दमण कि कई कंपनियाँ नहीं दे रही श्रमिकों को वेतन।

वापी। संघ प्रदेश दमण में काम करने वाले श्रमिकों कि शिकायते दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। श्रमिकों का कहना है इकाइयां उन्हे उनका बकाया वेतन नहीं दे रही है ओर श्रमिक बार बार इकाइयों के चक्कर काट रहे है। अभी कुछ दिन पहले दमण में स्थित सेलों प्लास्ट के श्रमिकों कि शिकायत सामने आई थी कि उन्हे सेलों प्लास्ट से बकाया वेतन नहीं मिला, जब बड़ी संख्या में श्रमिक सेलों प्लास्ट जमा हुए तो श्रमिकों को खदेड़ने के लिए सेलों प्लास्ट ने पुलिस बुला ली, इसके बाद सेलों प्लास्ट कि ओर से कहा गया कि उन्हे वेतन दे दिया जाएगा, लेकिन श्रमिकों कि शिकायत है कि लॉकडाउन के समय का वेतन सेलों प्लास्ट ने अभी तक नहीं दिया।

श्रमिकों कि इस शिकायत के बाद, दमण में स्थित मेक्लोयड फार्मा में काम करने वाले श्रमिकों कि भी यही शिकायत रही ओर सेकड़ों कि संख्या में मेक्लोयड फार्मा के श्रमिक वेतन ना मिलने कि शिकायत करते देखे गए, सेलों प्लास्ट ओर मेक्लोयड फार्मा के श्रमिकों कि शिकायत का समाधान होने से पहले एक ओर कंपनी के श्रमिक सड़क पर उतर आए है, वैसे पहले यह जान लीजिए कि मेक्लोयड फार्मा के कितने श्रमिक वेतन को तरस रहे है। मेक्लोयड फार्मा के श्रमिकों का कहना है कि उनका वेतन 8 से 10 हजार प्रतिमाह है ओर लगभग 300 श्रमिक है जिनहे वेतन नहीं मिला है। यदि 300 X 10000 = तीस लाख, इतनी बड़ी रकम ओर वह भी एक माह की। अब सवाल यह उठता है कि यह रकम किसकी जेब में गई? श्रमिकों से जब यह सवाल किया गया कि उनका ठेकदार कोन है तो श्रमिकों ने कहा कच्चीगांव के लालू भाई कि देखरेख में ठेका चलता है, जब श्रमिकों के पूछा गया कि कोनसे लालू भाई? क्या जो दमण-दीव के सांसद है आप उनकी बात कर रहे हो क्या? श्रमिकों ने कहा हाँ! अब यदि सही है तो यह बड़े शर्म कि बात है लेकिन गरीब श्रमिक झूठ भी क्यों बोलेंगे। खेर इस मेक्लोयड फार्मा के बाद अब उस कंपनी कि बात करते है जिसकी शिकायत आज सामने आई है। आज जिस कंपनी के बारे में श्रमिकों कि शिकायते सामने आई है उस कंपनी का नाम बताया जाता है राधिका। भीमपुर के पास स्कॉट कईसा के पास राधिका नाम कि कंपनी के श्रमिकों कि शिकायत है कि उक्त कंपनी भी श्रमिकों को उनका बकाया वेतन नहीं दे रहे है श्रमिकों का कहना है कि उन्होने श्रम विभाग के भी चक्कर लगाए लेकिन उन्हे श्रम विभाग से भी कोई मदद नहीं मिली।

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दिनांक 7 अप्रेल को, पहले लॉकडाउन में प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने एक विडियों ट्वीट किया था, “फिर मुस्कुराएगा इंडिया…” अब देश में गरीबों के हालत ओर हालत देखकर एक सवाल तो वाजबीय है क्या ऐसे मुस्कुराएगा इंडिया…? प्रधान मंत्री श्री मोदी ने जब यह विडियों ट्वीट किया तो इसकी खूब सराहना हुई। लेकिन बड़े शर्म कि 20 लाख करोड़ का पेकेज भी इस विडियों कि लाज़ नहीं रख पाया। गरीब का परिवार इकाइयों के सामने वेतन के लिए आँसू बहा रहा है गिड़गिड़ा रहा है ओर प्रशासनिक अधिकारियों के अभद्र व्यवहार का शिकार भी हो रहा है।

दरअसल उक्त सभी श्रमिक लॉकडाउन के समय का वेतन मांग रहे है उक्त श्रमिकों का कहना है कि प्रधान मंत्री मोदी जी ने कहा था कि श्रमिकों का वेतन ना काटा जाए, ऐसे में श्रमिकों का सवाल है कि उन्हे वेतन क्यो नहीं दिया जा रहा है। वह गाँव से जिस कंपनी के भरोसे आए थे यदि कुछ दिनों तक कंपनी बंद रही तो इसमे उनका क्या दोष? श्रमिकों का कहना है कि उनके पास जो पूजी थी वो ख़त्म हो गई है अब ना मकान का किराया चुकाने का पैसा है ना ही राशन खरीदने का पैसा है। श्रमिकों का कहना है कि हम ना ही अपने गाँव जा पा रहे है ना ही यहाँ रहकर अपना पेट भर पा रहे है। प्रशासनिक अधिकारी भी सीधे-मुह बात नहीं करते, क्यों कि हम गरीब है सड़कों पर पुलिस कभी लाठी चला देती है! अब ऐसे में करे तो क्या करें?

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परेशान ओर बे-बस गरीब श्रमिकों का अब संघ प्रदेश दमण के श्रम आयुक्त, श्रम उपायुक्त तथा श्रम निरीक्षक से यह सीधा सवाल है कि वह वातानुकूलित कार्यालय में बैठे बैठे क्या कर रहे है? दमण के श्रमिक, दमण प्रशासन तथा श्रम विभाग से यह जानना चाहती है कि वह किसके साथ है? क्या श्रमिकों को उनका वेतन मिलेगा? क्या श्रम आयुक्त, गरीब श्रमिकों को न्याय दिलाएँगे? श्रमिकों के सवाल तो कई है लेकिन अब उनका जवाब मिलता भी है या नहीं यह तो आने वाला समय बताएगा। वैसे श्रम आयुक्त को चाहिए कि वह सभी इकाइयों से बात कर इस समस्या का कोई ऐसा समाधान ढूँढे जिससे श्रमिकों को उनका वेतन मिल जाए ओर वैसे भी यह समय मानवता दिखाने का है ना कि बड़ी बड़ी इकाइयों के रसूख के बोझ तले मानवता ओर ईमानदारी को दफन करने का।