भ्रष्टाचार, अवैध वसूली, कामचोरी, अनियमितता, कुर्सी का दुरुपयोग, और चापलूसी में अव्वलता…

Daman
Daman

शायद इसे ही कहते है असली आज़ादी जहां कामचोरी की कोई सजा ही नहीं ना ही भ्रष्टाचार कि और ना ही अनियमितता कि, जो जनता का हीत नहीं अपने निजी हितों के लिए काम करता हो और अपनी ऐशगाह और तिजोरी भरने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है!
संध प्रदेश दमन-दीव व दानह के पीसीसी सदस्य सचिव देबेंद्र दलाई के बारे में इन दिनों ऐसी ही बाते चल रही है, बताया जाता है कि यह किसी कि नही सुनते और इनके खिलाफ प्रशासक नहीं सुनते भलेही प्रशासक आशीष कुन्द्रा के पास इस अधिकारी के भ्रष्टाचार का सबूत ही क्यों ना हो!
संध प्रदेश दमन-दीव व दादरा नगर हवेली कि कितनी कंपनियों से अब तक देबेंद्र दलाई ने कंसंट रिन्यूयाल के नाम पर और एन-ओ-सी के नाम पर पैसे लिए है यह पता चल जाएगा बस सीबीआई इनके ठिकानों पर एक बार छापे मारी करके तो देखे, और अगर उस से भी काम ना बने तो इस अधिकारी के शागिर्द भूमिका से पुछले कि उनके साहब का रेट कितना है दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा, लेकिन अगर प्रशासक इस मामले में स्वयम जांच करवाए तब तो फिर भगवान ही मालिक है, क्यों कि देबेंद्र दलाई पर भ्रष्टाचार के मामले में व अनियमितता के मामले में, प्रशासन में जांच की फाइल पहले से ही लंबित पड़ी है, और एक फाइल तो ऐसी है जिसमे प्रशासक आशीष कुन्द्रा ने देबेंद्र दलाई पर भ्रष्टाचार करने की आशंका जताई है, लेकिन उस फाइल पर लिखने के बाद प्रशासक आशीष कुन्द्रा ने देबेंद्र दलाई पर कोई कार्यवाई नहीं कि इस के जवाब के लिए कभी न कभी प्रशासक आशीष कुन्द्रा को स्वयम कटगरेह में आना पड़ेगा!

ये भी पढ़ें-  लोकसभा में पास हुआ दोनों संघ प्रदेशों के विलय का बिल, दोनों सांसदों ने कई मुद्दो पर कि बात।

आखिर क्या है ऐसा पीसीसी के चेयरमेन कि कुर्सी में?

संध प्रदेश दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के चेयरमेन की कुर्सी को लेकर और इस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर सालों से सवाल और विवाद रहे है, पूर्व में भी कई बार यह मांग कि गई की पर्यावरण संबन्धित मामले व विभाग किसी ऐसे अधिकारी के पास रहे जो इस विभाग को समय दे सके और पर्यावरण समस्याओं के समाधान के साथ साथ उधोगिक उत्पादन को बढ़ावा दे सके।
लेकिन देखा गया है कि वन एवं पर्यावरण सचिव तथा प्रदूषण नियंत्रण समिति के चेयरमेन की कुर्सी यह दोनों प्रभार पिछले कई वर्षों से सर्वाधिक विकास आयुक्त के पास रहे, पूर्व में तत्कालीन विकास आयुक्त ज्ञानेश भारती और इस वक्त विकास आयुक्त संदीप कुमार पर्यावरण सचिव व प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष कि कुर्सी पर जमे है। विकास आयुक्त संदीप कुमार के पास और भी दर्जनों प्रभार है और वह ना ही इस विभाग को समय दे पा रहे है और ना ही विभाग की समस्याओं को निपटाने में कामियाब हो रहे है, आलम यह है कि सालों से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के आदेशों व निर्देशों पर अमल तक नहीं हुआ और ना जाने कब होगा।
इस विभाग की कार्यप्रणाली और विकास आयुक्त की व्यस्तथा के साथ साथ देबेंद्र दलाई की कामचोरी मोदी सरकार और दमन-दीव व दानह प्रशासन को और कितना शर्मिंदा करेगी यह तो वक्त बताएगा, लेकिन प्रशासक को इस मामले में अवश्य सोचने की आवश्यकता है कि केवल एक विकास आयुक्त को ही इतने अधिक विभागों का प्रभार क्यों और क्या इसी को विकास कहते है?
मामले की गंभीरता और पर्यावरण के बिगड़ते हालत को देखते हुए प्रशासक को चाहिए कि वन एवं पर्यावरण सचिव तथा प्रदूषण नियंत्रण समिति के अध्यक्ष का कार्यभार किसी अन्य अधिकारी को दे देवें जो इस विभाग एवं प्रदेश दोनों को समय दे सके!

ये भी पढ़ें-  बी डी ओ दमण द्वारा ग्राम पंचायत सदस्यों से मांगा चालो का व्यवस्थित ब्योरा

पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश को गए वर्षों बीत गए लेकिन उनके समय में जारी हुए आदेश व निर्देश अब दमन-दीव व दानह प्रशासन में धूल खा रहे है।