प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कमाल, कागजों में साफ हो गई मध्यप्रदेश की सारी नदियां

नदियों के पानी की जांच के बदले मापदंडों के चलते लगभग सभी नदियों का पानी मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी रिपोर्ट में स्वच्छ हो गया है। इसके चलते पानी सालभर से ए और बी श्रेणी का बना हुआ है जबकि हकीकत में नदियों के पानी में सीवेज आदि मिलने के कारण खूब गंदगी घुली हुई है। इससे कई जगह बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी भी अधिक है। फीकल कॉलीफॉर्म और टोटल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया भी नदियों के पानी में काफी मात्रा में हैं जो नुकसानदेह हो सकते हैं। प्रदूषण नियंत्रण के केवल मापदंड ही नहीं बदले बल्कि सैंपल लेने के तरीके में भी बदलाव के चलते नदियां स्वच्छ हो गई हैं।

केवल खान, चंबल, शिवना और क्षिप्रा नदी का पानी ही संतोषजनक श्रेणी का नहीं
नदियों में बढ़ते प्रदूषण की स्थिति और एनजीटी में उसकी रिपोर्ट देने की बाध्यता के चलते सीपीसीबी ने मापदंडों में बदलाव किया है। इसके तहत फीकल कॉलीफॉर्म बैक्टीरिया को प्रति 100 एमएल पानी में 2500 एमपीएन तक मान्य किया गया है। वहीं, टोटल कॉलीफॉर्म 5000 तक मान्य हैं जबकि पहले के मापदंडों में यह 50 तक ही मान्य किए जाते थे। अब इतनी बड़ी संख्या में मान्य होने के चलते नदियों का पानी असुरक्षित की श्रेणी से बाहर हो गया है। एमपीपीसीबी की मार्च की वाटर क्वालिटी इंडेक्स रिपोर्ट में केवल खान, चंबल, शिवना और क्षिप्रा नदी का पानी ही संतोषजनक श्रेणी का नहीं पाया गया। अन्य सभी नदियों का पानी संतोषजनक है, जबकि अभी नर्मदा नदी में ही बड़ी मात्रा में एल्गी तैर रही है। जो प्रदूषण के कारण ही बढ़ती है।

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पहले नदी के पानी की सैंपलिंग किनारे से होती थी क्योंकि किनारे के पानी का ही घाटों पर अधिकांश लोग उपयोग करते हैं। वे न केवल इसमें स्नान करते हैं बल्कि आचमन के लिए भी नदी के पानी का उपयोग करते हैं। लेकिन अब पीसीबी का अमला नदी के बीच में से सैंपल ले रहा है। चूंकि नदी के बीच में प्रवाह तेज रहता है इसलिए किसी तरह की गंदगी यहां टिक ही नहीं पाती, इसलिए असलियत सामने नहीं आ पाती।

पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी पांडे के अनुसार नदियों का पानी मापदंड बदलकर भले ही स्वच्छ दिखा दिया जाए लेकिन इसके दुष्प्रभाव तो देखने को मिलते ही हैं। चूंकि इसके आसपास जो कुएं और बोरवेल होंगे उनके पानी पर भी नदी का प्रभाव पड़ता है। यदि नदी का पानी प्रदूषित होगा तो उनका पानी भी दूषित होने की पूरी संभावना रहती है। मैंने कलियासोत नदी के आसपास के भूजल स्रोतों के पानी की जांच की थी, इसके आसपास के डेढ़ किलोमीटर के दायरे में पानी पीने योग्य नहीं पाया गया। इससे आप आसानी से समझ सकते हैं कि यह कितना खतरनाक हो सकता है।

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मापदंडों की एक खास बात यह भी है कि इसमें पानी में कितने हैवी मेटल मौजूद हैं इसकी जांच ही नहीं की जा रही है जबकि नदियों में औद्योगिक अपशिष्ट मिलने के बाद उसके पानी में हैवी मेटल्स की मात्रा भी काफी बढ़ जाती है। बेतवा नदी में औद्योगिक क्षेत्रों के पास के पानी में पहले भी हैवी मेटल मिले थे लेकिन अब जांच नहीं की जा रही।

– प्रदेश की इन नदियों को प्रदूषित माना गया है
मध्यप्रदेश की 22 नदियों को सबसे अधिक प्रदूषित माना गया है। इन्हें अब प्रदूषणमुक्त करने के लिए केन्द्र सरकार ने भी प्रयास शुरू किया है। इसमें प्रमुख रूप से रीवा की बिछिया, टोंस चाकघाट(रीवा), मंदाकिनी चित्रकूट सतना, खान नदी इंदौर, क्षिप्रा उज्जैन, चंबल नदी नागदा(उज्जैन), बेतवा मंडीदीप भोपाल एवं विदिशा, कलियासोत कोलार, ताप्ती बुरहानपुर, गोहद, कटनी नदी, कुंडा नदी खरगोन, मालेनी जौरा, नेवाज शाजापुर, सिमरार कटनी, वैन गंगा सिवनी, सोन नदी धनपुरी, चामला बडऩगर, पार्वती नदी पीलुखेड़ी, चोपन गुना, कन्हान छिंदवाड़ा आदि हैं।