वापी में प्रदूषण फ़ैलाने वाली इकाइयां रक्तदान में सबसे आगे।

हवा में बढ़ते प्रदूषण, फसलों में बढ़ते कीटनाशक और राशयनिक खाद के प्रयोगों, बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं, मच्छरों एवं गंदगी के बढ़ते ढेरों और संक्रामक बीमारियों की वजह से हर शहर में अस्पताल मरीजों से भरे रहते है। अगर आंकड़ो की माने तो बीते पांच सालों में मरीजों की संख्या पहले की अपेक्षा 15% से 20 % ज्यादा बढ़ी है। फिर चाहे वह मामला सड़क दुर्घटना का हो, मलेरिया और डेंगू रोग के फैलाव का हो। बढ़ता जल प्रदूषण हो, बढ़ता वायु प्रदूषण हो या बढ़ता कूड़ा कचड़ा हो। सभी मामलों में बेतहाशा वृद्धि हुई है और यह सभी कारण कही ना कही खून से जुड़े हुए है। सड़क दुर्घटना होगी तो जाहीर है लोगो की जान जाएगी, हात पेर टूटेंगे, ख़ून बहेगा, कचड़ा कूड़ा गंदगी होगी तो मच्छर पैदा होंगे, मच्छर पैदा होंगे तो मलेरिया डेंगू होगा, मलेरिया डेंगू होगा तो लोगो का ख़ून ख़राब होगा, वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण भी कही ना कही किसी ना किसी बीमारी को जन्म देता है और जब बीमारी हो तो ख़ून की जरूरत पड़ती ही है।

वापी में दो ब्लड बेंक, दोनों मिलकर भी हरिया की आपूर्ति पूरी करने में नाकाम!

क्रांति भास्कर ने टेलिफोनिक वार्तालाप करते हुए शहर के जाने माने अस्पताल हरिया हॉस्पिटल से जानकारी मांगी तो उन्होने बताया की हरिया अस्पताल को हर रोज़ 20 से 25 यूनिट ख़ून की जरूरत पड़ती है। शहर में और भी कई बड़े अस्पताल है, मसलन जनसेवा हॉस्पिटल 12 सेंचुरी हॉस्पिटल, उषा हॉस्पिटल, जीवनदीप हॉस्पिटल, दीक्षित हॉस्पिटल, आयुष हॉस्पिटल, लिस्ट काफ़ी लंबी है सभी अस्पतालो का नाम लिखना संभव नहीं है संक्षेप्त में हम यह बता दे की वापी में कई बड़े अस्पताल है, जिनहे हर रोज़ ख़ून की जरूरत पड़ती है। अब अगर हरिया अस्पताल द्वारा बताई गई आवश्यता को आधार बनाया जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा की वापी में प्रतिदिन सेकड़ों यूनिट ख़ून की आवश्यकता पड़ती है।

वापी में महज़ दो ही ब्लडबेंक बताए जाते है, जिसे रोटरी क्लब और लाइंस क्लब चलाते है। रोटरी क्लब न्यूकेम ब्लड बेंक चलता है जबकि लाइंस क्लब श्रीमती पुरीबेन पोपट लाखा ब्लड बेंक चलता है। अगर वर्ष 2018-19 का सत्र देखे तो न्यूकेम ब्लड बेंक ने 42 शिविरो से 2559 यूनिट ब्लड और पुरीबेन पोपट लाखा ब्लड बेंक ने 157 शिविरो से 3580 यूनिट ख़ून इकट्ठा किया। यानि दोनों बल्ड बेंकों ने मिलकर 6039 यूनिट ख़ून जमा किया, यह आंकड़ा क़रीबन 16 यूनिट ख़ून प्रतिदिन का होता है। स्थिति बिलकुल स्पष्ट है शहर के दोनों ब्लड बेंक मिलकर भी हरिया अस्पताल की आपूर्ति नहीं कर पाते, फिर बाक़ी के अस्पताल ख़ून लाते कहा से है?

बीते दिनों वापी में स्थित मंगलम कंपनी में एक रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ, उक्त रक्तदान शिविर में कितने यूनिट रक्त इकट्ठा हुआ यह जानने के लिए मगलम कंपनी से फोन पर संपर्क कर आंकड़े मांगे गए, लेकिन मंगलम कंपनी द्वारा आंकड़े नहीं मिलने पर, वापी के दो ब्लड बेंक न्यूकम ब्लड बेंक और पुरीबेन पोपट लाखा ब्लड बेंक से जानकारी मांगी तो दोनों बल्ड बेंक ने रक्तदान शिविरों की सूची पकड़ा दी। जब दोनों की सूची देखी तो काफी हैरान करने वाली जानकारियाँ सामने आई। उक्त सूची में रक्तदान करने का जिक्र तो था लेकिन कब किसे कितना रक्त ब्लड बेंको द्वारा किसे दिया गया इसका उल्लेख सूची में नहीं मिला। वैसे रक्तदाताओं को यह जानने का पूरा हक़ है की उसके द्वारा किया गया रक्तदान जरूरतमंद आदमी को दिया जा रहा है या उसकी काला बाजारी की जा रही है वही दूसरा सवाल यह भी उठता है जब चेरेटी की जा रही है तो लोगो से खून के पैसे क्यो लिए जाते है? इस सवाल का जवाब जानने के लिए जब ब्लड बेंकों से यह सवाल किया गया तो उन्होने बताया की हम प्रति यूनिट 1130 रुपये चार्ज करते है जो की लेबोरेट्री टेस्ट के लिए है। उक्त दोनों ब्लड द्वारा वर्ष 2018-19 में 6039 यूनिट रक्त जमा किया और प्रति यूनिट क़ीमत के अनुसार 6824070 रुपये होता है अब सवाल यह उठता है कि क्या इन लेबोरेट्री का प्रति वर्ष इतना खर्चा होता है?

ब्लड बेंक की दोनों सूचियों की पड़ताल के बाद पता चला कि शिविरों से जितना खून इकट्ठा हुआ उनमे से 50% से अधिक ख़ून उन कंपनियों द्वारा दिया गया, जिनके सिर शहर के निवासियों की धम्मनियों में 100% ज़हर घोलने का ठीकरा फूटता आया है कही ना कही शहर के निवासियों के ख़ून खराबी के लिए वही कंपनियाँ ज़िम्मेवार है जो हवा में प्रदूषित गैस का ज़हर घोलती है, अब ऐसी कंपनियों द्वारा किए गए रक्तदान शिविर को क्या कहा जाए? अपनी सामाजिक दायित्वों को निभाने की आड़ में समाजसेवा का ढोंग रचाने वाली कंपनियों के कर्ता-धर्ता अपने मजदूरों का ख़ून दान कर पता नहीं कितना पुण्य कमा रहे है? यह तो नहीं पता, लेकिन अगर मजदूर की मज़बूरी पर बात करें तो मजदूर इतने मजबूर और बे-बस दिखाई देते है कि अपनी नौकरियाँ बचाने के लिए अगर मालिक हुक्म दे तो वह अपनी किडनी भी दान कर दे, फ़िर ख़ून क्या चीज़ है।

वैसे लोगो का मानना है कि हरिया हॉस्पिटल शहर का सबसे बड़ा और महंगा अस्पताल है इसकी इमारत में ही न्यूकेम ब्लड बेंक है और इसकी इमारत में ही ब्लड लेबोरेट्री है फ़िर ब्लड टेस्टिंग के चार्चेज महंगे क्यो है? जब हरिया हॉस्पिटल चैरिटी के नाम पर यह सब कर रहा है तो फ़ाइव-स्टार चार्जेज क्यो?

ज्ञात हो की हरिया हॉस्पिटल एक चेरिटेबल हॉस्पिटल है यहां पर लॉजिंग-बोर्डिंग नर्सिंग समेत सारी सुविधाएं है जो किसी स्टार होटलो में होती है इस हॉस्पिटल को समाजसेवी लोग यह सोचकर दान देते है कि यह पैसा गरीबो के काम आएगा, मगर दुर्भाग्य से हरिया हॉस्पिटल गरीबो को कोई राहत देता नहीं दिखाई देता, यह एक ऐसा चेरिटेबल अस्पताल बताया जाता है जहां मामूली सिरदर्द के इलाज की फीस भी पाँच-सौ रुपये से कम नहीं होती, फ़िर इसे हरिया चेरिटेबल हॉस्पिटल क्यो कहा जाता है? हरिया होटल क्यो नहीं कहा जाता?

कंपनी में काम करने वाले मजदूर तो मालिक के हुक्म से डर कर अपनी किडनी भी दान कर दे फिर खून क्या चीज है?

अभी हाल ही में मंगलम कंपनी जो रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ था। इस रक्तदान शिविर में कंपनी के वाइस चेयरमेन मेनेजर और अन्य कर्मचारियों एवं मजदूरों ने रक्तदान किया, लेकिन कंपनी के मालिक नदारद रहे। अब क्या रूखी सुखी खाकर अपना जीवन-बसर करने वाले मजदूरों ने अपनी स्वेच्छा से रक्तदान किया या कंपनी प्रबंधन के फरमान के सामने गरीबी ने दम तोड़ दिया? सवाल कई है और ऐसे ही कई सवालो के जवाब की तलाश जारी है।

वैसे रक्तदान करना यदि कंपनियों की कोई सामाजिक मजबूरी है तो कंपनियों के चेयरमेन, वाइस चेयरमेन और अन्य उच्चअधिकारियों के साथ कंपनी मालिक के परिवार के सदस्यों को सर्वप्रथम रक्त दान करना चाहिए जो रोज़ काजू किस-मीस बादाम खाते है उनका ख़ून अबश्य ही मजदूरों से अधिक स्वस्थ होगा। वैसे हम रक्तदान शिविर करने या करवाने के विरोधी नहीं है रक्तदान करना अच्छी बात है पुण्य का काम है पर सवाल यह है की सामाजिक ज़िम्मेदारी लेने का काम सिर्फ़ मजदूर ही क्यो करें? क्या कंपनियों के मालिकों या उच्चाधिकारियों का कोई फर्ज नहीं बनाता? यदि ऐसा नहीं है तो रक्तदान जैसे शिविरों में कंपनी के मालिक और मालिक के परिवार के सदस्य हिस्सा क्यो नहीं लेते? क्या उनका ख़ून मजदूरों के ख़ून से अधिक क़ीमती है? वैसे यह किस्सा सिर्फ़ एक कंपनी का नहीं है वापी में ऐसी कई कंपनियाँ है जो समय समय पर रक्तदान शिविरों का आयोजन करती रही है और ऐसे आयोजन आगे भी जारी रहेंगे लेकिन यदि इस ख़बर के बाद कंपनी मालिक और मालिको का परिवार भविष्य में होने वाले रक्तदान शिविरों में भाग लेकर रक्तदान करे तो अवश्य ही रक्तदान की सार्थकता बढ़ेगी।

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