भारत में आजादी के सात दशक बाद आज भी गाँव में कायम है अस्पृश्यता और जातिवाद.

भारत गाँव का देश है ऐसा हम सदियों से कहते आ रहे हैं लेकिन आजादी के

सात दशक गुजर जाने के बाद भी हमारे गांवों में अस्पृश्यता और जातिवाद जैसी विषमताएँ आज भी बरकरार है. जो इंसानों की सोच को संकुचित करतीं है और किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधक है

हमारा संविधान हमें धर्म, नस्ल, जाति, लिंग या जन्म-स्थान आदि के बिना किसी भेद-भाव के आधार पर स्वतंत्रता पूर्वक जीवन व्यतीत करने की आजादी देता है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह श्रेष्ठ अल्फाज़ संविधान की उस महान पुस्तक तक ही सीमित रह गये है और जमीनी स्तर पर स्थिति से उलट है

हाल ही में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक साक्षात्कार में अपने गांव में जातिगत भेदभाव जैसी कुप्रथा के बारे में खुलकर बातचीत की. नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि, ‘मेरी दादी छोटी जाति से संबंध रखती थीं, इसलिए दादी की वजह से मेरे गांव में आज भी हमें एक्सेप्ट नहीं किया गया है. यहां यह विचारणीय है कि बॉलीवुड के मशहूर एक्टर एवं उनका परिवार भी गांव में जातिवाद जैसी कुप्रथा की वजह से सम्मान पूर्वक जीवन व्यतीत नहीं कर पा रहा. तो आप तसव्वुर कर लीजिए गांव में एक नीची जाति का व्यक्ति कैसे जीवन गुजारता होगा.

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मेरा जन्म भी एक गाँव में हुआ और मैं अभी भी मध्यप्रदेश के एक उसी छोटे से गाँव में निवासरत हूं तथा मैंने अपने गांव से लेकर दूर-दूर तक के गांव में अस्पृश्यता और जातिवाद जैसी कुप्रथा को बहुत नजदीक से देखा है.

गांव में मैंने देखा है ऊंची जाति की महिलाएं इतना जातिवाद मानती हैं कि अगर किसी नीची जाति के दुकानदार के यहां दुकान से घरेलू सामान लेने आती है तो वह पैसों को दुकान से दूर जमीन पर रख देती है और सामान भी जमीन पर रखने को कहतीं है जब सामान जमीन पर रख देते हैं तब वह सामान लेकर जाती हैं और अगर पानी भरने को जाती हैं तो कोई नीची जाति वाला अगर सड़क पर चल रहा है तो वह पटरी चलती हैं यदि वह पटरी पर चल रहा है तो वह सड़क पर चलने लगती हैं.

कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी किसी नीची जाति वाले व्यक्तियों को शादी के अवसर पर बाजा नहीं बजवाने देते ,दूल्हे को घोड़े पर बैठकर उच्च वर्ग के लोग निकलने नहीं देते है अगर कोई निकलता है तो बंदूक और तलवार के बल पर खून-खराबे पर उतर आते तथा मारपीट करते हैं.

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अगर किसी निम्न वर्ग के व्यक्ति ने उच्च कुल की लड़की के साथ शादी कर ली तो उच्च कुलीन लोग निम्न कुल के व्यक्ति की हत्या तक कर देते हैं लेकिन इस संबंध को स्वीकारते नहीं है.

अभी भी गाँवों में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के मध्य एक साथ खान-पान संभव नहीं है और छुआछूत तो इतना है कि अगर कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग के व्यक्ति को छू लेता है तो उच्च वर्ग के व्यक्ति स्नान करने के उपरांत घर में प्रवेश करते है. इस समय भी गांव कोई निम्न वर्ग का व्यक्ति उच्च वर्ग के व्यक्ति के समीप भी नहीं बैठ सकता है.

छूआछूत तो ग्रामीण समाज इस तरह हावी है कि उच्च कुल के व्यक्तियों के पास से अगर निम्न कुल का व्यक्ति गुजर जाए तो कुछ लोगों की चेहरे की रंगत बदल जाती है और वह निम्न वर्ग के व्यक्ति से बात भी नहीं करना चाहते. यूं समझ लीजिए की ग्रामीण अंचल में निम्न वर्ग के व्यक्तियों की

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तुलना में जानवरों को श्रेष्ठ समझते हैं.

हमारा ग्रामीण क्षेत्र इस कदर जातिवाद और अस्पृश्यता व्याप्त है की निम्न वर्ग के व्यक्तियों को मंदिरों में भी जाने की अनुमति नहीं है.

अस्पृश्यता और जातिवाद जैसी कुप्रथा हमारे ग्रामीण समाज में इंसानों के बीच आज भी दूरियां बनाए हुए हैं और इन कुप्रथाओं ने मानवता को विभाजित कर दिया एवं भारत में आज भी उच्च वर्गों द्वारा निम्न वर्गों का शारीरिक और मानसिक शोषण हो रहा है.

मैं यह जिक्र नहीं कर रहा कि आज दुनिया चांद पर पहुंच गई कि बल्कि यह कह रहा हूं हमारा मुल्क रेलगाड़ी से शुरू होकर एयर इंडिया तक पहुंच गया आज हम तकनीकी से लेकर बहुत सी चीजों में ऊपर आ चुके हैं. किंतु एक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास और समूचे देश के विकास के लिए हमें अस्पृश्यता और जातिवाद जैसी कुप्रथाओं से ऊपर उठकर सोचने की दरकार है तब सही मायनों में राष्ट्रीय एकता स्थापित होगी जो मुल्क के उज्जवल भविष्य के लिए अपरिहार्य है

लेखक: सतीश भारतीय