क्या सांसदो को आदिवासी युवको की योग्यता पर भरोसा नहीं है?

मोहन डेलकर के अवैध कब्जे से आज़ाद कराऊंगा आदिवासी भवन : सांसद नटुभाई पटेल | Kranti Bhaskar image 1
Nattu Patel Silvassa

दानह भारत के सबसे छोटे संघ प्रदेशो में से एक है। इसका क्षेत्रफल 491 वर्ग किमी है। इसमें से कुल 204 वर्ग किमी क्षेत्रफ़ल में वन संरक्षित है। एफएसआई रिपोर्ट 2009 के अनुसार दानह में  वन एवं ट्री कवर करीब 48.47 प्रतिशत है, इसमें से 23.84 प्रतिशत क्षेत्रफल में वन्य जीव अभ्यारण भी शामिल है। अगर हम दादरा नगर हवेली की पूरी जनसंख्या की बात करें तो यहाँ की जनसँख्या 3,43,709 है, जो कि दानह प्रशासन के वेबसाइट पर भी दर्ज है। आंकड़ों के मुताबिक यहाँ की आधी से ज्यादा आबादी आदिवासियों की है तथा आंकड़ो के अनुसार आदिवासियों की जनसँख्या लगभग 60 प्रतिशत है बाकी की 40 प्रतिशत आबादी सामान्य लोगो की है। यहाँ के सांसद की सीट भी आदिवासियों के लिए सुरक्षित है। पाठकों की जानकारी के लिए बता दूँ कि 1967 से अब तक दानह में 6 सांसद हुए है। यहाँ के पहले आदिवासी समाज से सांसद सनजीभाई डेलकर थे, इसके बाद रामुभाई रावजी पटेल, रामजी पोटला महाला, सीताराम गवली को यहाँ का सांसद बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके बाद 1989 से 2004 तक मोहन डेलकर यहाँ के सांसद रहे। इसके पश्चात 2009 में नटू पटेल को सांसद बनने का  मौका मिला तथा वर्तमान सांसद भी नट्टू पटेल है।

फिलवक्त जो मामला सामने आया है वह दानह के वर्तमान सांसद नट्टू पटेल तथा पूर्व सांसद मोहन डेलकर दोनों के प्रमुख स्टॉफ ( निजी सचिव, निजी सहायक ) के संबंध में है। मामले के अंदर की चर्चा और सवाल यह है कि आखिर क्या कारण है जिसके चलते आदिवासी सीट से चुनाव जीतने के बाद भी, उक्त दोनों नेता, आदिवासियों को अपने स्टॉफ ( निजी सचिव, निजी सहायक जैसे मुख्य पदो पर जगह देना पसंद नहीं करते?

इस पूरे मामले में, पहले बात मोहन डेलकर की करते है। 1989 ,1991 ,1996 ,1998 ,1999 और 2004 में मोहन डेलकर सांसद रहे, मगर देखा गया कि उन्होंने अपने संसदीय और शासकीय कामकाज को संभालने के लिए गैर आदिवासियों को ही अपने स्टॉफ में मुख्य स्थान दिया। मोहन डेलकर का सारा काम गैर आदिवासी ही करते देखे गए, आफिस को  संभालने का काम जिसमे लोगो को मिलाने जुलाने का काम भी शामिल था, उसे मुकुंदन, नंदू तथा पंकज शर्मा देखता था। पंकज शर्मा एसएसआर कॉलेज में पीआरओ भी रहा। वर्तमान में भी मोहन डेलकर के संस्थान मेँ पंकज शर्मा और नंदू ही वतौर सहायक काम कर रहे है। शायद ही किसी ने मोहन डेलकर के प्रमुख स्टॉफ अथवा सचिव पद पर आदिवासी समाज से किसी प्रबुद्ध को देखा हो, अब ऐसा क्यो है और इसका कारण क्या है? इस बात की चर्चा और सवाल प्रदेश के कई प्रबुद्ध कर रहे है।

अब बात करते है नट्टू पटेल की। तो लोक सभा 2009 में नट्टू पटेल चुनाव जीते और दानह सांसद बने। वर्तमान सांसद नट्टू पटेल के यहाँ भी निजी स्टॉफ गैर आदिवासी ही बताया जाता है। उन्होंने अपना आधिकारिक सहायक अनिल शुक्ला को बनाया हैं, तथा शुक्ला ही सांसद का अधिकतर कामकाज देखता है। स्पष्ट तौर पर कहूं तो अनिल शुक्ला के अलावा, सांसद नटू पटेल ने जो भी निजी स्टॉफ लेखकीय कार्य के लिए रखा है वह गैर आदिवासी ही बताया जाता है।

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जनता की समस्याओ को जानना, समझना और उसे हल करना सांसद का फर्ज होता है क्योकि जनता ने उसे इसी चीज के लिए चुना है। जैसा कि सबको पता है कि सभी सांसद अपने पास एक या दो सहायक रखते है, ताकि उनके ऊपर काम का बोझ न पड़े। कामो का वर्गीकरण, सरलीकरण और अमलीकरण को याद दिलाने और कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए निजी सहायको की  जरुरत पड़ती ही है। कभी कभी ये निजी सहायक जिन्हे हम सचिव कह सकते है, ये सांसद के सलाहकार और मीडिया प्रवक्ता की भी भूमिका भी निभाते है। ये कितनी बड़ी जिम्मेदारी है तथा निजी सहायक एवं सचिव का गलत चुनाव, क्षेत्र के विकास तथा जनता के लिए कितना बाधक हो सकता है, ये आप खुद सोचिये!

अक्सर देखा गया है कि किसी भी सांसद से जब क्षेत्र की आम जनता अपनी समस्या लेकर मिलने  जाती है तो उसे एमपी हाऊस, कार्यालय में बैठे दर्जन भर चमचो से होकर गुजरना पड़ता है, उनके सवालो का जबाव देना पड़ता है। कई बार तो देखा जाता है कि सांसद के चमचे जो अपने आपको महत्वपूर्ण दिखाने के लिए सांसद से मिलने आई जनता से बे-मतलब के सवाल भी पूछते है, जनता से शहद लगा जवाब मिले तो ठीक, अन्यथा सांसद के कान भरना इनके बाए हाथ का खेल होता है! जबकि उनका कोई हक़ नहीं बनता कि वे सांसद और आम जनता के बीच बेरियर बने। मूड में रहे या आवेदक के जवाबो से संतुष्ट हो गए तो वे आवेदक को सांसद के निजी सहायक के पास भेज देते है और इसके बाद निजी सहायको का अच्छा  मूड हुआ तो ही वो आवेदक को सांसद के केबिन में भेजेंगे। अगर निजी सहायको को आवेदक की समस्या समझ में नही आई या आवेदक ने शहद लगाने में कंजूसी दिखाई तो फिर सांसद से मुलाक़ात भी आसान नहीं होती! ऐसे में फरियादी आवेदक, सांसद को अपनी समस्याएं बिना बताये ही बैरंग लौट जाने के लिए विवश हो जाता है। उसे एक ही काम के लिए कई चक्कर लगाने पड़ते है। अब बताइये ऐसे नालायक निजी सहायको को क्या कहे?

आदिवासी संस्कृति और भाषा से अनजान, निजी सहायक जनता के लिए सिरदर्द! 

पूर्व सांसद मोहन डेलकर और वर्तमान सांसद नटू पटेल दोनों के यहाँ अधिकतर निजी सहायक गैर आदिवासी ही देखने को मिले। शायद उन्हें आदिवासी युवको की योग्यता पर भरोसा ही नहीं है? सांसद और पूर्व सांसद दोनों यह भली-भांति जानते है की गैर आदिवासी समाज से नियुक्त, निजी  सहायक, आदिवासियों की संस्कृति, रहन सहन और उनकी भाषा नहीं समझते। ज्यादातर आदिवासी जनता बारली, धोडिया, कोकणी या मराठी बोलते है। कई आदिवासियो को तो हिंदी और गुजराती भी बराबर ढ़ंग से बोलनी नहीं आती। ऐसे में ये गैर आदिवासी सहायक / स्टॉफ़ आदिवासियों की समस्याओ को कैसे सुनते समझते होंगे? परिणाम ये होता है कि संस्कृति और भाषा से अनजान ये निजी सहायक उनकी समस्या समझ नहीं पाते तो वे आवेदको  को अंदर घुसने ही नहीं देते, जिस वजह से आवेदक को सांसद के केबिन के अंदर जाने के लिए बड़ी मशक्क्त करनी पड़ती है।

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क्या सांसदो को  आदिवासी युवको की योग्यता पर नहीं है भरोसा?  

1967 से अब तक दादरा नगर हवेली में  6 सांसद हुए है। लेकिन 1889 से अब तक किसी भी सांसद ने अपने निजी सहायक के तौर पर आदिवासी युवक पर भरोसा नहीं जताया है। दरअसल निजी सचिव / सहायक रखने की परम्परा मोहन डेलकर ने शुरू की। वे पहली बार दानह के सांसद 1989 में बने, वे 6 बार सांसद रहे मगर उन्होंने गैर आदिवासी को ही अपना निजी सहायक बनाया। घर में स्थित कार्यालय का सहायक नंदू, आर्थिक कामकाज के लिए पंकज शर्मा।

इसी परम्परा को वर्तमान सांसद ने आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने निजी सहायक के तौर पर अनिल शुक्ला को रखा है। बताया जाता है कि अनिल शुक्ला इससे पहले नटू पटेल का एकाउंटेंट था वो आज भी नटू के रीयल एस्टेट के कारोबार का हिसाब किताब रखता है। तो क्या 3,43,709 की आबादी वाले इस प्रदेश में ऐसा एक भी आदिवासी शिक्षित  युवक नहीं है जो इस जिम्मेदारी को संभाल सके? क्या सांसद को आदिवासी युवको की योग्यता पर भरोसा नहीं है? जब आदिवासी युवक डॉक्टर बन सकते है? पुलिस आफिसर बन सकते है? वकील बन सकते है? तो सांसद का निजी सचिव क्यों नहीं बन सकते? यह सवाल साधारण नहीं है यह सवाल है विचार का, वैसे इस सवाल के अलावे भी इस मामले से जुड़े कई और सवाल भी है जिनका जवाब जनता जानना चाहती है, किसी और अंक में उन सवालो पर बात बात करेंगे, फिलवक्त पुनः मुद्दे पर आते है।

निजी सहायको की संपत्ति कितनी बढ़ी, जनता तो अब इनकी जांच भी चाहती है! 

कुछ एक प्रबुद्ध तो यह तक कह रहे है कि सांसद के निजी सहायको की संपत्ति की भी जांच होनी चाहिए। उनकी कितनी सम्पत्ति दादरा नगर हवेली में है और कितनी अन्य राज्यो में? निजी सहायक बनने से पहले उनका बैंक बैलेंस तथा आर्थिक स्थिति क्या थी तथा आज आर्थिक स्थिति क्या है? पहले कितनी संपत्ति थी और आज कितनी है? यह सवाल क्यो किया जा रहा है यह तो आपके समझ में आ ही गया होगा और यदि नहीं आया तो आप समय निकाल कर पता लगाने में जुट जाए! क्यो की लोक तंत्र में जनता को मालिक बताया गया है और मालिक के सवाल से किनारा करना लोक तंत्र से किनारा करने के बराबर है!

आदिवासी युवको को भी निजी सहायक बनने का मिलना चाहिए मौक़ा 

इस मामले में दानह के कुछ प्रबुद्ध लोगो से बात की तो उन्होने अपने अंदाज में बताया कि, दानह के आदिवासी युवक को दानह सांसद के निजी सचिव बनने का मौका मिलना चाहिए। कम से कम एक आदिवासी युवक का तो जीवन सुधर जाएगा। अगर सांसद  के निजी सहायक बनने से गैर आदिवासी निजी सहायक / सचिव की आर्थिक स्थिति में सुधार आ सकता है तो दानह के सभी बेरोजगार आदिवासी युवको को एक एक माह के लिए बारी बारी से सांसद का निजी सहायक, सचिव बनने का अवसर देना चाहिए, वैसे यह मुमकिन है या नहीं यह तो वर्तमान सांसद नट्टू पटेल तथा पूर्व सांसद मोहन डेलकर ही जाने। शेष फिर