तावेज़ कि रकम से अधिक धन वसूलना ग्राहकों के साथ धोखा-धड़ी ही है। बिल्डर ग्राहकों के साथ यह धोखा-धड़ी कर, जहां एक और ग्राहकों को चुना लगा रहा है वही दूसरी और काले धन का लेन-देन कर, भारत सरकार को भी चुना लगा रहा है। इतना ही नहीं दस्तावेज़ कि रकम से अधिक धन वसूलकर, लेंडमार्क प्रोजेक्ट के बिल्डर दर्शक शाह और भावेश शाह, रेरा एक्ट का भी उलंधन कर रहे है। रेरा एक्ट को भी धत्ता बता रहे है। रेरा एक्ट के तहत जिस प्रोजेक्ट में बिल्डर ने बुकिंग के लिए ग्राहक से धन लिया, उसकी जानकारी रेरा संबन्धित विभागों को देनी होती है साथ ही साथ यह भी देखा जाता है कि बुकिंग के लिए, लिया गया पैसा बिल्डर उसी प्रोजेक्ट में निवेश कर रहा है या नहीं, ऐसा ना करने पर बिल्डर का रेरा के तहत हुए रजिस्ट्रेशन को रद्द कर दिया जाता है।

लेंडमार्क प्रोजेक्ट के बिल्डर दर्शक शाह और भावेश शाह द्वारा काले धन की लेन-देन और दस्तावेज़ से अधिक वसूली को देखकर लगता है कि उक्त बिल्डर को ना ही भारत सरकार के नियमों कि परवाह है ना ही आयकर विभाग के नियमों की और ना ही रेरा एक्ट के नियमों की।

फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह के एक और प्रोजेक्ट कि काफी चौकाने वाली जानकारी सामने आई है। प्रोजेक्ट है वापी चला में स्थित फॉर्च्यून स्क्वेयर। इस प्रोजेक्ट की जमीन के दस्तावेज़ क्रांति भास्कर के हाथ लगे है दस्तेवाजों को देखकर लगता है अब तक फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह भारत सरकार और आयकर विभाग को करोड़ों का चुना लगा चुके है।

क्रांति भास्कर की टिम को चला स्थित फॉर्च्यून स्क्वेयर प्रोजेक्ट कि जमीन के दो दस्तावेज़ मिले है। पहला दस्तावेज़ है 31581 स्केवेयर फिट जमीन का, जिसका सर्वे नंबर 110/अ/2 है और दूसरा दस्तावेज़ है 27232 स्क्वेयर फिट जमीन का, जिसका सर्वे नंबर 111 है।

सर्वे नंबर 110/अ/2 वाली 31581 स्केवेयर फिट जमीन कि खरीद दस्तावेज़ में 2581920 रुपये बताई गई है यानि कि 81.75 रुपये प्रति स्क्वेयर फिट। सर्वे नंबर 111 कि 27232 स्क्वेयर फिट जमीन कि खरीद 3000000 रुपये बताई गई है यानि 11 रुपये प्रति स्क्वेयर फिट। अब आप सोच रहे होंगे कि यह कैसे मुमकिन है! इतने कम दामों में तो किसी जंगल में भी जमीन नहीं मिलती, फिर वापी के चला क्षेत्र के मुख्य मार्ग पर इतनी सस्ती जमीन कैसे मिल गई। तो इसका सच यह है कि जमीन सस्ती नहीं है बल्कि सिर्फ भारत सरकार को चुना लगाने के लिए दस्तावेज़ में जमीन कि रकम इतनी कम दिखाई गई है। वैसे इस एक जमीन के दस्तावेज़ सामने आने के बाद अब फॉर्च्यून ग्रुप के सभी प्रोजेक्टो की जमीन के दस्तावेज़ आयकर विभाग के अधिकारियों को मंगवाकर देखने चाहिए कि और पता लगाना चाहिए कि फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह है अपने अन्य प्रोजेक्टों में कितने घोटाले किए तथा भारत सरकार को कितना चुना लगाया।

6 वर्ष निकल गए तो फिर हाथ मलते रह जाएंगे!

वैसे बड़े ताज्जुब कि बात है कि इसी जमीन पर बने प्रोजेक्ट में आयकर विभाग के कार्यालय स्थित है, इसी बिल्डर के यहाँ आयकर विभाग के कार्यालय, किराए पर है और आयकर विभाग के अधिकारियों को पता ही नहीं कि उनके नाक के नीचे बिल्डर दर्शक शाह क्या कर रहे है, या फिर सबकुछ जानते बुझते आयकर अधिकारी दर्शक शाह और भावेश शाह साथ दे रहे है? खेर उक्त ख़बर के बाद आयकर विभाग उक्त जानकारी से अनभिज्ञ नहीं रहा, अब वह जांच कर सकता है और कार्यवाही भी कर सकता है बशर्ते वह अपना काम और जांच पूरी ईमानदारी से करें। क्यो कि समय पर कार्यवाही नहीं हुई तो समय निकल जाने के बाद आयकर विभाग के अधिकारी कुछ नहीं कर पाएंगे, क्यो कि आयकर अधिकारियों का कहना है कि वह 6 वर्ष पूर्व तक के मामलों में दखल दे सकती है यदि टैक्स चोरी करने के बाद 6 वर्ष निकल गए तो कार्यवाही करने के लिए उसके पास कोई अधिकार नहीं।

  • नेताओं के भ्रष्टाचार का काला धन रियल स्टेट में।
  • नेताओं कि हफ़्ता-वसूली का काला धन रियल स्टेट में।
  • सरकारी अधिकारियों कि रिश्वतख़ोरी का काला धन रियल स्टेट में।
  • स्मगलिंग करने वालों का काला धन रियल स्टेट में।

अब इस जानकारी के बाद यह सवाल भी उठता है कि 6 वर्ष पूर्व में फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह ने टैक्स चोरी की तो उसका जिम्मेदार कौन है? सवाल इस लिए क्यो की मामला चंद रुपयों का नहीं बल्कि करोड़ों की टैक्स चोरी का है। इस लिए करोड़ों की टैक्स चोरी के पीछे एक कारण आयकर अधिकारियों लापरवाही का नताजी भी हो सकता है। सवाल यह भी है कि क्या इससे पहले कभी आयकर अधिकारियों को फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह द्वारा के प्रोजेक्टो में काले धन की लेन-देन के बारे में जानकारी अथवा शिकायते मिली है? और क्या पूर्व में कभी आयकर अधिकारियों द्वारा फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह के यहा छापे-मारी की गई? यदि की गई तो उक्त छापे मारी के बाद, आयकर अधिकारियों ने उक्त बिल्डर पर कितनी पैनी नज़रे रखी? कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा की आयकर अधिकारियों की लापरवाही के चलते फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह, आज भी टैक्स चोरी जारी रखे हुए है। या फिर ऐसा भी हो सकता है कि वापी आयकर विभाग के कार्यालय में बैठे बड़े बड़े अधिकारी फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह की टैक्स चोरी की जानकारी ऊपर तक नहीं पहुँचने देते है? संशय तो है और आयकर अधिकारियों कि भूमिका भी शंकास्पद है। इस लिए अब फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह की टैक्स चोरी का भांडा फोड़ने के लिए ई-डी और सीबीआई को आगे आकार जांच करनी चाहिए, ई-डी इस लिए क्यो की वापी आयकर विभाग के अधिकारी उक्त बिल्डर पर कार्यवाही करेते दिखाई नहीं दे रहे और सीबीआई इस लिए क्यो कि फॉर्च्यून ग्रुप के मालिक दर्शक शाह और भावेश शाह के प्रोजेक्टो में ऐसे लोगो का काला धन निवेश हो सकता है जिस पर सीबीआई की पहले से ही नजर हो या जो बड़े नेता और प्रशासनिक अधिकारी हो। इस लिए यदि भारत सरकार को बड़ी टैक्स चोरी पकडनी है और आयकर अधिकारियों के चेहरे से ईमानदारी का नकाब उतारना है तो गुजरात के छोटे से शहर वापी से टैक्स चोरो को पकड़ने की नई शुरुआत करें।

वित्त मंत्रालय को क्या पता वापी में क्या चल रहा है!

वापी के आयकर विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर शंका का एक मुख्य कारण यह भी है कि अभी कुछ समय पहले ही वापी के एक आयकर अधिकारी को कुछ लाख रुपये के टैक्स चोरी मामले में आयकर विभाग द्वारा जारी नोटिस पर कार्यवाही नहीं करने के लिए, रिश्वत लेते हुए गुजरात ए-सी-बी ने पकड़ा था। जिसने आयकर विभाग के अधिकारी कि, ए-सी-बी में शिकायत कर रंगे हाथों पकड़वाया था, उसका यह कहना था कि उसने कोई टैक्स चोरी नहीं कि और आयकर विभाग के अधिकारी नोटिस पर कार्यवाही नहीं करने के लिए पैसे मांग रहे थे। अब सोचने वाली बात यह है कि जिसने टैक्स चोरी नहीं कि, उससे आयकर विभाग के अधिकारी ने रिश्वत मांगी और जिससे रिश्वत मांगी उसने शिकायत कि, इस लिए रिश्वत लेने वाला आयकर अधिकारी पकड़ा गया।

लेकिन जिसने करोड़ों की टैक्स चोरी कि उससे यदि आयकर अधिकारी रिश्वत मांगे और वह भी आयकर अधिकारियों की ए-सी-बी में शिकायत करें ऐसी संभावना की उम्मीद करना बेमानी होगी। टैक्स चोरी करने वाला भला किसी से शिकायत क्यो करेगा, वह तो यही सोचेगा कि जैसे तैसे ले-दे के मामले को रफा-दफा किया जाए! कहने का मतलब और सवाल यह है कि यदि आयकर अधिकारी बड़े बड़े टैक्स चोरो से, कार्यवाही ना करने के अवज में करोड़ों कि रिश्वत लेते रहे हो? तो भारत सरकार को करोड़ों का चुना तय है। इस लिए भारत सरकार के वित्त मंत्रालय को चाहिए कि वह सभी आयकर अधिकारियों तथा आयकर अधिकारियों के परिवार के सदस्यों कि संपत्ति, बेंक खातों और निवेश पर पैनी नजरें रखे।

दरअसल रियल स्टेट के कारोबार में काले धन कि यह चेन इतनी लंबी है कि स्पष्ट रूप से यह बयान करना काफी मुमकिन है कि इस चेन का प्रथम छोर कहा से शुरू होता है और अंतिम छोर कहा ख़त्म होता है। आने वाले अंक में पढिए कैसे मोदी के विकास रथ में रोड़ा बन रहे है वापी के आयकर अधिकारी! शेष फिर।