RTI लागू होने के अगले दिन ही नदीमुद्दीन ने मांगी सूचनाएं अब तक लगा चुके हैं 15 सौ से अधिक आरटीआई.. – दैनिक जागरण (Dainik Jagran)

काशीपुर निवासी आरटीआइ एक्टीविस्ट नदीमुद्​दीन के आरटीआइ आवेदन पर विभागीय अधिकारियों के हाथ पांव फूल जाते हैं। उन्होंने 12 अक्टूबर 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम का गठन होने के बाद दूसरे ही दिन 13 अक्टूबर 2005 को काशीपुर नगर पालिका में भ्रष्टाचार के विषय पर आरटीआइ लगाकर सूचना मांग ली थी। तब से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, राजभवन, उत्तराखंड मुख्यमंत्री कार्यालय, लोकसभा, राज्यसभा, विभिन्न आयोगों सहित अन्य विभागों के लोक सूचना अधिकारियों से करीब 1550 सूचनाएं मांग चुके हैं।

उत्तराखंड शासन के प्रमुख सचिव सहित विभिन्न अधिकारियों पर सूचना आयोग द्वारा नदीमुद्​दीन की अपील पर पेनाल्टी भी लगाई जा चुकी है। इनकी शिकायत पर उत्तराखंड मानवाधिकार सहित विभिन्न प्राधिकारियों में सूचना अधिकार का पालन प्रारंभ हुआ है। नदीम के अपील पर सूचना आयोग ने जीवन संबंधी सूचनाओं के लिए गाइडलाइन जारी की। इसके अतिरिक्त बरसों से फाइलों में दबी राजधानी चयन आयोग की रिपोर्ट अाौर उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग की आठ वर्षों की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है।मूलभूत सुविधाओं के संबंध में सूचनाएं मांगने पर काशीपुर समेत उत्तराखंड के अन्य शहरों में सड़क, सफाई, पेयजल, विद्युत की सेवाओं में सुधार हुआ है। सांसद व विधायक निधि की सूचनाएं मांगने से इसके खर्च में सुधार हुआ है। इसके अतिरिक्त सांसदों, विधायकों व अधिकारियों के संपत्ति विवरणों की सूचनाएं से पारदर्शिता बढ़ी साथ ही कोर्ट में लंबित केसों की सूचनाएं मांगने से केसों के निपटारे में सुधार हुआ है। लोकायुक्त सहित विभिन्न विषयों पर सूचनाएं मांगने से इन पर सरकार पर दबाव बढ़ा।

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समाजसेवा से मिल रही प्रेरणा
आरटीआइ कार्यकर्ता नदीमुद्​दीन ने बताया कि कोर्ट में हिन्दी भाषा का प्रयोग होना चाहिए, लेकिन अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जा रही है। नदीमुद्​दीन ने बताया कि बताया कि उन्होंने आरटीआई के माध्यम से भ्रष्टाचार के अब तक मामले उजागर किए।

सूचना देने से कतराते हैं अधिकारी
काशीपुर में परिवार कल्याण विभाग, खाद्य एवं आपूर्ति, नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग, जल संस्थान, पेयजल विभाग, समाज कल्याण विभाग, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन एवं विकलांग पेंशन, शहरी विकास विभाग, विकास खंड आदि विभागों के जन सूचना अधिकारी समय से सही जानकारी देने से कतराते हैं।

क्या कहते हैं आरटीआइ कार्यकर्ता
आरटीआइ कार्यकर्ता अमरजीत सिंह ने बताया कि लोक प्राधिकारियों की बाध्यताएं तय की गई हैं। हर लोक प्राधिकारी के लिय अनिवार्य है कि वह अपने विभाग दस्तावेजों को सूचीबद्ध करके रखे। लेकिन सही तरीके से आरटीआइ के नियमों का पालन नहीं होने से भष्ट्राचार को बढ़ावा मिल रहा है।आरटीआइ कार्यकर्ता मुजीम अहमद का कहना है कि आरटीआइ एक्ट के क्रियान्वयन से जुडे़ लोकसेवकों को भी समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। जिससे कानून सार्वजनिक कामकाज में पारदर्शिता लाने, भ्रष्टाचार रोकने, अनियमितता व लेटलतीफी पर अंकुश लगाने और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत बनाने का उद्देश्य पूरा हो सके।आरटीआइ कार्यकर्ता सूरज कुमार का कहना है कि सरकारी विभाग में बैठे अधिकारियों द्वारा सूचना को कठिन बनाकर गोलमोल तरीके से सूचना देकर लोगों को गुमराह किया जाता है। आम जनता को न्याय पाने के लिए बनाए गए आरटीआई के तहत जवाबदेही को सरल बनाने की जरूरत है, जिससे पारदर्शिता बनी रहे।

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कैसे लगाएं आरटीआइ
यदि किसी भी सरकारी विभाग पर भ्रष्टाचार की आशंका है तो उससे जुड़े हुए कुछ सवाल तैयार करें। इसके साथ 10 रुपये का पोस्टर ऑर्डर के साथ संबंधित विभाग को डाक से भेजें। संबंधित विभाग के जन सूचना अधिकारियों (पीआईओ) से 30 दिन के अंदर सूचना नहीं मिलने पर प्रथम अपीलीय अधिकारियों जिलाअधिकारी (एफएए) को आवेदन करना होता है। वहां से भी 30 दिनों के अंदर संतोषजनक जानकारी प्राप्त नहीं होने पर सेकेंड अपील राज्य सूचना अधिकारी के समक्ष दायर करनी होती है। अगर विभाग द्वारा सूचना दिया जा रहा है तो फोटोकॉपी का पैसा संबंधित विभाग में आवेदनकर्ता को जमा करना होता है। अगर आवेदन कर्ता बीपीएल कार्ड धारी है तो आरटीआइ एक्ट के तहत सभी देय शुल्क माफ होता है।