दानह भाजपा नेता फतेसिंह चौहान का प्रशासक प्रफुल पटेल को करारा जवाब!

दानह भाजपा नेता फतेसिंह चौहान का प्रशासक प्रफुल पटेल को करारा जवाब! | Kranti Bhaskar
fateh singh chauhan

सिलवासा। दिनांक 04-01-2018 को दानह भाजपा नेता फतेसिंह चौहान की तरफ से एक प्रेस नोट जारी कर बताया कि, जमीनी मामले में धोखाधडी, ऐट्रोसीटी सहित अन्य मामलों में दानह के भाजपा नेता फतेसिंह चोहान पर जो एफआईआर दर्ज की गई थी वह प्रशासन की शाजिश का हिस्सा थी इतना ही नहीं इस प्रेस नोट में भाजपा नेता फतेसिंह चोहान ने भाजपा शाषित प्रशासन एवं प्रशासक प्रफुल पटेल पर जाम कर आरोपों की बरसात की, भाजपा शाषित इस लिए क्यो की दानह में भाजपा के ही सांसद है और भाजपा के नेता को ही प्रशासक के पद पर नियुक्त किया गया है ऐसे में इसे भाजपा शाषित प्रदेश या भाजपा शाषित प्रशासन कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 

वही जब इस पूरे मामले में सीधे-सीधे आरोप प्रशासन पर लग रहे है तो फिर इस प्रशासन के मुख्या होने के नाते प्रशासक प्रफुल पटेल भला कैसे इस मामले से अनभिज्ञ रह सकते है यदि प्रशासन पर आरोप लगेंगे तो जवाब तो इस प्रशासन का मुख्या होने के नाते प्रशासक प्रफुल पटेल को ही देना होगा।

  • दानह प्रशासन द्वारा मुंबई उच्च न्यायालय के जजमेंट के खिलाफ एक्ट्रोसिटी मामलें में दानह के नेता फतेहसिंह चौहाण की अग्रीम जमानत रद्द करने की अपील, भारत की सर्वोच्च न्यायालय में हुई खारिज।
  • हम हमेशा जनता की समस्याओं और प्रशासन में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लडते रहेंगेः फतेहसिंह चौहाण।
  • भारतीय लोकतंत्र में गलत कार्यों के लिए आवाज उठाना हर नागरिक का कर्तव्य है उसे कोई दबा नही सकताः फतेहसिंह चौहाण।
  • जनहितैषी मुद्दो से कोई समझौता नहीं करेंगे, नाही प्रशासन की धमकियों से डरेंगे: फतेहसिंह चौहाण।

खेर अब जरा दानह भाजपा नेता फतेसिंह चोहान का इस पूरे मामले में कहना है यह भी पढ़ लीजिए। फतेसिंह चोहान का कहना है कि, दादरा नगर हवेली प्रशासनिक महकमे में फैले भ्रष्टाचार एवं दानह के जिन सरकारी ईमारतों एवं विद्यालयों के एन-ए, कंस्ट्रक्सन परमिशन, आक्युपेंसी, फायर एनओसी एवं इमरजेंसी परमिशन नही है उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से अवैध घोषित करते हुए उन पर कानूनी कार्यवाही करने के लिए फतेहसिंह चौहाण ने प्रशासन को एक ज्ञापन दिया था।

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जिसके बाद दानह प्रशासन अपनी गलती छुपाने के लिए फरियादी को ही आरोपी बनाने पर तुल गई और फतेहसिंह चौहाण की आवाज को दबाने का प्रयत्न करने लगी, प्रशासन ने दादरा नगर हवेली के भाजपा नेता फतेहसिंह चौहाण को फंसाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनायें। यहां तक की उनकी वैध पापर्टी को अवैध घोषित करने के लिए भी काफी प्रयास किया, लेकिन कहते हैं कि सांच को आंच नही आती। काफी जद्दोजहद के बाद भी जब प्रशासन के हाथ कुछ ठोस सबूत नही लगा तो दानह प्रशासन ने अपने ही अधिकारी द्वारा फतेहसिंह चौहाण के दामन में दाग लगाने की कोशिस की और उन्हें बदनाम करने के नियति से उन पर एक जमीनी मामले में धोखाधडी, ऐट्रोसीटी सहित अन्य मामलों में एफआईआर दर्ज करा दिया। जिसके खिलाफ फतेहसिंह चौहाण ने मुंबई उच्च न्यायालय में जमानत याचिका दायर की और आखिरकार उन्हें अग्रीम जमानत मिल गयी।

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अपने मंशूबे में कामयाबी नही मिलने से तिलमिलाई दानह प्रशासन ने १२ दिसंबर को भारत की सर्वोच्च न्यायालय में अपील दाखिल करने के लिए २ स्पेशल लीव पिटीशन दर्ज करवाई जो की अपने आप में एक ऐतिहासिक घटना है, जिसमें उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय के निर्णय के खिलाफ ऐट्रोसीटी मामलें में फतेहसिंह चौहाण की अग्रीम जमानत रद्द करने की बात कही।

इस मामले की सुनवाई गुरूवार, ०४ जनवरी, २०१८ को दिल्ली स्थित भारत की सर्वोच्च न्यायालय (सुपीम कोर्ट) में माननीय न्यायाधीश ए.के. सीकरी और माननीय न्यायाधीश अशोक भूषण की बेंच के समक्ष हुई। जिसमें दानह प्रशासन की ओर से भारत के महाअधिवक्ता (अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया) के.के. वेणुगोपाल और फतेहसिंह चौहाण के मामले की सुनवाई वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम, सिद्धार्थ लूथरा एवं शिवाजी जादव ने शूरू की।

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दोनो पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंची की संबंधित मामले में मुंबई उच्च न्यायालय ने जो भी निर्णय लिया है वह बिल्कुल सही है। तदोपरांत सर्वोच्च न्यायालय ने दानह प्रशासन की दोनों स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज करते हुए फतेहसिंह चौहाण की अग्रीम जमानत जारी रखी।

उल्लेखनीय है कि ऐसे मामलों में जहां अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के अत्याचार अधिनियम के तहत आरोप लागू किए जाते हैं, वहां धारा १८ के तहत एक बार है जिसके तहत अग्रिम जमानत के लिए आवेदन स्वीकार्य नहीं किया जाता है, जब तक कि न्यायालय संतुष्ट न हो कि अत्याचार अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं है।

फतेहसिंह चौहाण के मामलें में मुंबई उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला था कि प्रथम दृष्टया अत्याचार अधिनियम के प्रावधान लागू नहीं हैं और इसलिए धारा १८ के तहत बार लागू नहीं होता है। इसलिए अग्रिम जमानत दी जा सकती है। अतः सर्वोच्च न्यायालय ने मुंबई उच्च न्यायालय के इस आदेश को बरकरार रखा।

ज्ञात हो कि प्रशासन द्वारा जनसमस्याओं की अनदेखी और बिना एनओसी परमीशन की बनी सरकारी इमारतों एवं स्कूलों को सुरक्षा की दृष्टि से अवैध घोषित करने के लिए फतेहसिंह चौहाण ने दानह प्रशासन को ज्ञापन दिया था। जिसके बाद प्रशासन ने जनता की समस्याओं को निपटाने के बदले, समस्याओं के खिलाफ आवाज उठाने वाले फतेहसिंह चौहाण के आवाज को ही दबाने का प्रयास करने लगी।

बदले की भावना से ग्रस्त प्रशासन ने फतेहसिंह चौहाण को दबाने एवं परेशान करने के लिए षडयंत्र रचना शुरू कर दिया। काफी प्रयत्न के बाद जब कुछ ठोस मुद्दा हाथ नही लगा तो दानह प्रशासन के इशारे पर फतेहसिंह चौहाण के खिलाफ झूठे केस बना कर उन्हें फंसाने की कोशिस की गई। आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी व्यक्ति को जनसमस्याओं और प्रशासनिक महकमे में फैले भ्रष्टाचार को उजागर करने पर इतना परेशान किया गया हो कि दानह प्रशासन को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पडा। कानून को सर्वोपरी मानने वाले फतेहसिंह चौहाण ने सत्य की बदौलत आज एक बार पुनः दानह प्रशासन को एहसास दिला दिया की सत्य परेशान हो सकता है लेकिन पराजित नहीं।

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इस पूरे मामले को देखने के बाद अब कई ऐसे सवाल फन उठाए खड़े है जिनका जवाब जानने की उत्सुकता शायद फतेसिंह चोहान से अधिक दानह की गरीब जनता को हो। क्यो की दानह में फतेसिंह चोहान के नाम और संपत्ति से तो सभी वाकिफ है फतेसिंह चोहान के लिए हाईकोर्ट एवं सुप्रीम कोर्ट में वकील रखना कोई कठिन कार्य नहीं, लेकीन यदि प्रशासन वास्तव में अपने अधिकारो का दुरुपयोग कर किसी को भी झुटे मामलों में फंसा सकती है जैसा की फतेसिंह चोहान ने अपनी प्रेस नोट में कहा है तो फिर उन गरीबों को न्याय मिलने की क्या उम्मीद की जाए जिनके पास प्रशासन द्वारा की गई शाजिश के वीरुध, हाई कोर्ट जाने का किराया तक नहीं होता, ऐसे में अब हाईकोर्ट में एवं सुप्रीम कोर्ट में जाकर न्याय एवं अपने हक के लिए महंगे महंगे वकील रखना तो दूर की बात है। इस मामले में न्याय पालिका एवं सरकार को एक गरीब की नजर से सोचने की आवश्यकता है, क्यो की न्याय सभी किए एक समान है न्याय पालिका न्याय देने से पहले किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व या रुतबा नहीं देखता, न्याय पाने का हकदार जितना एक समृद्ध व्यक्ति है उतना ही हक दिन एवं गरीब को भी है।

लेकिन न्याय के लिए न्यायालय जाना आनिवार्य है और न्यायालय जाने के लिए धन की आवश्यकता है दानह की गरीब आदिवासी जनता ना ही फतेसिंह चोहान जितनी धनी है ना ही अनुभवी फिर उस गरीब जनता के साथ यदि इस प्रशासन ने अन्याय किया तो उसे न्याय पालिका से न्याय कैसे मिलेगा यह अब न्यायपालिका को ही सोचना चाहिए।