सूचना छिपाने वाले अधिकारी-कर्मचारी की संख्या तीन गुना बढ़ी: सूचना देने की बजाय पैनल्टी भरने को तैयार अधिकारी…

प्रदेश के सरकारी सिस्टम में अपारदर्शिता घुसती जा रही है। 8 वर्षों के आंकड़ों को लें तो सूचना छिपाने वाले अधिकारी-कर्मचारी की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। सिस्टम में अपारदर्शिता इस कदर बढ़ती जा रही है कि जनता को सीधे जानकारी देना तो दूर सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत भी जानकारी नहीं मिल रही है।

सरकार भले ही पारदर्शिता की बात करें, लेकिन सिस्टम का रवैया सवाल खड़े कर रहा है। आरटीआई के आंकड़े इस बात को पुख्ता कर रहे हैं। 2005 में आरटीआई एक्ट लागू हुआ, ताकि पारदर्शिता बढ़ने से लोग भी सरकारी कामकाज पर नजर रख सके, लेकिन प्रदेश में अधिकारी-कर्मचारी सूचनाएं छिपाने को पैनल्टी तक भरने को तैयार हैं।

2007-14 तक 983 पर 76 लाख, 2015-22 तक 2761 पर 4.40 करोड़ रु. जुर्माना
यह सिलसिला 2015 से ज्यादा शुरू हुआ है। 2005 से अब तक कुल 3,746 कर्मियों पर 5.17 करोड़ रु. का जुर्माना इसलिए लगा, क्योंकि उन्होंने आरटीआई के तहत जानकारी नहीं दी। इसमें 2007-14 तक 983 अधिकारी-कर्मचारी पर 76.46 लाख जुर्माना लगा था। पिछले 8 वर्षों में 2,761 अधिकारी-कर्मचारी पर 4.40 करोड़ रुपए का जुर्माना है।

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सीनियर अफसर हर माह करें समीक्षा: वर्धन
मुख्य सूचना आयुक्त विजय वर्धन का कहना है कि आयोग जुर्माना लगा सकता है। आयोग को लगता है कि ज्यादा लापरवाही हुई तो पीड़ित को मुआवजा भी दिलाया जाता है। वर्धन का कहना है कि यदि सूचना अधिकारी सूचना नहीं देता है तो प्रथम अपील अधिकारी को संज्ञान लेना चाहिए। हमने कहा भी है कि सभी आफिसर्स को हर माह इसकी समीक्षा करनी चाहिए, ताकि यह सामने आ सके

सूचना मिलने लगे तो पोल खुल जाएगी: धींगड़ा
आरटीआई एक्टिविस्ट हीरेंद्र धींगड़ा का कहना है कि सूचनाएं छिपाई जा रही हैं। यदि सूचना पूरी मिलने लगे तो भ्रष्टाचार के मामले भी खुलने लगेंगे। क्योंकि जिसने करोड़ों रुपए कमाए हैं, वह 25 हजार रुपए जुर्माने की परवाह नहीं करता। एक मामले में तो सूचना देने वाले कर्मचारी को चंडीगढ़ से सस्पेंड तक कर दिया गया था। कुछ विभाग तो ऐसे हैं, जो सूचनाएं देते ही नहीं।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के अंतर्गत धारा 20 शास्ति का उल्लेख करती है। इसका अर्थ है दंड। यह अधिनियम सूचना के अधिकार को अत्यधिक समृद्ध करता है। इस अधिनियम के अंतर्गत वे सभी व्यवस्था कर दी गई है जो सूचना प्राप्त करने में सहायक हो। नागरिकों को सूचना प्राप्त करने हेतु स्थान बताया गया है, वहां सुनवाई नहीं होने पर उसकी शिकायत करने का स्थान बताया गया है, वहां भी सुनवाई नहीं होने पर अपील करने का निर्देश दिया गया है। इस अधिनियम के अंतर्गत लोक अधिकारियों को सूचना नहीं देने यह सूचना मांगने वाले व्यक्ति के विरुद्ध असदभावनापूर्वक व्यवहार करने तथा भ्रमक सूचना देने या सूचना को नष्ट कर देने हेतु दंड की व्यवस्था की गई है।

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हालांकि यह दंड कारावास का नहीं है केवल अर्थदंड है तथा अनुशासनहीनता की कार्यवाही का दंड है परंतु इस शक्ति को इस अधिनियम में प्रवेश देने का उद्देश्य लोक अधिकारियों के भीतर ऐसे भय को पैदा करना है जिससे वह कोई भी सूचना देने में आनाकानी न करें तथा हिले हवाले न दे। इस आलेख के अंतर्गत इस अधिनियम की धारा 20 पर सारगर्भित टीका प्रस्तुत किया जा रहा है तथा इस धारा से संबंधित अदालतों के लिए कुछ न्याय निर्णय भी प्रस्तुत किए जा रहा है।