मृत श्रमिक को हंसा हॉस्पिटल छोड़ भागे इकाई संचालक।

संघ प्रदेश दमण में स्थित औधोगिक इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों के जीवन का मूल्य इकाई मालिक के लिए केवल तब तक ही दिखाई देता है जब तक कि उस में जान हो, जान निकलने के बाद इकाई मालिक उसी मजदूर को इस तरह इकाई से बाहर कर देता है जैसे वह इकाई में ना काम आने वाला समान हो। अब ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्यो कि एक श्रमिक कि जीवन लीला समाप्त होने के बाद कुछ ऐसा ही देखने को मिला। दमण के दाबेल क्षेत्र में स्थित एक ओधोगिक इकाई से एक श्रमिक का शव इकाई संचालक अथवा ठेकेदार दाबेल के हंशा हॉस्पिटल छोड़ कर चले गए। हंशा हॉस्पिटल से किसी अज्ञात व्यक्ति ने इस मामले कि जानकारी देते हुए बताया कि प्राइम हेल्थ केयर के पास किसी जीवनिका नामक कंपनी से श्रमिक का शव लाया गया है और जिसे अब हंसा हॉस्पिटल ने मृत घोषित करते हुए मरवड हॉस्पिटल ट्रांसफर कर दिया गया है ताकि वहां मरवड हॉस्पिटल के क़ाबिल चिकित्सक मृत में जान डालने कि कोशिस कर सके, लेकिन मरवड हॉस्पिटल के डाक्टरों ने भी यमराज कि मर्जी के आगे हार मान ली, एक और श्रमिक अपने मालिक कि ऐशगाह आबाद करते करते दुनिया छोड़ गया।

जब मरवड हॉस्पिटल से उक्त मामले कि जानकारी मांगी तो बताया गया कि उन्हे नहीं पता वह किस ओधोगिक इकाई में काम करते हुए उसने जान गवाई। मरवड हॉस्पिटल से पता चला कि मृतक श्रमिक का नाम वीरेन्द्र सिंह राम सिंह राजपूत था और दाबेल में किसी मुकेश भाई कि बिल्डिंग में रूम नंबर 20 में रहता था। मरवड हॉस्पिटल को मुकेश भाई कि बिल्डिंग का पता कैसे मिला यह तो नहीं पता लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि जिस कंपनी में काम करते हुए उसकी मौत हुई उस कंपनी के नाम कि जानकारी मरवड हॉस्पिटल को नहीं है। क्या श्रमिक के पास कोई कंपनी द्वारा जारी किया आई-डी कार्ड नहीं था? क्या कंपनी ने उसे आई-डी कार्ड नहीं दिया? क्या मृतक श्रमिक का वेतन उसके बेंक खाते में जमा होता था और क्या कंपनी उसके पी-एफ का पैसा जमा करती थी? ऐसे कई सवाल है जिनके जवाब के लिए श्रम निरक्षक को बारीकी से जांच कर मामले में कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए क्यो कि दमण में ऐसी कई इकाइयां है जो श्रमिकों को केवल बंधुआ मजदूर समझती है। इस लिए इस मामले से सबक लेकर श्रम निरीक्षक को चाहिए कि तत्काल सभी इकाइयों से श्रमिकों तथा ठेकदारों कि सूची एक तय समय में श्रम निरीक्षक कार्यालय में जमा करवाए अथवा ठेकदार बदलने पर पहले श्रम निरीक्षक के कार्यालय श्रम विभाग को सूचित करें ताकि श्रमिकों के ठेकेदार श्रमिकों का शोषण ना कर सके।

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