वापी के अधिकांश अस्पतालो द्वारा सरेआम नियमों का उल्लंघन।

Hospital Vapi
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वापी में निजी क्षेत्र के करीबन छोटे-बडे नर्सिंग होम, क्लीनिक और अस्पतालों की संख्या करीबन 350 के आसपास बताई जाती है। इन अस्पतालों में सरकारी सीएचसी सामुदायिक स्वास्थ केंद्र और पीएचसी प्राथमिक स्वास्थ केंद्र भी शामिल है। इन सभी अस्पतालों में रोजाना हजारों लोग अपना इलाज कराते हैं। एक आंकडे के मुताबिक जितने लोग अस्पताल में इलाज करातें हैं, उस अनुपात में बायो मेडिकल कचरा भी निकलता है। अगर भारत सरकार के स्वास्थ मंत्रालय की बात मानें तो उसके अनुसार अस्पताल में भर्ती हुए प्रत्येक रोगी से प्रतिदिन 1 किलो 200 ग्राम और हर क्लीनिक से 100 ग्राम मेडिकल वेस्ट या मेडिकल कचरा निकलता है। उदाहरण के तौर पर अगर किसी अस्पताल में 100 बेड है तो उतने से हर दिन 100 से 200 किलो मेडिकल वेस्ट या मेडिकल कचरा निकलता है। इनमें से करीबन 5 से 10 प्रतिशत मेडिकल कचरा घातक और संक्रामक होता है।

इस तरह आंकडो से यह पता चलता है कि 100 बेड वाले अस्पताल से करीबन 5 से 10 किलो बेहद खतरनाक और संक्रामक मेडिकल कचरा निकलता है। इस कचरे में से47 प्रतिशत कचरा जीव चिकित्सा संबंधी होता है। यह कचरा बेहद संक्रामक और रोग फैलानेवाला होता है। इस कचरे में मनुष्यों और पशुओं के अवशेष, गंदा खून, मानव द्रव्य (घाव से निकलनेवाला पस), खून से तरबतर ड्रेसिंग सामग्री (रूई, प्लास्टर, पट्टियां), उपयोग के बाद फेकी जानेवाली चिकित्सा सामग्री, शव परीक्षण का कचरा शामिल है। इस कचरे में खतरनाक जीवाणुं, वायरस और अन्य सूक्ष्म जीव रहते हैं। ये सभी सामग्री इन जीवाणुओं को विकसीत करने में मददगार साबित होते हैं। इस कचरे से रोग उत्पन्न होने का अनुकुल वातावरण बनता है। इस बायो मेडिकल कचरे में रोगों को जन्म देनेवाले एसचेरीशिया, सेलमोनीला, विबरियो हेपेटाइटिस के कीटाणुं सक्रिय रहते हैं। ये कीटाणुं तब तक सक्रिय रहते हैं जब तक की इन्हें उचित तापमान पर जलाकर नष्ट न कर दिया जाए। इन रोगों के कीटाणुं विभिन्न माध्यमों के जरिए दूर दूर तक फैलते हैं। अगर शल्य चिकित्सा और शव परीक्षा का कचरा उपचारित नहीं किया जाता है तो ये बेहद संक्रामक हो सकता है। इस संक्रामक से लोगों को एड्स, वायरल,हेपेटाइटिस, क्षय रोग, स्वासनली शोध, आमाशय एवं आंत की सूजन, त्वचा एवं नेत्र रोग, न्यूमोनिया, अस्थमा, खांसी, दमा, ब्राकाइटिस और फेफडा संबंधी रोग हो सकते हैं।

  • वापी के अधिकांश अस्पताल स्वास्थ्य नियमों का नहीं करते पालन।
  • बायो मेडिकल वेस्ट मामलो में लापरवाही जनता के लिए घातक।
  • अस्पताल से निकले हुए  बायो मेडिकल वेस्ट पर बने सभी नियम केवल कागजो में।

वापी के अधिकांश अस्पताल भारत सरकार द्वारा जारी बायो मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रूल्स 1998 एक्ट का पालन नहीं करते। यह एक्ट उन सभी संस्था और लोगों पर लागू होता है जो बायो मेडिकल कचरे को इकठ्ठा करने, उत्पन्न करने, प्राप्त करने, ट्रांसपोर्ट करने, डिस्पोजल करने या उससे संबंधित डीलिंग करते हैं। ये नियम सभी अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लिनीक, डिसेंपसरी, पशु संस्थान, पेथलोजीकल लेब और ब्लड बैंक पर लागू होता है। इन सभी संस्थानों को बायो मेडिकल वेस्ट, मेडिकल कचरे को ट्रीट करने के लिए अपने संस्थानों में आधुनिक उपकरण और मशीने लगानी जरूरी होती है। इन सबके पास में कचरे के निराकरण के लिए उचित व्यवस्था का प्रमाणपत्र भी होना चाहिए। अगर किसी के पास यह प्रमाणपत्र नहीं मिलता है तो अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है। पर अभी तक देखा गया है कि वापी के किसी भी अस्पताल का अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द नहीं हुआ है। हालांकि वापी के अधिकांश अस्पताल स्वास्थ्य डिस्पोजल नियम का पालन नहीं करते हैं।

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वापी के अधिकांश छोटे क्लिनीक अपने मेडिकल वेस्ट को दीवाल के पीछे या जहा जगह मिले फेंकते हैं। कुछ क्लिनीक अपने कचरे को सड़क के किनारे फेक देते हैं और कुछ क्लिनीक अपने मेडिकल वेस्ट को कचरेवाले को दे देते हैं। कुछ अस्पताल बायोमेडिकल वेस्ट को खुले में फेंक देते हैं। कुछ अस्पताल गड्ढा खोदकर इसे गडा देते हैं। कुछ अस्पताल ढेर सारा मेडिकल वेस्ट होने पर जला देते हैं। जबकि ये सभी चीजें स्वास्थ्य नियमों के विरूद्ध है।

बायो मेडिकल वेस्ट कैसे किया जाना चाहिए नष्ट

अस्पतालों में बायो मेडिकल वेस्ट को नष्ट करने की पांच प्रक्रिया होती है। जिसमें सेग्रीगेशन, डिस ईन्फेक्शन, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट और फाइनल डिस्पोजल शामिल है।

सेग्रीगेशन :-

इस प्रक्रिया में अस्पताल से निकलनेवाली अवशिष्ट पदार्थों को अलग अलग रंग के थैले में डाला जाता है। ताकि सभी का निस्तारण अच्छी तरह से हो सके। ये सेग्रीगेशन पीले, लाल, नीले या सफेद, काले रंग के थैले में किया जाता है।

पीला:- पीले रंग के थैले में सर्जरी से कटे हुए हिस्से, लेब से निकले हुए सेम्पल, खून से सनी हुई मेडिकल सामग्री जैसे रुई, पट्टी और एक्सरीमेंट में उपयोग किए गए जानवरों के अंग डाले जाते हैं। इन सभी पदार्थों को उचित तापमान में जलाकर नष्ट किया जाता है या बेहद गहराई में दबाया जाता है।

लाल:- लाल रंग के थैले में चिकित्सा में उपयोग आनेवाले दस्ताने, कैथेटर, आई.वी.सेट, कल्चर प्लेट को डाला जाता है। इन सभी सामग्रीयों को सबसे पहले कटिंग की जाती है फिर ऑटो क्लेव से डिस इफेक्ट किया जाता है। उसके बाद ही इसे जलाया जाता है।

नीला या सफेद:- नीले या सफेद रंग के थैले में गत्ते के डिब्बे, प्लास्टिक के बैग, कांच के टुकडे, सुई या चाकू रखा जाता है। इन सभी सामग्रियों को काटने के बाद केमिकल द्वारा ट्रीट किया जाता है फिर इसे जला दिया जाता है।

काला:- काले रंग के बैग में हानिकारक और बेकार दवाईयां कीटनाशक पदार्थ और जली हुई राख डाली जाती है। इन सामग्रियों को गहरे गड्ढे में डालकर उपर से मिट्टी भर दी जाती है।

द्रव्य:- अस्पताल से निकलनेवाला द्रव्य डिसइनफेंट करके नालियों में भर दिया जाता है। डिसइनफेट करने के लिए इस पदार्थ को थर्मल ऑटो क्लेव द्वारा गरम करके नष्ट किया जाता है। इन सामग्रियों में फार्मएल्डीहाइड, ब्लिचिंग पाउडर, एथिलीन ऑक्साइड डालकर नष्ट किया जाता है। अल्ट्रावायोलेट किरणों द्वारा भी किटाणुंओ को नष्ट किया जाता है।

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स्टॉरेज:- जब तक ये रंगीन थैले पूरी तरह से भर न जाए तब तक अवशेष पदार्थो को थैले में भरकर रखा जाता है इन थैलों पर अवशिष्टों का नाम लिखकर पट्टी चिपकाई जाती है। यहां पर एक सिक्युरिटी गार्ड भी रखा जाता है ताकि कोई बाहरी व्यक्ति या कुडा उठानेवाला इसे गलती से ना लेकर जाए। लेकिन वापी में न तो स्टोरेज वाले जगह पर सिक्युरिटी गार्ड की व्यवस्था है। न ही इसके लिए रजिस्टर मेंन्टेन किया जाता है।

ट्रांसपोर्ट:- अवशिष्ट पदार्थों को अस्पताल से बाहर ले जाने के लिए बंद गाडी का उपयोग होना चाहिए। कचरा उठानेवाले सभी कर्मचारियों के हाथों में दस्तानें होने चाहिए इन गाडियों में बायो मेडिकल वेस्ट के अलावा कोई दूसरा कचरा नहीं होना चाहिए। मगर वापी में कोई भी अस्पताल इन नियमों का पालन नहीं करता है।

एक सर्वे के अनुसार वापी के अधिकांश अस्पतालों में लाल, काले, नीले, सफेद, थैलों का इस्तेमाल भी नहीं होता। अस्पताल के बाहर पीले, हरे और काले डिब्बे रखे रहते हैं। जिनमें ये कचरा डाला जाता है। अस्पतालों में कचरे के डिब्बे का उपयोग होता है मगर रंगीन थैलियों का उपयोग नहीं होता। इन थैलियों के जरिए ही कचरे का वर्गीकरण होता है। मगर वापी के सभी अस्पताल सब कचरा एक साथ बोरियो में भर देते हैं। ये कचरा गाडियों में भरकर कहीं भी फेक दिया जाता है। इससे लोगों के स्वास्थ्य को बहुत खतरा है। बायो मेडिकल कचरा नष्ट करने के लिए वापी के कई अस्पतालों के पास इंसीनेटर प्लांट नहीं है। न ही ये अस्पताल लॉग बुक मेंन्टेन करते है।

नगर पालिका के स्वास्थ्य अधिकारी और जिला प्रशासन के स्वास्थ्य अधिकारी इस तरफ ध्यान नहीं देते हैं जिसकी वजह से ये अस्पताल बदस्तूर कचरा यहां वहां ठिकाने लगा देते हैं। लोगों में भी जागरूकता नहीं है कि इस कचरे से उनके स्वास्थ्य को कितना नुकसान हो सकता है। लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है मगर इसे करेगा कौन। अगर स्वास्थ्य अधिकारी वापी के सभी अस्पतालों का अचानक सर्वे करेंगे तो उन्हें कई चौंकानेवाली बात मिलेगी। ज्यादातर अस्पताल स्वास्थ्य मंत्रालय से जारी किए हुए दिशा निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। जिसकी वजह से उस जगह के सभी लोगों को बीमारियों का सामना करना पड सकता है, जहां पर यह कचरा फेंका जाता है।

अब इस पूरे मामले में गुजरात का स्वास्थ्य विभाग एवं संबन्धित अधिकारी क्या कार्यवाही करते है यह तो देखने वाली बात है लेकिन जनता की मांग है की गुजरात के सवास्थ्य विभाग एवं संबन्धित अधिकारियों को सभी अस्पतालो का सर्वे करना चाहिए और स्वास्थ्य संबन्धित मामलो में गठित नियमों की अनदेखी करने वाले अस्पतालो का लाइसेन्स रद्द कर देना चाहिए।