कोरोना का सच क्या है? एक बड़ा घोटाला, अंतर्राष्ट्रीय क्षडियंत्र, या फिर मानव अंगों की तस्करी?

Corona

कोरोना को लेकर सोशल मीडिया में विचिलित कर देने वाले विडियों और सवालों कि जो सुनामी चल रही है उनका सच क्या है? क्या कोरोना कि आड़ में कोई बड़ा घोटाला हो रहा है? क्या जनता कि जान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है? सोशल मीडिया पर कई विचिलित करने वाले विडियों और सवाल वायरल हो रहे है। कुछ विडियों में दावा किया जा रहा है कि अस्पताल प्रबंधन कि लापरवाही कि वजह से मरीजों कि जान जा रही है, तो कुछ विडियों में दावा किया जा रहा है कि कोरोना एक अंतर्राष्ट्रीय क्षडियंत्र है और जानबूझ कर जनता कि जान से खिलवाड़ किया जा रहा है। सच क्या है यह कैसे पता चलेगा?

दवाओं और ऑक्सीज़न की कमी से अब तक कितने लोगों की जान गई?

कितने शर्म की बात है की भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा देने वाली सरकार, कोरोना काल में भी दवाओ और ऑक्सीज़न की कालाबाजारी पर लगाम नहीं लगा पाई। देश के विकास के लिए करोड़ों रुपये टैक्स देने वाली जनता को यदि 40 से 50 हजार रुपये में ऑक्सीज़न और 25000 रुपये में रेमेडिसविर इंजेक्शन खरीदनी पड़े तो फिर सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाज़मी है। ऑक्सीज़न की कमी पर, दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा की ऑक्सीज़न की कमी से लोगो को मरता नहीं देख सकते। यह बात बिलकुल सभी है ऑक्सीज़न ही नहीं बल्कि किसी भी प्रकार कि दवा कि कमी से यदि किसी कि म्रत्यु होती है तो उसके लिए किसी ना किसी को तो ज़िम्मेवार ठहराकर उसे सजा देनी चाहिए और जिस तरह नियमों के पालन तथा समय पर टैक्स अदा ना करने पर जनता से ब्याज के साथ पेनल्टी वसूल की जाती है क्या ठीक वैसे ही सरकार भी जनता को पेनल्टी देगी? अस्पतालों को भी मरीज कि जान ना बचा पाने पर मरीज के परिवार से वसूली गई पूरी रकम और खर्च वापस देगी? खेर इन सवालों का जवाब तो जब मिलेगा तब मिलेगा। इससे पहले इस सवाल का जवाब जरूरी है की प्रतिदिन दवाओं की कमी और ऑक्सीज़न की कमी से कितने लोगों की जान गई?

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वैक्सीन की अलग अलग कीमत क्या कोई बड़ा घोटाला है?

केंद्र को वैक्सीन 150 रुपये में तो फिर राज्यों को वैक्सीन 400 रुपये में क्यों? क्या यह कोई बड़ा भ्रष्टाचार है? सीधी सी बात है यदि राज्य अधिक कीमत में वैक्सीन खरीदेंगे तो दवा कंपनियों को मुनाफा होगा, अब इस मुनाफे के बदले में दवा कंपनिया केंद्र सरकार को क्या देगी? यह सवाल भी जरूरी है। वैसे सवाल यह भी है की वैक्सीन बनाने वाली कुल कितनी कंपनियाँ है? वैक्सीन बनाने का लागत मूल्य क्या है? वैक्सीन बनाने वाली कंपनियाँ प्रति वैक्सीन कितने रुपयों का मुनाफा कमा रही है? पिछले कोरोना काल में मोदी जी ने कहाँ था की आपदा को अवसर बनाए। क्या वैक्सीन कंपनियाँ अपने मुनाफे के लिए आपदा को अवसर तो नहीं बना रही है? क्या इस महामारी के दौर में दवा कंपनियों को लागत मूल्यों पर वैक्सीन उपलब्ध कराकर मानवता का परिचय नहीं देना चाहिए?

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सोशल मीडिया पर वायरल विडियों…

ऐसे कई विडियों है जो आपने सोशल मिडया पर देखे होंगे आपको whatsapp पर मिले होंगे। सोशल मीडिया पर कोरोना को लेकर जो सवाल किए जा रहे है उन सवालों को देखकर लगता है कि जनता को यह शंका है कि कोरोना के नाम पर मानव अंगों कि तस्करी का खेल चल रहा है? यह सच है या झूठ कोई नहीं जनता। 

  1. भारत में ऐसे कितने अस्पताल है जो आंख, लीवर, किडनी जैसे अन्य मानव अंगों के ट्रांसप्लांट करते है? सोचने वाली बात है कि किसी छोटे ग्रामीण क्षेत्र में गाँव में ना ऐसे अस्पताल है ना वहां कोरोना का इतना हाहांकार है?
  2. कोरोना से पहले प्रतिवर्ष कितने आंख, लीवर, किडनी जैसे मानव अंगों के ट्रांसप्लांट हुए और कितने मरीज़, आंख, लीवर, किडनी जैसे अन्य मानव अंगों के ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग में थे कि जब डोनर मिलेगा तब ट्रांसप्लांट होगा?
  3. कोरोना के बाद प्रतिवर्ष कितने आंख, लीवर, किडनी जैसे मानव अंगों के ट्रांसप्लांट हुए और कितने मरीज़ आंख, लीवर, किडनी जैसे अन्य मानव अंगों के ट्रांसप्लांट के लिए वेटिंग में है?

कोरोना से पहले वेटिंग कि संख्या और कोरोना के बाद वेटिंग कि संख्या के सही आंकड़े भी सच सामने लाने के लिए बेहद जरूरी है। लेकिन सवाल यह है की यह आंकड़े जनता के सामने कैसे आएंगे? क्या सूचना के अधिकार के द्वारा ऐसे सवालों के जवाब मिल सकते है?

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गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि असल तस्वीर छिपाई तो जनता का भरोसा खो देंगे। गुजरात हाईकोर्ट यह बात बहोत कुछ कह रही है। इस बात का ताल्लुख सच है वो सच जो शायद जनता नहीं जानती या फिर हाईकोर्ट को लगता है कि जनता से सच छुपाया जा रहा है। जनता के सामने सच लाने का काम मीडिया का है। लेकिन बड़े ताज्जुब कि बात है जहां आर्थिक रूप से कमजोर पत्रकार अपनी ईमानदार पत्रकारिता द्वारा सोशल मीडिया पर जनता को सच परोस रहे है वही कोरोना संकट में देश के बड़े बड़े मीडिया संस्थान जनता का भरोसा जीतने के बजाए ब्रेक और विज्ञापन को महत्व दे रहे है। जनता सब देख रही है लेकिन जनता शायद यह नहीं जानती कि सोशल मीडिया पर, खबरें लिखने वाले, रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार भी एक दिन आर्थिक सहयोग ना मिलने के कारण जनता को सच नहीं परोस पाएंगे। इस लिए जनता को चाहिए कि उसके गाँव और शहर के जो पत्रकार सच खोजकर जनता के सामने रख रहे है ऐसे पत्रकारों कि मदद के लिए स्वय आगे आए ताकि जनता के सामने सच आता रहे।