खुशमान ने दिए भाजपा को 50000 लेकिन चर्चा 5 लाख कि अब बाकी रकम कहा गई?

दमण। राजनीति दो शब्दों का एक समूह है राज+नीति। (राज मतलब शासन और नीति मतलब उचित समय और उचित स्थान पर उचित कार्य करने कि कला) अर्थात् नीति विशेष के द्वारा शासन करना या विशेष उद्देश्य को प्राप्त करना राजनीति कहलाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जनता के सामाजिक एवं आर्थिक स्तर (सार्वजनिक जीवन स्तर) को ऊँचा करना राजनीति है। नागरिक स्तर पर या व्यक्तिगत स्तर पर कोई विशेष प्रकार का सिद्धान्त एवं व्यवहार राजनीति (पॉलिटिक्स) कहलाती है। राजनीति कि शुरूआत रामायण काल से भी अति प्राचीन है। महाभारत महाकाव्य में इसका सर्वाधिक विवरण देखने को मिलता है, चाहे वह चक्रव्यूह रचना हो या चौसर खेल में पाण्डवों को हराने कि राजनीति। वैसे यदि राजनीति स्वार्थ या ऐशगाह आबाद करने कि हो तो उस राजनीति से जनता का क्या भला होगा यह सवाल जनता तब से कर रही है जब से जनता ने राजनीति करने वाले नेताओं कि राजनीति में स्वार्थ कि गंध महसूस की। जनता काफी लम्बे समय से यह जानना चाहती है कि दमण-दीव के जिन नेताओं के पास कोई कारोबार नहीं है, कोई व्यवसाय नहीं है वह बड़ी बड़ी गाड़ियों और कोठियों का मजा लेने के लिए धन कहा से लाते है?

संघ प्रदेश दमण-दीव में ऐसे कई नेता है जिनके स्वार्थ कि टोकरी समय समय पर जनता के सामने आती रही है और ऐसे भी कई नेता है जिनके स्वार्थ कि टोकरी जनता के सामने आनी अभी भी बाकी है। दमण-दीव कि जनता कि माने तो वासू पटेल जैसे कुछ गीने-चुने नेताओं कि कूटनीति और कुत्सित चाल के सामने कई बार दमण-दीव के बड़े बड़े और पुराने भाजपाई नेता हाशिये पर दिखाई दिए। दमण-दीव के राजनीतिक प्रबुद्धों कि माने तो दमण-दीव भाजपा को मजबूत बनाने में बी-एम माछी, जोगीभाई, देवचंदभाई, देवजीभाई, बालुभाई, प्रकाशभाई, प्रमोद दमणिया, महेश टंडेल, लखम टंडेल और जिग्नेश जोगी जैसे कई पुराने भाजपाइयों कि मुख्य भूमिका रही है। लेकिन इनमे से कई पुराने और अनुभवी नेताओं को दरकिनार कर फिलवक्त वासू जैसे नेता अपनी अलग ही खिचड़ी पका रहे है ताकि समय आने पर वह अकेले उक्त पकी खिचड़ी से अपना पेट भर सके। दमण के कई भाजपा नेताओं का ऐसा मानना है कि वासू के साथ यदि व्यवहार ख़राब हुआ तो पार्टी में ना पद मिलेगा ना पवार और यदि वासू के साथ व्यवहार ठीक है तो बिना पद भी पवार मिल सकता है बशर्ते वासू और वासू जैसे अन्य नेताओं को समय पर चढ़ावा मिलता रहे अब ऐसा इस लिए भी कहा जा रहा है क्यो कि विवेक धाड़कर कि वासू से अच्छी बनती है और इसमे कोई दो राय नहीं कि राजनीति में अच्छी बनने और ना बनने के भी अपने अलग अलग नफे-नुकसान होते है।

खुशमान ने दिए भाजपा को 50000 लेकिन चर्चा 5 लाख कि अब बाकी रकम कहा गई? - दमण समाचार

भाजपा के एक नेता ने अपना नाम ना बताने कि शर्त पर बताया कि यदि वासू पटेल ने भाजपा में ईमानदारी से काम किया होता तो जिला पंचायत में भाजपा कि सत्ता होती। लेकिन पार्टी में आज भी पैसे का खेल जारी है और नोट के दम पर पार्टी के अंदर बैठे कुछ गीने-चुने लालची नेता, पार्टी के शिद्धांतों को दरकिनार कर पद और कुर्सी का सौदा किसी के भी साथ करने को तैयार रहते है। इतना ही नहीं बताया यह भी जाता है कि पार्टी के अधिकतर फैसले वासू पटेल और विवेक धाड़कर कि सुविधा और स्वार्थशिद्धि के अनुसार लिए जाते रहे। पार्टी में किसे लेना है क्या पद देना है और किस सत्ता कि कुर्सी पर बिठाना है किसे सस्पेंड करना तथा किसका सस्पेंसन केनसल करना है यह कार्यकर्ताओं के सुझाव और चुनाव से नहीं नहीं, बल्कि नोटो के बंडलों के जरिए होता रहा।

भाजपा कि नीति भी कमाल है जिसने कमल खिलाने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उसे पार्टी तबजजो देने पर विचार भी नहीं कर रही और जिनहोने ताउम्र भाजपा के कमल को कुचलने का काम किया वह उन्होने अपने पैसे के दम पर दमण-दीव भाजपा का सिरमोर बनने का ख्वाब दिन में ही पूरा कर लिया।

भाजपा में भ्रष्टाचार और नेताओं कि कुत्सित चाल पर अभी एक ताजा मामले कि जानकारी देते हुए यह भी बताया कि अभी कुछ समय पहले ही दमण नगर पालिका के पार्षद खुशमान ढींगमार के द्वारा भाजपा के खाते में 50 हज़ार रुपये कि रकम जमा हुई जबकि चर्चा यह है कि खुशमान ढींगमार ने 5 लाख दिए! तो अब सवाल यह है कि जब चर्चा 5 लाख कि है तो बाकी के 4.5 लाख कहा गए? वैसे इस चर्चा के पीछे भी एक दूसरा कारण और है और वह यह है कि जब दमण नगर निगम के चुनाव हुए थे, तब खुशमान ढींगमार ने भाजपा उम्मीदवार मुकेश पटेल के वीरुध चुनाव लड़ा था जिसके चलते खुशमान ढींगमार को पार्टी से 6 साल के लिए बाहर कर दिया। 6 साल तो अभी पूरे नहीं हुए, लेकिन खुशमान ढींगमार को पुनः भाजपा में स्थान दे दिया गया और इसके पीछे खुशमान ढींगमार द्वारा दी गई रकम का हाथ बताया जाता है। यह सब देखकर अब उन भाजपा कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल है कि जिनके पास पैसा नहीं है उनका क्या होगा? यदि पैसे के दम पर नियुक्तियाँ और निलंबन का खेल चलता रहा तो पार्टी के काल करने वाले गरीब कार्यकर्ता पार्टी के नेताओं को देने के लिए पैसे कहा से लाएँगे? वैसे अभी कुछ दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष केतन पटेल के भाई जिग्नेश पटेल के भाजपा में शामिल होने पर भी प्रदेश कि चौपालों पर चर्चे हुए हुई थी कि जिग्नेश पटेल ने भाजपा में शामिल होने के लिए लाखों ख़र्च किए है, वैसे इस मामले में जनता ने नवीन के साथ साथ कई नेताओं का नाम भी भ्रष्टाचार में उछला तो था लेकिन लगता है दमण से अब तक वह नाम दिल्ली नहीं पहुंचे। जिग्नेश पटेल को भाजपा में शामिल करने के बाद यह भी देखा गया कि भाजपा जिग्नेश को अपने पुराने कार्यकर्ताओं से अधिक तबज्जो देने लगी है इससे भाजपा के कई कार्यकर्ता अब यह सोच रहे है कि आगे क्या होगा? क्या इसी तरह भाजपा में पैसे के दम पर पदों का आदान प्रदान तथा नियुक्तियाँ और निलंबन वापसी जारी रहेगी या फिर केंद्रीय आला कमान इस तरह कि राजनीति करने वालों को भाजपा से बाहर का रास्ता दिखाएगी? दमण-दीव भाजपा के नेता ने अपना नाम ना बताने कि शर्त पर बताया कि दमण-दीव भाजपा के कई नेताओं कि काली-करतूतें कई बार भाजपा को शर्मशार कर चुकी है लेकिन अब तक केंद्रीय भाजपा ऐसी जांकारियों से अछूता रहा, लेकिन अब बात कुछ और है अब चर्चा दमण-दीव भाजपा कार्यालय से बाहर निकालकर आम जनता कि जुबान तक पहुँच गई है और जनता चौपालों पर चर्चा कर रही है। वैसे उक्त पूरे मामले को तथा जनता में चल रही चर्चा को देखते हुए केंद्रीय भाजपा को यह विचार करने कि जरूरत है कि मोदी के नाम पर वोट मांगने के बाद प्रदेश भाजपा के कार्यकर्ता और मंत्री यदि मोदी को कोसने वाले को पैसे के दम पर पार्टी में स्थान दे दे तो उससे किस कि किरकिरी होगी? वैसे केंद्रीय भाजपा नेता इस मामले पर तथा जनता के सवालों और चर्चा पर क्या संज्ञान लेते है यह तो आने वाले समय में पता चलेगा।

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