पार्किंग के नाम पर वसूली, 1180 परिवारों के साथ ठगी का मामला!

Pramukh Aura
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हर इंसान का सपना होता है कि उसका भी एक घर हो, पर इस महंगाई के युग में यह संभव नहीं है कि कोई मध्यमवर्गीय आदमी अपना घर आसानी से खरीद सके। वह जैसे तैसे पाई पाई जोड़कर, रिशतेदारों से उधार लेकर, बेंकों से क़र्ज़ा लेकर, अपना घर खरीदता है। लेकिन इस प्रक्रिया में भी उसे वर्षो लग जाते है। सही मायने में एक घर बनाने में इंसान की जीवनभर की पूंजी ख़त्म हो जाती है दूसरी और बिल्डर बिना कुछ किए धरे, करोड़ों कमा लेते है, यह विडम्बना नहीं है तो क्या है।

  • एक घर खरीदने के लिए आम आदमी अपनी सारी पूंजी लूटा देता है वही उसी घर को बेचकर बिल्डर पूंजीपति बन जाता है, अजब-गज़ब कारोबार!

एक तरफ़ सरकार कहती है सभी को अपना घर मिलेगा और सस्ता मिलेगा, इसके लिए सरकार कई तरह के प्लान भी बनाती है दूसरी तरफ़ सरकार घर बनाने वाले बिल्डरों पर कोई लगाम नहीं कसती, जिससे घरों के दाम आसमान छूने लगे है और लोगों का घर खरीदना अब ओर कठिन हो गया है। कोई भी लुटना नहीं चाहता, मगर बिल्डरों से घर ख़रीदना लोगो की मजबूरी हो गई है, देश में गरीबी की दर ज़्यादा है बेरोजगारी की दर ज्यादा है, आम लोगो के पास में पैसे नहीं है कि वह अपनी जमीन ख़रीदकर घर बना सके, कम पूंजी की वजह से इन लोगो के सपने अधूरे रह जाते है जिसका फायदा बिल्डर लोग उठाते है। उनके पास करोड़ों की फालतू पूंजी होती है वे पूंजी लगाते है और घर बेचकर गरीबों कि सारे जीवन की पूंजी लूट लेते है, और कमाल की बात तो यह है कि जो घर खरीदने के लिए टैक्स और दस्तावेजों की फीस लगती है उसे भी गरीबों को ही चुकाना पड़ता है जबकि बिल्डर जो काली कमाई करता है उसका टैक्स उसे नहीं भरना पड़ता है, दरअसल बिल्डर जो काली कमाई करता है उसका पता तो सरकार को भी नहीं होता, जबकि बिल्डर ग्राहकों से अवैध तरीकों से करोड़ों वसूल चुका होता है।  

  • जमीन किस से ख़रीदी गई, कितने में ख़रीदी गई, जमीन खरीद में कितने करोड़ ब्लेक में दिए गए, जमीन एन-ए कैसे हुई, कितने नियमों की अनदेखी हुई? ऐसे कई सवालों का जवाब अब भी बाकी।
  • प्रमुख गार्डन्स, प्रमुख नक्षत्र, प्रमुख संगम, योगीमीलन, जैसे कई प्रोजेक्टो के प्रमुख घोटालो से पर्दा उठना अब भी बाकी। 

वैसे किसी और अंक में हम पाठको को यह समझाने की कोसिश भी करेंगे की यह गोरख धंधा कैसे होता है। फिलवक्त पुनः मुद्दे पर आते है और वापी मुक्तनन्द मार्ग पर स्थित प्रमुख ग्रुप के दो प्रोजेक्ट प्रमुख सहज़ और प्रमुख ओरा में हो रहे गड़बड़ घोटाले पर बात करते है। प्रमुख सहज़ 700 फ्लेट और प्रमुख औरा 480 फ्लेट का प्रोजेक्ट है। इन दो प्रोजेक्टो को मिलाकर कुल 1180 फ्लेट होते है। जिस प्रोजेक्ट में 700 फ्लेट है उसमे बिल्डर प्रति फ्लेट लगभग 3 लाख रुपये ब्लेक में (नगद) ले रहा है, इसी तर्ज पर दूसरे प्रोजेक्ट जिसमे 480 फ्लेट है उसमे भी बिल्डर प्रति फ्लेट लगभग 3 लाख रुपये ब्लेक में (नगद) ले रहा है, इसके अलावे दोनों प्रोजेक्टों के कुल 1180 ख़रीदारों से बिल्डर प्रति फ्लेट 50 हजार से 1 लाख रुपये पार्किंग बिक्री के लिए ब्लेक मनी ले रहा है। इस हिसाब से दो प्रोजेक्टों में बिल्डर क़रीबन 50 करोड़ का काला धन वसूल रहा है। यदि अब इन्ही आंकड़ों को आधार मानकर, अंदाज लगाया जाए कि इस हिसाब से इस बिल्डर ने अपने पिछले प्रोजेक्टों में कितना काला-धन वसूला होगा तो इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल बात नहीं है।

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कही ऐसा तो नहीं है की आयकर अधिकारियों को गिफ्ट के तौर पर फ्लेट दे दिए हो?

आयकर विभाग के अधिकारियों को इस काले लेन-देन की भनक भी नहीं यह कमाल की बात है। इस बिल्डर के प्रोजेक्टों में हो रही काले-धन की लेन-देन को देखते हुए, अब यह सवाल भी उठता है कि कही ऐसा तो नहीं है की आयकर अधिकारियों अथवा आयकर अधिकारियों के परिवार के सदस्यों को गिफ्ट के तौर पर फ्लेट दे दिए हो? जिसकी वजह से उक्त बिल्डर के तमाम प्रोजेक्टों में हो रही काला-बाजारी पर अधिकारी आँख मूँदे बैठे है? इस सवाल का जवाब तो जांच के बाद ही मिल सकता है। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो आयकर अधिकारियों ने अब तक इसकी जांच क्यो नहीं कराई, इस मामले में बिल्डर ही नहीं 1180 फ्लेट खरीदार भी दोषी दिखाई पड़ते है जिनहोने बिल्डर को ब्लेक की राशि यानि नगद रकम दी है। यह 50 करोड़ की राशि देश की अर्थ व्यवस्था की मुख्य धारा में नहीं जुड़ेगी क्यो की बिल्डरों ने तो यह राशि तिजोरियों में रखी है। अब इस मुद्रा अवमूल्यन का जवाब कौन देगा? आयकर विभाग के अधिकारियों को अपनी ईमानदारी साबित करना है तो बिल्डरों के साथ साथ 1180 ख़रीदारों पर भी जांच बिठानी चाहिए, ताकि शहर के दूसरे बिल्डरों के ग्राहक भी बिल्डरों को काला धन देने के गुनाह से बच सके और यह राशि देश की अर्थ व्यवस्था की मुख्य धारा में आ सके, ताकि फ्लेट की क़ीमत भी उचित दर पर आ जाए।

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आयकर अधिकारियों को यह कार्यवाही करने के लिए अलग से कार्यालय खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी उनको 1180 (मुर्गे) एक ही छत के नीचे मिल जाएंगे, अब चाहे तो आयकर विभाग के अधिकारी इनकी बिरियानी बनाकर खाए या फिर आँख बंद कर अपने अपने हिस्सा का अंडा उन मासूम (मुर्गियों) से ले ले जिनहे पहले ही लूटा जा चुका है।

सवाल यह है कि जब यह बिल्डर आयकर विभाग को चुना लगा सकता है तो आम आदमी की क्या बिसात है बिल्डर ने 1180 परिवारों को कितना चुना लगाने वाला है इसकी सघन जांच होनी चाहिए, इस बात कि भी जांच होनी चाहिए कि इन इमारतों का निर्माण नियमों के तहत हुआ या इन इमारतों को नियमों को ताख पर रखकर बनाया गया? इसका निर्माण सरकार द्वारा पास किए गए प्लान के अनुसार हुआ या निर्माण में भी बिल्डर ने नियमो को ताख पर रखकर घटिया सामाग्री का उपयोग किया, अब इसका पता कैसे चलेगा?

  • निर्माण नियमों का पालन हुआ या नहीं, क्वालिटी टेस्ट कि रिपोर्ट किसी फ्लेट के खरीददार ने देखी या नहीं, किस बिल्डिंग का क्या सर्वे नंबर, किसी प्रोजेक्ट के बाहर इसकी कोई जानकारी क्यो नहीं, क्या जमीन में भी किया गया है कोई बड़ा घोटाला?
  • फोन पर किसी ग्राहक को फ्लेट के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती, फ्लेट की कीमत नहीं बताई जाती, बिल्डर को डर है ग्राहक उसकी काली करतूतें रिकार्ड ना कर ले, अब ऐसे बिल्डरों को साहूकार कहना तो साहूकार शब्द को शर्मशार करना होगा।

इस पूरे मामले में 1180 परिवार का जनहित ध्यान में रखते हुए यदि वलडास जिला समाहर्ता ( इस बिल्डिंग में उन्हे फ्लेट गिफ्ट में ना मिला हो तो ) स्वय आकर इस पूरे प्रोजेक्ट के साथ-साथ इस बिल्डर द्वारा बनाए गए तमाम प्रोजेक्टो की बारीकी से जांच करे, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।

  • 3 लाख ब्लेक में नगद, 1 लाख पार्किंग के लिए ब्लेक में नगद, स्टेम्प ड्यूटी, जीएसटी, मेंटेनेंस, के अलावे, नाम ट्रांसफर के लिए नही फ्लेट की कीमत का 1 फ़ीसदी वसूल रहा है बिल्डर।
  • फ्लेट की खरीद बिक्री के बाद, नाम ट्रांसफर करना, सरकार का काम में उसके लिए फ्लेट की क़ीमत का 1 फ़ीसदी वसूलना भी बिल्डर का एक बड़ा घोटाला है।
  • पार्किंग की जमीन बेची नहीं जा सकती, बिल्डर इसी लिए फ्लेट का कार्पेट एरिया कम देता है जिसे बिल्डर सुपरबिलड़प कहता है, ऐसे में पार्किंग बेचना भी एक बड़ा घोटाला है।