जहरीली गैसों के साये में जी रहे वापी और आस पास के कई गांव

कहने को तो वापी विकासशील और स्वच्छ शहर माना जाता है। सफेदपोश नेता, जनप्रतिनिधि और उद्योगपति अक्सर इसका दावा भी करते है मगर ये सच नहीं है। हकीकत ये है कि वापी सबसे विषाक्त शहरों में शुमार बताया जाता है! वापी ने अगर तरक्की की है तो उसकी कीमत भी चुकाई है। वापी शहर के नागरिक हर रोज अपना स्वास्थ्य खोकर इसका हजार्ना भर रहे हैं। इसी पर आधारित है यह विशेष आलेखः-

इन दिनों वापी में सांसों से संबंधित कई तरह की बीमारियां फैल रही है। लोग सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहे हैं, उम्र दराज लोग दमा से परेशान है। पहले से बीमार लोगों को फैंफडो के कैंसर हो रहे हैं। स्वाइन फ्लू फैल रहा है। हवा में कई तरह की बदबू घुली मिली हुई है। वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो गई है। हवा में जहरीली गैस फैली हुई है। वायु प्रदूषण की वजह से लोग चर्म रोगों के शिकार हो रहे हैं। आंखों में जलन और खुजली हो रही है और इन सब की वजह है वापी में फैलता हुआ वायु और जल प्रदूषण। ऐसा लगता है मानो वापी वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण की राजधानी बन चुकी है।

धीरे-धीरे मौत की तरफ बढ़ रहे लोगो की रक्षा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के हाथ, वापी में अत्यधिक प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर होगी कोई ठोस कार्यवाही या आगे भी नोटिस देकर पुनः नोटो की वसूली का खेल जारी रहेगा?

आज से कुछ साल पहले वापी की अमूमन सभी फैक्ट्रियां बरसात के मौसम में रात के अंधेरे में जहरीला कैमिकल युक्त धुंआ छोड़ती थी। इस वजह से वापी में अक्सर तेजाब युक्त बारिश होती थी। बरसात में पनपने वाले मित्र जीव जंतु इस तेजाबी बारिश की वजह से बेमौत मारे जाते थे। इससे पृथ्वी का बैलेंस बिगडता है। बरसात में पनपने वाले इन जीव जंतु की असमय मौत से मानव हित बेहद प्रभावित होता है। पृथ्वी का पर्यावरण चक्र बिगड़ता है। इससे लोगों का स्वास्थ्य गिरता है। हर साल फैक्ट्री मालिकों के इस लालच की वजह से हर साल बारिश में लाखों मित्र जीव जंतु मारे जाते हैं। जिससे वापी की जल वायु खराब हो गई है। परंतु इन दिनों फैक्ट्री मालिकों का लालच इतना बढ़ गया है कि वे अब बरसात का इंतजार भी नहीं करते और रात 11 बजे के बाद दनादन अपनी चिमनियों से बड़ी मात्रा में केमिकल युक्त जहरीली गैस छोड़ते हैं। फैक्ट्री मालिकों का मानना है कि अगर कोई मरता है तो मरे अपनी बला से। हमें इससे क्या ? अगर प्रत्यक्ष दर्शियों की माने तो इन दिनों हर रोज रात के 11 बजे से सुबह 4 बजे तक वापी में धुंए के गुबार छाए रहते हैं। इन धुंए के गुबार से हाइमास्ट की रोशनियां तक फीकी पड़ जाती है। हाथ को हाथ नहीं सूझता। इस कदर घना अंधेरा छा जाता है। इससे सड़क दुर्घटना की संभावना बढ़ गई है। मगर सुनने वाला कोई नहीं है। लोग बीमारियां बर्दास्त कर रहे हैं। लोगों की बात न तो पुलिस सुनती है, न स्थानीय प्रशासन, न ही जन प्रतिनिधि।

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और तो और गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वापी क्षेत्रीय कार्यालय के अधिकारी मानो कान में अंगुली डाले रहते है, जनता की आवाज उन तक नहीं पहुंचती और जब तक आवाज इन तक पहुंचती है, तब तक फैक्ट्री मालिक इन भ्रष्ट अधिकारियों के कान में इतना पैसा भर देते हैं कि लोगों की चीखें उन्हें सुनाई ही नहीं देती। वे सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। जिसकी वजह से वापी के अधिकांश अस्पताल चर्मरोग, नेत्र रोग, पेट की बीमारी, सडक दुर्घटना, सांस की बीमारी, ह्रदय रोग, कैंसर, मलेरिया, डेंगू और स्वाइन फ्लू से साल भर भरे रहते हैं। इसकी मुख्य वजह है वापी में फैली हुई गंदगी, वापी में फैली हुई अव्यवस्था, वापी में पसरा हुआ भ्रष्ट तंत्र। इस संदर्भ में पर्यावरण विदो का कहना है कि ज्यादातर समस्याओं की जड़ है वापी की अनगिनत फैक्ट्रियां और उनसे जुड़ी भ्रष्ट कार्यशैली।

एक अनुमान के मुताबिक वापी में करीब 3500 छोटी-ब़डी औद्योगिक इकाईयां है, जिनमें विभिन्न प्रांतो के करीब 4 से 5 लाख मजदूर काम करते हैं। वापी की उन्नति की मुख्य धुरी यही मजदूर ही है। जिनकी वजह से वापी में खुशहाली और समृद्धि है। परंतु दुर्भाग्य से इन्हीं मजदूरों की हालत बहुत खराब है। वे तंग जगह में रहने को मजबूर है। कुपोषण के शिकार है, अव्यवस्था के शिकार है, किसी भी तरह का विरोध करने की स्थिति में नहीं है। गंदगी में रहने को मजबूर है, वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण के ज्यादातर शिकार यही मजदूर होते हैं। जिनकी कोई सुनता नहीं है। हम यह नहीं कहते हैं कि फैक्ट्रियां नहीं होनी चाहिए, फैक्ट्रियां होना चाहिए। परंतु फैक्ट्रियों में जल निकासी, गैस निकासी और गंदगी निकासी का व्यापक और पूरा प्रबंधन होना चाहिए। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मापदंड के आधार पर होना चाहिए। परंतु दुर्भाग्य से वापी में ऐसा नहीं होता। वापी की अधिकांश फैक्ट्रियां मापदंड पर खरी नहीं उतरती। वापी में आए दिन फैक्ट्रियों मै आग लगती रहती है। बायलर फटते रहते हैं। जिसके शिकार मजदूर अक्सर होते हैं। मजदूरों को मूलभूत सुविधाएं नहीं मिलती है। आंकडो के मुताबिक ज्यादातर दुर्घटना पेपर मिलों और केमिकल फैक्ट्रियों में हुई है। यही फैक्ट्रियां मापदंड से ज्यादा धुआं भी फेंकती है। इन्हीं के बायलर भी फटे हैं और कई लोगों की जान भी गई है। गजानन पेपर मिल इनमें सबसे ज्यादा बदनाम है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इसे कई बार नोटिस भी थमा चुका है। पिछली दफा यहां धमाका हुआ था। जिसमें कई मजदूर मारे गए थे। गजानन पेपर मिल की अनियमितताओं के चर्चे अक्सर अखबारों में छपे रहते हैं। इसके बावजूद इस पर कोई कार्यवाही नहीं होती। लीपापोती में गजानन पेपर मिल मास्टर है।

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इस संदर्भ में बुद्धिजीवियों का कहना है कि सबसे ज्यादा प्रदूषण पेपर मिल फैलाते हैं। क्योंकि ज्यादातर सडी गली चीजे इन्हीं फैक्ट्रियों में आती है, जो वातावरण में गंदी गैसे छोडती है और रही सही कसर ये रात को पूरी करते हैं । इसी वजह से वापी कई बार डेंजर जोन में आ चुका है। वर्षो पहले हुए एक मैगजीन के सर्वे के मुताबिक वापी एशिया के सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में से एक बताया गया। इस संदर्भ में लोगों की मांग है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वापी में लगातार नजर रखनी चाहिए और प्रदूषण फैलानेवाली इकाइयों को तत्काल प्रभाव से बंद करा देना चाहिए। नहीं तो एक दिन यहां भोपाल की तरह कार्बाइड गैस कांड हो जाएगा और लाखों की संख्या में लोग मारे जाएंगे।

इस संदर्भ में  लोगो का कहना है कि बार-बार लगातार नोटिस मिलने के बाद भी फैक्ट्री अगर चलती है तो कहीं न कहीं अधिकारियों कीमिलीभगत है। दूसरी तरफ बुद्धिजीवियो का कहना है कि नोटीफाइड, वापी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सरकारी अधिकारियों की शह के बिना भ्रष्टाचार का पौधा पनप ही नहीं सकता। इस पौधे को जड़ से उखाडे बिना वापी को प्रदूषण मुक्त नहीं किया जा सकता।

क्या होना चाहिए वापी में सुधार

– वापी नगर पालिका, नोटीफाइड और सरकारी खाली पड़ी जमीन पर वृक्षारोपण होना चाहिए। इससे काफी हद तक वायु औरध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण हो जाएगा।

–  औद्योगिक   इकाईयों के 20-30 प्रतिशत हिस्से पर हरियाली होनी चाहिए। इससे वातावरण में तपिश कम हो जाएगी।

–  औद्योगिक  इकाईयों की चिमनी निर्धारित ऊंचाई पर होनी चाहिए और उसमें एपीसीडी (एयर पॉल्युशन कंट्रोल डिवाइस) होनाचाहिए। इससे वायु प्रदूषण कम होगा।

–  औद्योगिक   इकाईयों की पानी निकासी का बंदोबस्त पूरा होना चाहिए। वॉटर ट्रीटमेंट की व्यवस्था होना चाहिए। इससे जलप्रदूषण नहीं होगा।

–  औद्योगिक   इकाईयों में सुरक्षा व्यवस्था होना चाहिए, इससे मजदूर मारे नहीं जाएंगे।

– वापी में गटर व्यवस्था का अच्छा इंतजाम होना चाहिए। इससे शहर का गंदा पानी पल भर में निकल जाएगा।

– समय समय पर गंदगी को जलाते रहना चाहिए या कंपोस्ट खाद बनाने भेज दीजिए। इससे वापी में बीमारी नहीं फैलेगी।