वलसाड, वापी और दमण, सिलवासा के बिल्डर टैक्स चोरी में अव्वल। 8 नहीं बल्कि 800 करोड़ की टैक्स चोरी का अनुमान!

जमीन, फ्लेट, दुकान जैसे प्रॉपर्टी कि खरीद-बिक्री में (काले-धन) नगद कि लेन-देन से तो लगभग सभी वाकिफ़ है। नगद (काले-धन) कि लेन-देन के सबसे मुख्य कारणों में से एक कारण है टैक्स चोरी का। क्यो कि किसी भी प्रकार कि प्रॉपर्टी खरीदने पर सबसे पहले उस प्रॉपर्टी कि कीमत के अनुसार तय नियमों के मुताबिक स्टेंप पेपर लेने पड़ते है और स्टेंप के रूप में सरकार को राजस्व मिलता है तथा जब कोई प्रॉपर्टी खरीदता है तो सरकार को यह भी पता चल जाता है कि उसके पास कितना धन है और उसने उस धन के बारे में आयकर विभाग को बताया या नहीं, यदि खरीददार ने जितनी रकम कि प्रॉपर्टी खरीदी है उस रकम का लेखा जोखा आयकर विभाग के पास नहीं होता तो आयकर विभाग प्रॉपर्टी खरीदने वाले से यह सवाल कर सकता है कि वह प्रॉपर्टी खरीदने के लिए धन कहा से लाया। वैसे काफी कम खरीददार या बिल्डर ऐसे होते है जो काले धन से ताल्लुख नहीं रखते और जिस रकम में प्रॉपर्टी बेचते है अथवा खरीदते है उतनी ही रकम कि रजिस्ट्री (दस्तावेज़) तैयार करवाकर सरकार को पूरा टैक्स अदा करते है। ज़्यादातर खरीददार और बिल्डर जमीन खरीद-बिक्री से लेकर फ्लेट, दुकान, मकान बनाकर बेचने अथवा खरीदने में बे-हिसाब काले-धन कि लेन-देन करते है और करोड़ों कि टैक्स चोरी करते है। वैसे तो देश के हर हिस्से में ऐसे बिल्डर मौजूद है जो जमीन, फ्लेट, मकान, दुकान कि खरीद-बिक्री में काला-धन वसूलकर सरकार को चुना लगाते है सरकार भी समय समय पर ऐसे बिल्डरों पर कार्यवाही करती रही है आयकर विभाग द्वारा कई बार बड़ी चपेमारी भी देखने को मिलती रहती है। लेकिन अगर गुजरात के वलसाड, वापी, दमण, सिलवसा के पास पास में स्थित क्षेत्रों में चल रहे प्रोजेक्टों तथा बिल्डरों कि बात करें तो यहाँ भी काला-धन वसूलने वाले और टैक्स चोरी करने वाले बिल्डरों कि भरमार है।

वलसाड, वापी और दमण, सिलवासा के बिल्डर टैक्स चोरी में अव्वल। 8 नहीं बल्कि 800 करोड़ की टैक्स चोरी का अनुमान! - वापी समाचार

वैसे तो क्रांति भास्कर अपने पिछले अंकों में कई बार बिल्डरों कि टैक्स चोरी और काले धन कि लेन-देन पर, कई बड़े और चौकाने वाले खुलासे कर चुका है। कई बार काले-धन कि लेन-देन और टैक्स चोरी पर क्रांति भास्कर प्रमुखता से खबरें प्रकाशित कर चुकी है। लेकिन इस बार जो खुलासा क्रांति भास्कर करने जा रही है वह अवश्य सरकार को यह सोचने पर विवश कर देगा कि असल में बिल्डर टैक्स चोरी कर रहे है या आयकर अधिकारी बिल्डरों से टैक्स चोरी करवा रहे है? यह सवाल भले-ही एक बार सरकार को करेले जैसा कड़वा लगे लेकिन सरकार भी जानती है करेले के अपने फायदे है।

खेर अब मुद्दे पर आते है। तो मुद्दा यह है क्रांति भास्कर कि टिम ने अपनी खोजी पत्रकारिता द्वारा अपने पिछले अंकों में कई बार कई बिल्डरों कि टैक्स चोरी और काले धन कि लेन-देन पर, कई बड़े और चौकाने वाले खुलासे किए। कई बार काले-धन कि लेन-देन और टैक्स चोरी पर प्रशासन कि आंखे खोलने हेतु प्रमुखता से खबरें भी प्रकाशित की। लेकिन आयकर अधिकारियों द्वारा कोई ठोस कार्यवाही देखने को नहीं मिली। अब आयकर अधिकारियों ने कोई ठोस कार्यवाही क्यो नहीं की? यह सवाल तो देश के वित्त मंत्री को उन आयकर अधिकारियों से करना चाहिए जो प्रतिमाह वेतन का इंतजार करते करते अपना अधिकतर समय जनता के पैसों से चलने वाले अतानुकूलित कार्यालय में निकाल देते है। खेर अब बात करते है टैक्स चोरी के उन आंकड़ों कि जो क्रांति भास्कर कि टिम को मिले है। तो आप को बता दे कि क्रांति भास्कर कि खोजी टिमअब तक 50 से अधिक प्रोजेक्टों के दस्तावेज़ मिले है। प्राप्त दस्तावेजों को देखकर लगता है कि वापी तथा वापी के आस पास में स्थित प्रोजेक्टों कि जमीन खरीद और बिक्री में पिछले कुछ एक वर्षों में बिल्डरों द्वारा सरकार को अब तक अरबों रुपयों का चुना लगाया जा चुका है तथा अरबों कि टैक्स चोरी कि जा चुकी है। वैसे तो जो दस्तावेज़ मिले है उनमे से अभी भी कुछ एक दस्तावेज़ ऐसे है जिनकी सत्यता को लेकर क्रांति भास्कर कि पड़ताल जारी है, लेकिन जिन दस्तावेजों कि सत्यता पर क्रांति भास्कर कि खोजी टिम अपनी पड़ताल पूरी कर चुकी है उनकी कुल रजिस्ट्रेशन क़ीमत 200 करोड़ से अधिक कि है।

वलसाड, वापी और दमण, सिलवासा के बिल्डर टैक्स चोरी में अव्वल। 8 नहीं बल्कि 800 करोड़ की टैक्स चोरी का अनुमान! - वापी समाचार

दस्तावेज़ मिलने के बाद सबसे पहले, क्रांति भास्कर कि टिम ने एक-एक कर, सभी दस्तावेजों कि अलग-अलग पड़ताल की तथा सभी दस्तावेजों में दी गई जमीन खरीद-बिक्री को लेकर अंकित रकम की सत्यता को लेकर भी एक पड़ताल की। ताकि यह पता चल सके कि जमीन जब खरीदी गई (यानि जब जमीन का रजिस्ट्रेशन हुआ) दस्तावेज़ बने, तब उक्त जमीन का भाव (क़ीमत) कितना था तथा दस्तावेज़ में जो भाव क़ीमत बताई गई है वह सही क़ीमत है या फिर सरकार को चुना लगाने के लिए, कम क़ीमत तथा गलत क़ीमत के दस्तावेज़ तैयार करवाए गए है।

पड़ताल के बाद जो जानकारी और आंकड़े सामने आए वह काफी चौकाने वाले है। पड़ताल में पता चला कि 200 करोड़ से अधिक क़ीमत के जो दस्तावेज़ मिले है उनकी जमीन खरीद के समय यानि उस समय कि वास्तविक क़ीमत 800 करोड़ से भी अधिक कि थी और केवल टैक्स चोरी करने तथा सरकार को चुना लगाने के लिए बिल्डरों ने यह ना हजम होने वाला करोड़ों का घोटाला, आयकर अधिकारियों कि नाक के नीचे किया। अब इसमे आयकर विभाग तथा आयकर अधिकारियों का नाम क्यो जोड़ा जा रहा है तथा उन पर सवाल क्यो खड़े किए जा रहे है तो इसके पीछे दो कारण है पहला कारण तो यह है कि दक्षिण गुजरात के आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के संयुक्त निदेशक का कार्यालय वापी में स्थित है। आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग का कार्य है जांच करना सतर्कता रखना और टैक्स चोरी पर अंकुश लगाना। लेकिन अब यदि इतनी बड़ी टैक्स चोरी सामने आई है तो मतलब साफ है कि आयकर अधिकारियों कि भूमिका भी शंका के डायरे में है। हालांकि क्रांति भास्कर कि खोजी टिम को कुछ ऐसी जांकारियाँ और दस्तावेज़ भी मिले है जिनहे देखकर लगता है कि वलसाड, वापी, दमण और सिलवसा के कई बिल्डरों के साथ आयकर अधिकारियों कि पुरानी सांठ-गांठ है। वैसे अब सोचने वाली बात यह है कि अब तक जो आंकड़े सामने आए है वह तो केवल जमीन खरीद-बिक्री के है। जमीन पर बनी इमारत में फ्लेट, दुकान, मकान बनाकर बेचने का हिसाब लगना तो अभी भी बाकी है।

वलसाड, वापी और दमण, सिलवासा के बिल्डर टैक्स चोरी में अव्वल। 8 नहीं बल्कि 800 करोड़ की टैक्स चोरी का अनुमान! - वापी समाचार

वैसे आम तौर पर देखा जाता है कि जमीन कि कई गुना अधिक क़ीमत में इमारत बनती है और जमीन क़ीमत से कई गुना अधिक क़ीमत में इमारत में बनी दुकान और फ्लेट बिकते है, ऐसे में केवल जमीन खरीद-बिक्री में यदि 800 करोड़ कि टैक्स चोरी हुई है तो उक्त सभी इमारतों में बनी दुकान, फ्लेट में कितने हजार करोड़ करोड़ कि टैक्स चोरी हुई होगी? इस सवाल का जवाब देना शायद वापी में बैठे आयकर अधिकारियों के बस कि बात नहीं है क्यो कि पिछले लम्बे समय से आयकर अधिकारियों को गांधारी कि भूमिका में देखा गया। वैसे उक्त सभी प्रोजेक्टों में से एक प्रोजेक्ट कि जमीन और उस पर बनी इमारत में बनी दुकान कि कुल बिक्री का अनुमान लगाया गया तो काफी चौकने वाले आंकड़े सामने आए? दस्तावेज़ में दी गई जिस जमीन कि कीमत लगभग 55 लाख बताई गई, उस जमीन पर जब इमारत बनकर तैयार हुई और बनी सभी दुकानों का मूल्यांकन किया गया तो लगभग जमीन कीमत से 40 गुना अधिक कीमत के आंकड़े सामने आए। इसके बाद जब उक्त कारोबार के जानकार (एक्सपर्ट) से बात-चित कि तो पता चला यह आंकड़े सही है और कई बार इससे भी कई गुना अधिक आंकड़े सामने आ सकते है। मतलब यदि 800 करोड़ कि टैक्स चोरी सिर्फ जमीन कि खरीद में हुई है और 200 करोड़ के दस्तावेज़ बने है तो उसकी 40 गुना टैक्स चोरी उक्त जमीन पर बने प्रोजेक्टों में हो सकती है! आंकड़े देखकर लगता है इस गड़बड़ घोटाले का सच और यह पहली सिर्फ सीबीआई और ई-डी मिलकर सुलझा सकती है क्यो कि रियलस्टेट के कारोबार में इतनी बड़ी टैक्स चोरी आज से पहले कभी नहीं सुनी गई। क्रांति भास्कर चाहती है कि उसके पास जो दस्तावेज़ है वह जनता के सानमे आए, लेकिन 50 प्रोजेक्टों के दस्तावेजों का पुलिंदा कई हजार पन्नों का है इस लिए क्रांति भास्कर इस वक्त उक्त दस्तावेज़ पाठकों के लिए उपलब्ध नहीं करा सकती। यदि इस मामले कि तह तक जाकर सीबीआई अथवा ई-डी मामले में जांच कि रुचि रखती है तो अवश्य क्रांति भास्कर उक्त सभी दस्तावेजों कि एक कॉपी सीबीआई और ई-डी को देगी।

वैसे पुख्ता तौर पर सूचना मिलने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे आयकर अधिकारियों को भ्रष्ट कहे या कामचोर? इसका फ़ैसला या तो जनता करें या स्वय वह आयकर अधिकारी जो ईमानदार होने के बाद भी जांच से डरते है! अब ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्यो कि पिछले लम्बे समय में क्रांति भास्कर ने अपनी खोजी पत्रकारिता के तहत अपने पिछले अंकों में बिल्डरों कि टैक्स चोरी और काले-धन कि लेन-देन को लेकर कई खबरें प्रमुखता से प्रकाशित की थी लेकिन आयकर अधिकारियों के कानों तले जू नहीं रेंगी, कोई ठोस कार्यवाही देखने को नहीं मिली। इतना ही नहीं कई मामलों में वापी में बैठे आयकर अधिकारियों कि भूमिका और कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते रहे और यह शंका भी रही कि कहीं वापी में बैठे आयकर अधिकारियों का भी हिस्सा पहले से तय तो है। वापी आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के तत्कालीन संयुक्त निदेशक कमल मंगल को टैक्स चोरी मामले में कितनी बार सूचना मिली और कितनी बार उनके द्वारा छापे-मारी की गई? गांधीनगर में बैठे अधिकारी एक बार यह सवाल कमल मंगल से कर के देख ले।

Income tex Office Vapi
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खेर अब इस पूरे मामले के सामने आने के बाद तथा करोड़ों नहीं बल्कि अरबों रुपये के घोटाले और टैक्स चोरी कि जानकारी सामने आने के बाद, गांधीनगर में बैठे वरीय आयकर अधिकारी गांधी जी के बंदर बने बैठे रहेंगे या फिर सभी बिल्डरों के यहां एक साथ औचक चपेमारी कर मोदी सरकार को चुना लगाने वालों पर कठोर कार्यवाही करेंगे? इस सवाल का जवाब भी समय आने पर मिल ही जाएगा। लेकिन यदि भारत के वित्त मंत्री इस मामले में स्वय संज्ञान लेते हुए ई-डी और सीबीआई कि एक संयुक्त टिम बनाकर वापी दमण और सिवाल्सा के बिल्डरों कि जांच करवाए तो हो सकता है कि अब तक जितना अनुमान लगाया गया है उससे भी कई गुना अधिक रकम कि टैक्स चोरी पकड़ी जाए।

जरा सोचिए यदि खून होने के बाद पुलिस (लाश से खूनी का नाम) पूछे और कहे कि जब तक लाश खुद नहीं बोलती या सबूत नहीं मिलता तब तक वह केश दर्ज़ ही नहीं करेगी! तो मुजरिम कैसे पकड़ा जाएगा। लेकिन कानून बनाने वाले को यह पता था कि मुर्दे बोला नहीं करते। इस लिए पुलिस मुर्दा देखते ही पहले मामला दर्ज़ करती है फिर जांच करती है और उसके बाद मुजरिम को पकड़कर सजा दिलाती है।

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लेकिन आयकर विभाग के अधिकारी टैक्स चोरी के मामले में जानकारी देने पर कहते है पहले सबूत लाओं उसके बाद में सबूत ऊपर भेजेंगे, जब ऊपर से सबूतों के आधार पर अप्रूवल मिल जाएगा, तब जांच शुरू होगी और उसके बाद आगे कि कार्यवाही की जाएगी! अब बताइये क्या ऐसे टैक्स चोरी पर अंकुश लगेगा? सूचना देने तथा शिकायत करने आए व्यक्ति से आयकर विभाग के अधिकारी इतने सबूत मांगती है जैसे आई-आर-एस कि डिग्री आयकर अधिकारियों ने नहीं सूचना देने वाले शिकायतकर्ता ने ले रखी हो। कई बार तो सूचना देने वाले तथा शिकायत करने वाले को आयकर अधिकारियों ना मिलने दिया जाता है ना उनका संपर्क नंबर बताया जाता है।

आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के संयुक्त निदेशक कमल मंगल का तबादला होने के बाद, वापी आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के कार्यालय से पता चला कि आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग ने संयुक्त निदेशक कमल मंगल कि जगह जिस अधिकारी को नियुक्त किया गया है उनका नाम भारद्वाज है और वह अब सूरत में बैठते है वापी कार्यालय ना आए है ना आएंगे। आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के संयुक्त निदेशक भारद्वाज का नंबर अब तक ऑनलाइन उपलब्ध नहीं है इस लिए जब आयकर विभाग के अन्वेषण विभाग के कार्यालय में मोजूद अधिकारी से भारद्वाज के नंबर तथा ई-मेल आई-डी के बारे में जानकारी मांगी तो उन्होने ऐसे देने से ऐसे इंकार कर दिया जैसे भारद्वाज को प्रभार मिलने के साथ ही यह निर्देश भी मिल गए हो कि, उन्हे टैक्स चोरी पर अंकुश लगाने कि कोई आवश्यकता नहीं है!

वैसे अब तक जो खुलासे हुए है उनके अलाबे अभी और भी ऐसे कई प्रोजेक्ट है जिनके दस्तावेज़ क्रांति भास्कर कि खोजी टिम को मिले है लेकिन उन दस्तावेजों कि सत्यता को लेकर क्रांति भास्कर कि पड़ताल अभी जारी है फिलवक्त मिले दस्तावेज़ को देखकर इतना ही कहा जा सकता है कि जो आंकड़े सामने आए है वह समंदर में से पानी के एक लोटे के समान है। शेष फिर।

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