माल बेचने की परमिसन नहीं है फिर भी माल बेच रही है, वेलनोन पोलिएस्टर लिमिटेड।

प्रदूषण नियंत्रण समिति के साथ साथ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक को कर रही है गुमराह।

संध प्रदेश दमन में स्थित वेलोनोन पोलिएस्टर लिमिटेड कंपनी द्वारा की गई अनियमितताओं को लेकर क्रांति भास्कर ने कई खुलासे किए, फिर वह चाहे फर्जी तरीके से गैस लाइन लेना हो, या चाहे पर्यावरण के नियमों को ताख पर रखना, लेकिन विडंबना यह रही की किसी भी खुलासे से अब तक क्रांति भास्कर न हीं सदस्य सचिव की आंखे खोल पाई न ही, प्रशासक आशीष कुन्द्रा की। जिसका एक कारण यह है की इस कंपनी के दो-बड़े आदमी दमन के बड़े बड़े अधिकारियों के साथ बैठते है, पहले तो इस कंपनी के मालिक अनिल गुप्ता जो, प्रशासक द्वारा गठित ओधोगिक सलाहकार समिति के सदस्य है, और दूसरे व्यक्ति इस कंपनी के वाइस प्रेसीडेंट जो दमन ओधोगिक संगठन के सचिव है। यह दोनों दमन की इकाइयों के नेतृत्व की जिम्मेवारी अपने कंधों पर लेकर अपनी ही कंपनी के द्वारा यह कैसा अनियमितता फैलाने का संदेश दे रहे है यह सोचने वाली बात है।

दमन कि और कितनी कंपनियां है जो पर्यावरण नियमों को अपनी जागीर समझती है, और दमन दीव प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव देबेन्द्र दलाई और कितनी बार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति की फटकार खाएगी?

अब बात करते है उस प्रोडेक्त की जिसकी बाजार में सबसे अधिक मांग है और जिसको बनाकर वेलनोन पोलिएस्टर लिमिडेट बाजार में बेच तो रहा है, लेकिन बेचने की परमिसन नहीं है। उस प्रॉडक्ट का नाम है पोएस्टर चिप्स, इस पोलिएस्टर चिप्स से ही यान बनाई जाती है। दमन-दीव व दानह में यह ऐसा प्रोडेक्ट है जिसके बिक्री की मंजूरी सरकार ने कुछ गिने-चुने उधोगों ही दी है, लेकिन इस प्रोडेक्ट को बाजार में बिक्री करने के लिए, प्रदूषण नियंत्रण समिति की मंजूरी इस कंपनी के पास नहीं है।

माल बनाया जा रहा है, माल बेचा भी जा रहा है, माल का बिल भी बन रहा है, लेकिन माल बेचने की परमिसन ही नहीं है! फिर भी माल बनाकर बाजार में बेच रही है, वेलनोन पोलिएस्टर लिमिटेड।

यह कंपनी इस प्रोडेक्ट को बाजार में बेच कर एक तरफ से प्रदूषण नियंत्रण समिति को गुमराह कर रही है, वहीं इस प्रोडेक्ट की इनवाइस व एक्साइज़ बिल को स्वीकार करके एक्साइज़ विभाग भी गुमराह हो रहा है, एक्साइज़ विभाग को तो पता ही नहीं है की यह chairmanकंपनी जिस प्रॉडक्ट को बेच रही है उसका बिल भी वह नहीं बना सकती है। लेकिन यह धंधा बेधड़क चल रहा है, क्यों कि कंपनी के दो बड़े कर्ता-धर्ता प्रशासन के बड़े बड़े अधिकारियों के साथ बैठते है, जिसके चलते प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव व कर्मचारी इस कंपनी पर कार्यवाई करने से परहेज करते है।

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इस कंपनी द्वारा इस प्रॉडक्ट को बाजार में बेचने का मामला केवल, पर्यावरण नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि कंपनी इस प्रॉडक्ट का उत्पादन बढ़ाकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भी गुमराह कर रही है। और ना जाने इस मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति, तथा वन एवं पर्यावरण मंत्रालय कब संज्ञान लेगी? लेकिन इस कंपनी पर संज्ञान जब भी होगा तब इस कंपनी के लिए एक ना ख़त्म होने वाले संकट से कम नहीं होगा।

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