रॉयल और खेमानी डिस्टलरी को लेकर, सदस्य सचिव का सबसे बड़ा खुलासा।

Khemani
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दमन के पर्यावरण को लेकर एक अहम खुलासा। दमन की सबसे बड़ी कंपनियों के पास पांच वर्षों से एन-ओ-सी ही नहीं है। दमन में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों के पास पांच वर्षों से उत्पादन की मंजूरी नहीं। पांच वर्षों से शराब बानने की अनुमति नहीं, फिर भी उत्पादन जोरों से। सदस्य सचिव के इस खुलासे के बाद, चेयरमेन और प्रशासक कुन्द्रा की बढ़ सकती है मुश्किले।

दमन-दीव व दानह प्रदूषण नियंत्रण समिति के सदस्य सचिव श्री दलाई से क्रांति भास्कर के संपादक को बताया की दमन में स्थित केमानी डिस्टलरी एवं रौयल डिस्टलरी दोनों के पास पिछले पांच वर्षों से नवीनीकरण सहमति (renewal consent) नहीं है इसके उपरांत भी दोनों इकाइयाँ बड़े धड्ड्ले से शराब का उत्पादन कर रही है। सदस्य सचिव ने बताया की पांच वर्ष पूर्व 2010 में उक्त दोनों इकाइयों का  (PCC consent) ख़त्म हो चुका है इसके बाद उक्त दोनों इकाइयों को अभी तक पीसीसी से कोई consent नहीं दिया गया है इसके उपरांत उक्त दोनों इकाइयां अपना उत्पादन जारी रखे है।

जब इस मामले की गंभीरता जानने के बाद सदस्य सचिव से पूछा की आखिर क्या कारण है की इन दोनों इकाइयों का consent पिछले पांच वर्षों से रोक के रखा है तो सदस्य सचिव ने क्रांति भास्कर को गुमराह करने की कोशिस की, सदस्य सचिव ने इस मामले में बताया की दोनों इकाइयों का consent सीपीसीबी के कारण अटका है, इस मामले में आगे की जानकारी देने से सदस्य सचिव ने माना कर दिया।

लेकिन जब पर्यावरण की बात और अनियमिताओं की बात आई तो क्रांति भास्कर का सवाल यह था की क्या दोनों इकाइयों के उत्पादन एवं consent से संबंधित जानकारी क्या प्रशासक आशिस कुन्द्रा को है, क्या पीसीसी के चेयरमेन को इस मामले की जानकारी है, तो सदस्य सचिव ने कहां दोनों इकाइयों के consent की पूरी जानकारी प्रशासक आशिस कुन्द्रा और पीसीसी के चेयरमेन को है, सदस्य सचिव के इस बयान और जवाब ने और कई सवाल खड़े कर दिए।

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जब प्रशासक को दोनों इकाइयों के  consent की पूरी जानकारी है और दोनों इकाइयों को 2010 से पीसीसी का consent प्राप्त नहीं है तो उसके उपरांत इस मामले में प्रशासक ने कोई कार्यवाई क्यों नहीं की? तथा चेयरमेन ने इकाइयों पर संज्ञान लेते हुए क्लोज़र नोटिस जारी क्यों नहीं किया?

हालांकि इस के अतिरिक्त कुछ दस्तावेज क्रांति भास्कर के हाथ लगे है जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं दमन प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा खेमानी और रॉयल डिस्टलरी से जुड़े है, तथा इन दस्तावेजों को देखकर लगता है इस मामले में अभी भी कई गोलमाल है। बताया यह भी जाता है तत्कालीन सदस्य सचिव पलनीकांत ने रॉयल और खेमानी डिस्टलरी को क्लोज़र नोटिस जारी करने का प्रस्ताव रखा था,लेकिन उस मामले को अभी तक दबा कर रखा गया,नहीं दोनों पर कोई संज्ञान लिया गया नहीं दोनों को क्लोज़र नोटिस जारी किया गया। प्राप्त दस्तावेजों को देखकर एक मामला और सामने आया है,दस्तावेजों को देख कर लगता है की 2010 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के दिशा-निर्देशों के अनुसार यदि इन दोनों इकाइयों का पीसीसी consent नहीं दिया जा सकता जिसके चलते केवल फाइल को इधर से उधर करने का काम किया जा रहा है,यदि पीसीसी ने इन दोनों इकाइयों को consent दे दिया तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के माप दण्डों पर यह इकाई खरी नहीं उतरती है। जिसके चलते नहीं इकाई को क्लोज़र नोटिस दिया जा रहा है नहीं पीसीसी consent दे रही है।

हालांकि क्रांति भास्कर की इस मामले में खोजबीन अभी जारी है,तथा दस्तवाजों के आधार पर अभी और कई मामले एसे है जिनकी खोज-परख की आवश्यकता है जल्द क्रांति भास्कर इस मामले से जुड़े अन्य खुलासे करेगी।

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ज्ञात हो की यह दोनों वहीं इकाई है जिस के टेक्स चोरी मामले ने पूरे दमन में खलबली मचा दी थी, हालांकि मामला अभी भी जांचाधीन बताया जाता है, लेकिन जिस इकाई पर सीबीआई की इतनी बड़ी जांच चल रही हो उस इकाई से संबंधित मामलों में प्रशासक आशिस कुन्द्रा की इतनी बड़ी ढील चोकाने वाली बात है,सीबीआई को भी अपनी जांच में यह मामला शामिल करने की जरूरत है की आखिर किन कारणों से दोनों इकाइयों के consent को पांच वर्षों से रोके रखा है और क्यों दोनों इकाइयों को क्लोज़र नहीं दिया जा रहा है। 

जहां बढ़ते प्रदूषण से दमन-दीव की आम जनता परेशान देखी गई, समुन्द्र में प्रदूषित जल से मछुवारे परेशान देखे गए, वहाँ प्रशासन की यह घोर निंद्रा का जीता जागता सबूत है खेमानी और रॉयल डिस्टलरीयों की लंबित फाइले। वैसे तो प्रशसक महोदय उधोग के हितों में कई दावे करते है बेहतर सुविधाएं देने की बाते करते है, लेकिन सालों से लंबित फाइलों पर नहीं जवाब मांगा जाता है नहीं कोई संज्ञान लिया जाता है, जिसका कारण रसुखदारी ही कहां जा सकता है।

अब देखने वाली बात यह है की 2010 से अब तक बिना consentदोनों कंपनियों का उत्पादन जारी रखने व दोनों इकाइयों को क्लोज़र नोटिस नहीं देने के अवज में प्रशासन के संबंधित अधिकारी की दोनों इकाइयों के मालिक के साथ क्या खिचड़ी पकती रही? क्यों की संध प्रदेश प्रशासन वैसे तो मेहरबान होती नहीं तो इन दोनों इकाइयों पर मेहरबानी का कारण क्या रहा होगा? क्या दमन पीसीसी के सदस्य सचिव ने दोनों इकाइयों को बिना consentउत्पादन जारी रखने के लिए जो छूट दी है उसके अवज में कोई डील की है और क्या इस डील में पीसीसी के चेयरमेन व प्रशासक कुन्द्रा भी शामिल है? जल्द इन इनसुलझे सवालों के साथ एक नया खुलासा करेगी क्रांति भास्कर।

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सूत्रों का कहना है कि, पूर्व में दमन पीसीसी द्वारा खेमानी तथा रॉयल डिस्टलरी को 2500mg प्रति लिटर बी-ओ-डी छोड़ने का आदेश जारी किया था, इसके बाद उक्त आदेश पर आपत्ति जताते हुए, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति ने दमन प्रदूषण नियंत्रण समिति को नोटिस/दिशा निर्देश जारी कर कहां की खेमानी और रॉयल डिस्टलरी को 30mg प्रति लिटर बी-ओ-डी ही छोड़ सकती है, तथा दोनों डिस्टलरीयों को 30एमजी प्रतिलिटर छोड़ने के दिशा निर्देश जारी करने को कहां गया।

अब गड़बड़ झाला यह है की यदि इन दोनों डिस्टलरीयों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण समिति के दिशा निर्देश अनुसार 30mg प्रति लीटर छोड़ने का आदेश दे दिया गया तो उक्त आदेश का पालन दोनों इकाइयां नहीं कर पाएगी, तथा नए पीसीसी कनसन में दमन पीसीसी को सीपीसीबी के दिशानिर्देश अनुसार 30mg प्रतिलिटर छोड़ने का आदेश देना पड़ेगा, तो इसके चलते नहीं इन दोनों इकाइयों को नया कनसन दिया जा रहा है, नहीं क्लोज़र, जबकि सीपीसीबी ने साफ कह दिया था की यदि यह दोनों इकाइ30mg प्रतिलिटर बी-ओ-डी से अधिक छोड़ रही है तो दोनों इकाइयों को क्लोज़र जारी करना होगा, लेकिन दमन पीसीसी के अधिकारी तमाम नियमों की अवहेलना कर नियम कानून का मज़ाक बना, खेमानी और रॉयल डिस्टलरी को बचाने का काम कर रहे है, जबकि बताया जातया जाता है कि दोनों इकाइयां 2500mg प्रति लीटर बी-ओ-डी छोड़ रही है जिसकी वजह से समुन्द्र का पानी और जीव दोनों खतरे में है।