मध्यप्रदेश शासन चैयरमैन के बेटे ने थामा बल्ला तो सियासत के रोशनदान से गेंद पर नजर

मप्र शासन चैयरमैन के बेटे ने थामा बल्ला तो सियासत के रोशनदान से गेंद पर नजर

नागदा। गुजरात चुनाव की गूंज खामोश हुई कि अब मप्र के विधानसभा चुनाव की सरगर्मिया तेज हो गई । मौसम की सर्द हवा में टिकट के दावदारों की सक्रियता एवं महत्वाकांक्षा इन दिनों परवान पर है। विश्व विख्यात महाकाल की नगरी उज्जैन जिले की नागदा विधानसभा के अपने मायने है। यहां की सियासत की अनूठी दास्तान है।  इन दिनों यहां दावेदारों को लेकर चर्चा चौराहे पर चल पड़ी है।

कांग्रेस की बात करें तो एन वक्त तक पाला बदलने की सियासत नहीं हुई तो चार बार के विधायक दिलीपसिंह गुर्जर की टिकट का रास्ता एक दम साफ है।

उधर, भाजपा में अबकि बार टिकट को लेकर एक अनार सौ बीमार की कहावत चरितार्थ है। कुछ चेहरे गुपचुप तो कुछ सरे राह अपनी सियासती हसरत को तब्दील करने में मशगूल है। अबकि बार बड़ी बात यह सुर्खियों में हैकि  मप्र शासन में कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त असंगठित कामगार कल्याण बोर्ड के चैयरमैन सुल्तानसिंह शेखावत के इंजीनियर बेटे मोतीसिंह शेखावत की अकस्मात सक्रियता सामने आई है। इनकी सक्रियता पर लोग कयास लगाने लगे हैकि पिता की विरासत का वारिश वरण करने की यह एक कवायद हैं। हालांकि इस मामले में अधिकृत कोई प्रमाणिक संकेत सामने नहीं है। लेकिन सियासत के गलियारों में हलचल मच गई । चैयरमैंन सुल्तानसिंह शेखावत का नाम भी भी इस सूबे के टिकट दावेदारों की  प्रतिस्पर्धा में शुमार है।

लेकिन उम्र का 68 वा पड़ाव कहीं रोड़ा ना बन जाए, इसलिए मोती को विरासत का मालिक बनाने की एक  रणनीति संभंव है।ऐसी स्थिति में अब ये परिवार कोई मौका चूकने की  कोई कसर नही छोड़ना चाहता l रणनीति में एक युवा पत्रकार की कौशलता वरदान साबित हो रही है।इस सीट पर अबकि बार  दावेदारों की प्रतिस्पर्धा क्यों बढ गई। इस राज को जानने  के पहले  इस सीट के अतीत का इतिहास समझना होगा।

इस सीट की हकीकत
सूबें में  भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद  काग्रेस ने जहां पिछडा वर्ग तो भाजपा ने ठाकुरों को मैंदान मे ंउतारा है। यह अलग बात हैकि भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद 8 में से 5 बार 1985, 1993, 2003, 2008 एवं 2018 में ठाकुंर इस क्षेत्र से भाजपा की टिकट पर चुनाव हार गए। ऐसी स्थिति में पांच में से तीन बार चुनाव हारे ठाकुर प्रत्याशी लालसिंह राणावत का चेहरा बदल कर भाजपा ने वर्ष 2008 में एक नवाचार प्रयोग किया । राजपूत बिरादरी के ही दिलीपसिह शेखावत को टिकट देकर  भरोसा जताया । उस समय भाजपा ने चेहरा तो बदला लेकिन बिरादरी को बरकरार रखा। जब दिलीपसिंह मैंदान में आए तब वे बतौर पूर्व राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त मप्र शासन में उर्जा विकास निगम के पूर्व अध्यक्ष की शोहरत में थे। यहां तक मप्र की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती के कार्यकाल में सीएम हाउस में कार्य करनें का रूतबा भी था। युवा मोर्चा में प्रदेश पदाधिकारी का ओहदा भी शामिल था। लेकिन वर्ष 2008 का यह पहला कैरियर का चुनाव आप रिकॉर्ड  9892 मतों से हार गए। यह पराजय उस समय हुई जब समूचे प्रदेश में भाजपा 230 सीट में से 165 रिकॉर्ड सीट जीत कर प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने में कामयाब हुई।

वर्ष 2013 में फिर इसी प्रत्याशी को टिकट नसीब हुई और आपने रिकॉर्ड 16,115 मतों से कांग्रेस प्रत्याशी श्री गुंर्जर के कदमों को विधानसभा में जाने से रोक दिया।

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लेकिन  इस जीत को स्थिर रखने में श्री शेखावत 2018 में असफल हो गए और 5117 मतांतर की हार ने भाजपा संगठन को एक बार सोचनें के लिए विवश कर दिया। इस हार पर अब राजनैतिक पंडित यह दलील दे रहे हैकि भाजपा ने प्रदेश में कई विकास कार्य किए और यहां पार्टी ने वर्ष 2013 का जीत अंतर 16115 मतों का जनाधार तो खोया साथ, ही वर्ष 2018 में 5117 और नए मत भाजपा के विरोध में खडे़ हो गए। ऐसी स्थिति में यहंा पर भाजपा उम्मीदवार की पराजय इस समीकरण से बडे मतांतर  21 हजार 232  वोटों से आंका जा रहा है।

राजर्नैतिक पंडितों का मानना है कि तीन में से दो बार पराजय से अबकि बार इस चेहरे को टिकट को लेकर संशय के बादल संभव र्है। राजनैतिक  पंडितों का यह भी मानना हैकि यह  चेहरा एक वजनदार उम्मीदवार है लेकिन विरोध की दीमक का यह टीला बाहर से तो मजबूत है लेकिन अंदर से कितना खोखला या शक्तिशाली है इस पर संगठन को बारीकी से अध्ययन करना होगा। कल तक जो साथ खडे़ थेे वे अब नैफथ्य से रास्ता रोके खडें हैं। इसी कारण से ही  संशय की स्थिति में कई नए उम्मीदवारों की महत्वाकांक्षा ने इस क्षेत्र में जन्म लिया है। संगठन चेहरें को नकारे अभी संशय है। लेकिन सियासत में उंट किस करवट बैठ जाए कहां भी नहीं जा सकता।इस सीट को भाजपा अपने समीकरण से  कांग्रेस का किला मानती है। कांग्रेस एमएलए श्री गुर्जर ने ठाकुर प्रत्याशी को हराने की पुनरावृति का इतिहास वर्ष 2018 में एक बार फिर रचा हैं। इसी कारण अब भाजपा में कई दावेदारों की एक लंबी फेहरिस्त है।  इस क्षेत्र में पहली बार भाजपा में नपा चुनाव में इतनी बगावत हुई कि नाग्रदा में 29 तथा एवं खाचरौद से 07 भाजपा कार्यकर्ताओं को निलंबित किया गया। दुष्परिणाम यह हुआ कि भाजपा खाचरौद में नपा का चुनाव हार गई और कांग्रेस ने नपा को भाजपा से छिन लिया। सत्तारूढ पार्टी के बावजूद जनपद अध्यक्ष खाचरौद का पद भी भाजपा ने गंवा दिया। ये दो बड़े घटक आगामी विधाससभा चुनाव में सभव है कांग्रेस के लिए मददगार बने। इधर, बड़ी संख्या में जिन भाजपा कार्यकर्ताओं को नपा चुनाव में घर रास्ता दिखाया गया था, उनकी बात को तथा उनकी ताकत को भी संगठन को समझना होगा।

भाजपा केंद्रीय संसदीय बोर्ड
उज्जैन जिले से पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ़ सत्यनारायण जटिया को हाल में अकस्मात भाजपा केंद्रीय संसदीय बोर्ड में मुकाम मिलना भी अबकि बार नागदा सीट प्रत्याशी निर्धारण में उत्प्रेरक बनेगा।

डॉ़ जटिया पॉवर में नहीं थे, तब उनकी इस विधानसभा के कार्यक्रमों में उपेक्षा के जख्म संभव है, अब बाहर आएं। जिन 36 लोगों को नपा के चुनाव में बगावत  के कारण घर का रास्ता दिखाया गयां, उनके स्वर गंूज रहे हैकि अब दादा (डॉ़ जटिया) पॉवर में आ गए,घर वापसी हो जाएगी।

जनता की जुबान पर नाम
लगभग 10 चेहरे ऐसे है जिनके  नाम टिकट केे दावेदारों में लोगों की जुबान  पर है। ठाकुर , गुर्जर एवं बा्रहाण  बाहुल्य इस सीट पर ठाकुर प्रत्याशी की बात करें तो शासन में कैबिनेट मंत्री दर्जा प्राप्त सुल्तानसिंह शेखावत, पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत, भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य डॉ़ तेज बहादुरसिंह चौहान, एवं दो बार के विधायक रहे लालसिंह राणावत का नाम भी जुबान पर है। मगर श्री सुल्तान सिंह एंव श्री राणावत को  उम्र का तकाजो यह पारी खेलने की शायद अब इजाजत ना दे। संगठन में  चिंतन, मनन की संभावना से इंकार नहीं किया सकता। प्रतिस्पर्धा में पूर्व नपा उपाध्यक्ष राजेश धाकड़ भी एमएलए कुर्सी के इस स्वंयबर मे लगभग 14 हजार जैन मतदाताओं की ताकत के भरोंसे भाग लेने की ख्वाहिश एवं हक रखते हैं।

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सांसद प्रतिनिधि प्रकाश जैन ने तोे एमएलए बनने की अभिलाषा सार्वजनिक रूप से  जाहिर कर दी है। आचंलिक क्षे़त्रों में मजबूत पकड़ दिनभर जनता से संवाद इनकी दिनचर्या में शुमार हैै। प़त्रकारिता  छोड राजनीति रास आने की कहानी इनका दिनभर का व्यस्त शेडयूल स्वयं बयां कर रहा है। सिंधिया के शार्गिद सूर्यप्रकाश शर्मा एवं राधेश्याम बंबोरिया की बात भी संगठन को सुनना होगी। इलाके में लगभग 24 हजार बाह्राण मतदाता सूर्यप्रकाश के पक्ष में साक्षी खडे़ हैं। पूर्व नपा अध्यक्ष एंव वरिष्ठ अभिभाषक विजय कुमार सेठी तथा पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष अनोखीलाल भंडारी की अनदेखी भी यहां पर प्रासंगिक है

खेल के नाम पर रैली का आगाज
इधर, मोती की सक्रियता सुखियां बटौर रही है। एक क्रिकेट प्रतिस्पर्धा के बहाने आपने खाचरौद में अपनी जमीं तैयार करने का प्रयास किया। पहले शहर में एक रैली के नेतृत्व के वे किरदार बने। शहर में बडे- बडे़ होर्डिग्स और उन पर  मोती का चेहरा आकर्षण का केंद्र बना। इसी दिन खिलाडियों को सबांधित करते  अपने भाषण राज की बात बोल गए। वे बोले अभी तो शुरूआत है आगे -आगे देखिए होता क्या है। इस बात के मायने क्या है। यह रहस्यमय है। उन्होंने राजनीति के परिदृष्यमें बोली या अन्य कोई समीकरण। लेकिन सियासत के पंडित इस बात को सियासत में स्थापित होने का एक संदेश मान रहें है। आपकी सक्रियता के साथ सोशल मीडिया पर एक सर्वे भी सामने आया है। जिसमें मोती का नाम भी सर्वे में शुमार है। बताया जारहा हैकि इस सर्व के प्रारंभिक आंकडो में तो मोती थोडें़ लड़खड़ाए लेकिन बाद में स्थापित हो गए।

अब सियासत के रोशन दान से लोगों को लगा कि राजनीति में कदम रखने की एक रणनीति है। फिर अन्य समाज जो वोट बैंक रखते है उस बिरादरी के लोगों से मीटिंग करना भी अप्रत्यक्ष इशारा कर रहा हैकि वे किसी सियासती प्रोजेक्ट के मिशन की ख्वाहिश में हैं। लेकिन क्रिकेट के मैदान में जिस दिन बल्ला संभाला उस समय मोती गेंद का निशाना चूक ्रगए थे। अब आगे कितने सफल होते भविष्य की गर्त में है। इन सब समीकरणों  के बावजूद  इस सूबे के कांग्रंेस सरदार कोई गूगली गेंद मैदान में डालकर पार्टी का पाला बदलने की कवायद करें तो सारे  महत्वाकांक्षी खिलाड़ी एम्पायर के इशारे का इंतजार करते नजर आएंगे।

लेखक – कैलाश सनोलिया, स्वतंत्र पत्रकार है। इस लेख में अभिव्यक्ति विचार लेखक के अनुभव, शोध और चिन्तन पर आधारित हैं।