वफादारी से बड़ा भय होता है यह इस मामले को देखकर पता चलता है!

वफादारी से बड़ा भय होता है यह इस मामले को देखकर पता चलता है! | Kranti Bhaskar
Praful patel daman

संध प्रदेश दमन-दीव व दानह में जब से प्रशासक पद पर प्रफुल पटेल की नियुक्ति हुई है तब से लेकर अब तक इस प्रशासन के ऐसे कई निर्णय देखने को मिले जिन पर जनता का विरोध हुआ, जनता में यह सवाल है कि विरोध को शांत करने के लिए प्रशासन द्वारा विरोधियों के मुह पर भय का ऐसा कोनसा गोंद लगाया है जिसके बाद विरोधियों का मुह बंद हो गया? कुछ एक प्रबुद्धों का मानना है की जन प्रतिनिधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा जनता में प्रशासन के वीरुध उठने वाली आवाज को शांत करने के लिए प्रशासन ने शाम-दाम-दण्ड-भेद वाली नीति का प्रयोग किया है यह सही है या नहीं इसकी जांच की मांग भले ही करें लेकिन जैसे सेकड़ों मामलों में जांच की मांग के बाद भी जांच नहीं हुई तो फिर इसमे कैसे होगी यह भी जनता कहना है।

यह खबर शायद प्रशासन और प्रशासक प्रफुल पटेल को कड़वी लेगे, लेकिन प्रशासक प्रफुल पटेल पहले तो यह जान ले की क्रांति भास्कर को चाटुपत्रकारिता करना नहीं आता, उसके बाद यह भी जान ले की प्रशासन के लिए भी यही सही है की वह जनता के मन की बात और जनता में हो रही चर्चा उनही शब्दो में जाने जिन शब्दो में चर्चा हो रही है, और दमन-दीव दानह की प्रशासन, नेता और जतन सभी जानते है कि यह कुबत केवल क्रांति भास्कर में है।

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दोनों संध प्रदेशों में इस बात की भी चर्चा है की प्रशासन और प्रशासक प्रफुल पटेल के खिलाफ कुछ भी बोले तो कुछ भी हो सकता है, जबकि चर्चा यह होनी चाहिए की यदि कुछ गलत किया तो कुछ भी हो सकता है। लेकिन मामला बिलकुल उलट है जिनहोने गलत किया है वह मुह पर मानों भय के कारण गोंद लगाए बैठे है और बे-हिचक अपनी गलतिया जारी रखे है क्यो की वह प्रशासन की हा में हा मिलाने का काम कर रहे है इस लिए बचे है ऐसा अब जनता मानती है, क्यो की जनता को पता है की किसने पूर्व में कितनी गलतिया की है और किस पर प्रशासन कार्यवाही नहीं कर रही है।

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इतना ही नहीं प्रशासक प्रफुल पटेल भाजपा के नेता है और भाजपा के एक गुट में ही प्रशासक प्रफुल पटेल की नीतियों पर जम कर विरोध और चर्चा हो रही है लेकिन शायद उन तमाम चर्चाओं से प्रशासक प्रफुल पटेल अब तक अंजान है कारण शायद चाटुपत्रकारिता ही है जो जनता के साथ साथ प्रशासन के साथ भी धोखा कर रही है, प्रशासन इस वक्त तो चाटुपत्रकारिता से खुश हो रहा होगा, लेकिन आने वाले समय में सरकार के लिए और उन तमाम नेताओं के लिए यही चाटुपत्रकारिता कही उन्हे मुह की खाने को मजबूर ना कर दे यह तो प्रशासन के लिए सोचने का विषय है।

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इतना ही नहीं भाजपा हो या कांग्रेस या कोई अन्य किसी भी मामले में किसी भी पार्टी का नेता तभी तक सलामत बताया जा रहा है जब तक के उसके मुह पर भय का गोंद हो हा यह और बात है की बोलने की आजादी है लेकिन उसमे भी एक बड़ी राजनीति है की उतना ही बोलो की तुम्हारा काम भी चल सके और हमारा काम भी चल सके, अगर प्रशासन को नुकसान हुआ तो उसके नुकसान का बदला मुह खोने वाले के नुकसान से लिया जाएगा।

यदि प्रशासक प्रफुल पटेल को जनता में हो रही इस चर्चा पर विश्वास नहीं हो रहा है तो क्रांति भास्कर का सुझाव है की दमन-दीव व दानह में आई-बी मौजूद है और इस मामले की जानकारी हांसील करने में आई-बी माहिर है तो उनही से पता लगा लीजिए, हो सकता है आई-बी के अधिकारी क्रांति भास्कर की टीम से अधिक जानकारी ही ले आए!