सफ़ाई अभियान की तरह भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान क्यो नहीं?

जब कभी भ्रष्टाचार की बात आती है तो सबसे पहले हमारे सामने किसी पुलिस अधिकारी का चेहरा आता है आम तौर पर जनता सबसे अधिक भ्रष्ट, पुलिस को मानती है ऐसा इस लिए क्यो की जनता का सबसे अधिक सामना पुलिस से होता है लेकिन जो यह मानते है कि सबसे अधिक भ्रष्ट पुलिस है उन्हे शायद सभी सरकारी विभागो की जानकारी नहीं। वैसे किस सरकारी विभाग में भ्रष्टाचार अधिक है ओर किसमे कम चर्चा का विषय यह नहीं चर्चा का विषय तो यह है कि भ्रष्टाचार है ही क्यो भ्रष्टाचार खत्म क्यो नही होता, सफाई अभियान की तर्ज पर सरकार भ्रष्टाचार मिटाओ अभियान क्यो नहीं चलती?

दरअसल किसी भी समाज में भ्रष्टाचार उस दीमक की तरह है जो भीतर ही भीतर खमोशी से उसकी जड़ों को खोखला कर देता है और अगर जड़ ही खोखली हो जाएं तो समाज किसके सहारे खड़ा होगा! इस दीमक से हमारे देश की जड़ें भी खोखली हो रही हैं। पुलिस, प्रशासन, राजनीति कुछ भी इससे अछूता नहीं है। सरकारी विभागों में मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने तक के लिए रिश्वत देनी पड़ती है तो सार्वजनिक हित के लिए बनने वाली योजनाओं पर नेताओं और अधिकारियों की नजर होती है। सैकड़ों में गिने जाने वाले घोटाले अब करोड़ों और अरबों में तब्दील हो गए हैं। जनता की गाढ़ी कमाई का जो पैसा देश के विकास पर खर्च होना चाहिए, वह नेताओं और अधिकारियों के लॉकरों में पहुंच जाता है। नजरिया बदल चुका है, किसी हद तक हम भ्रष्टाचार को स्वीकार भी कर चुके हैं। बहुत से उदाहरणों में गड़बड़ियों को हम यह कह कर टाल देते हैं कि इतना तो चलता ही है। हम अपनी सहूलियत के हिसाब से भ्रष्टाचार के मानक तय कर लेते हैं, अपने आराम के लिए इसे बढ़ावा भी देते हैं। बात जब बड़े स्तर की होती है तो बड़ी योजनाओं में शामिल लोग अपने स्तर पर यही करते हैं और मौकापरस्त बन जाते हैं।

भारत में सालाना 6,350 करोड़ की रिश्वत का लेन-देन

हाल ही में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में सालाना 6,350 करोड़ रुपए की रिश्वत का लेन-देन होता है। 6350 करोड़ का आंकड़ा छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है इस रकम के ब्याज़ से करोड़ों लोग दो वक़्त की रोटी पा सकते है करोड़ों लोगो को गरीबी से सदेव के लिए मुक्ति मिल सकती है, यह रकम यदि जनता में बांटी जाए तो प्रतिवर्ष 6,350 लोग करोड़पति बन जाए। वैसे ये आंकड़े 2005 से कम हैं। तब सालाना 20,500 करोड़ रुपए की रिश्वत का लेन-देन होता था। रिपोर्ट के मुताबिक मध्य भारत के राज्यों के मुकाबले दक्षिणी राज्यों में भ्रष्टाचार ज्यादा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ओर से जारी किए गए भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत की रैंकिंग गिरी है। पिछले साल के मुकाबले तीन स्थान खिसक कर भारत 79वें नंबर पर आ गया है। अब हमारे समाज को और न्याय व्यवस्था को कुछ बड़े उदाहरण पेश करने होंगे। लोगों के भीतर एक डर भी बैठाना होगा, भ्रष्टाचार के परिणाम का। हालांकि कुछ मामलों में प्रशासन और न्याय व्यवस्था ने मिसाल भी पेश की है लेकिन काम सिर्फ मिसाल से नहीं चलने वाला। बुराई की एक-एक शाखा को ढूंढ़-ढूंढ़ कर खत्म करना होगा।

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