समाज की जड़ें काट रही है कमीशन पर अवलंबित पत्रकारिता.

पत्रकारिता को बेशक लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है परंतु इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वाधीनता के कल्प की मिशन पत्रकारिता का स्वरूप बदलते-बदलते आज के युग में कमीशन अवलंबित पत्रकारिता में तब्दील हो गया है तथा कमीशन अवलंबित पत्रकारिता आज हमारे समाज की जड़े काट रही है। बाजारबाद का असर पत्रकारिता पर इस तरह से पड़ा है कि पत्रकारिता बाजारबाद की कठपुतली बन गयी है

और हमारे मुल्क में एक्सक्लूसिव के नाम पर मीडिया समूहों द्वारा खबरों का क्रय-विक्रय हो रहा है।

संविधान का आर्टिकल 19 (A) हमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी प्रदान करता है और इसके तहत भारत के सभी नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इख्तियार है वहीं प्रेस की आजादी को भारतीय कानून व्यवस्था द्वारा स्पष्ट रूप से संरक्षित नहीं किया गया है। लेकिन भारतीय प्रेस की आजादी संविधान के अनुच्छेद 19 (A) के वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इख्तियार के दायरे में निहित है और इस अधिकार का हमें आज अतिलंघन भी देखने को मिल रहा है हम देखते हैं सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बहुत से अपवाद गलत समाचार प्रसारित कर देते हैं वहीं आज कमीशन आधारित पत्रकारिता का नकारात्मक असर भी हमें देखने मिल रहा है आज पत्रकारिता जगत में ऐसे पत्रकारों की फौज तैयार हो गयी है जिन्हें ना तो पत्रकारिता का उपयुक्त ज्ञान है और ना ही पत्रकारिता के दिशानिर्देश ज्ञात है बस इतना जरूर है कि अपने वाहन पर पत्रकार लिखवा दिया और स्वयं के नाम के आगे पत्रकार लिखने लगे और हाथों में सिगरेट तथा शराब की बोतल लेकर अपनी पत्रकारिता का आगाज कर दिया एवं खबरों की परोसने लगे

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उनके लिए नेताओं और ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों का आना, जाना, खाना तथा पहनना मूल खबरें बन गईं वहीं दूसरी ओर बहुत से समाचार समूह यह कहने लग गए कि खबरों और विज्ञापनों में प्रथक-प्रथक कमीशन दिया जायेगा यही उनकी पत्रकारिता की पण्यशाला चलाने का जरिया बन गया है जो खबर को कमीशन की निगाह से देख रहे है।

एक सत्यवादी पत्रकार और मीडिया समूह समाज का दिशानिर्देशक होने के साथ भविष्यतकाल में होने वाली वारदातों के लिए समाज को सजग करता है तथा एक सिपाही की तर्ज़ पर दिन-रात अपना फर्ज निभाता है। लेकिन वर्तमान काल में सत्यनिष्ठ पत्रकार और मीडिया समूह सीमित है वहीं आज की मीडिया समाज को पथभ्रमित कर रही है तथा इस बेरोजगारी के दौर में यथार्थवादी पत्रकार अपने सिद्धांतों से सुलह करके पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं।

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यदि हम पत्रकारिता में कमीशन के प्राकट्य की बात करें तो मूल रूप से कमीशन का प्राकट्य इस वजह से हुआ कि पत्रकारिता में वेतन के मानदंड खास तौर से निश्चित नहीं है।

अगर हम मुख्य धारा की मीडिया को छोड़कर वैकल्पिक मीडिया की ओर रुख़ करें तो वैकल्पिक मीडिया के बहुत से समाचार चैनल और समाचार पत्र आज अपने पत्रकारों को मासिक उपार्जन देने की दशा में भी नहीं है उनकी आय का जरिया विशिष्ठ रूप से विज्ञापन है इसलिए बहुत से यथार्थवादी पत्रकार इस दौर में स्वयं की आजीविका चलाने में भी सामर्थ्यहीन है।

लेखक: सतीष भारतीय