सूखा पटेल जनता का नेता है या टपोरियों का?

पिछले अंक में क्रांति भास्कर ने दमन में सूखा पटेल व उनके चेले-चमचो की मनमानी को लेकर जो ख़बर प्रकाशित की थी, तथा उक्त ख़बर में क्रांति भास्कर ने यह बताया था की उक्त मामले की फेहरिस्त काफ़ि लम्बी है तथा क्रांति भास्कर इस मामले में आगे की जानकारी एवं पूरी हकीकत अपने आने वाले अंकों में जनता के सामने लाने का प्रयास करेगी।

अब जब मामला नेता और जनता से जुड़ा है तो यह जानना भी आवश्यक हो जाता है कि नेता किसे कहते है और जनता के प्रति नेता के क्या कर्तव्य होते है? वैसे तो इसकी व्याख्या का कोई अंत नहीं परंतु यदि साधारण भाषा में कहां जाए, तो जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति को जनता अपना प्रतिनिधि और नेता कहती है, और यदि कर्तव्यों कि बात भी साधारण शब्दों में करे तो नेता का पहला कर्तव्य है जन कल्याण कि बात करना, जन कल्याण के कार्य करना, जनता में एकता बनाए रखना, तथा जनता के बेहतर विकास, व्यवस्था तथा रोज़गार हेतु जनता कि आवाज़ सरकार तक पहुंचाना एवं ऐसे अन्य अनेकों जन कल्याण से जुड़े कार्य है जिनहे करने के लिए नेता आगे आता है और जनता उसे अपना प्रतिनिधित्व करने का अवसर देती है और अपना नेता मानती है।

देखिए यह विडियों जिसमे आडवाणी के साथ दिखे थे सूखा पटेल और हुई थी काफि चर्चा…

लेकिन लगता है दमन के नेता सुरेश पटेल शायद इस बात को नहीं मानते, क्यों जिस प्रकार की कार्यशेली और मांहोल कि चर्चा इन दिनों सुरेश पटेल उर्फ सूखा पटेल के नाम और काम को लेकर चल रहा है वह अकप्ल्निय और अचंभित करने वाली है। जिस प्रकार कि चर्चा और माहोल दमन के भीमपोर क्षेत्र में देखने और सुनने को मिल रहा है उसे सुनकर यही लगता है कि जनता से मिली सत्ता और नेता के तगमे की चकचोंध में सुरेश पटेल यह मानने लगे है कि वही सर्वे सर्वा है और उनके द्वारा बनाए गए हर अघोषित नियम और शर्तों को वह अपने दबाव और चेले-चमचो कि मदद और टपोरिगिरी से जनता पर थोपती रहेगी!

डी-आई-ए को करनी चाहिए प्रशासक से यह खास मांगे!

·          दमन ओधोगिक संगठन को आगे आकार प्रशासक से करना चाहिए आग्रह, उधोगों के लिए गुजरात जैसा वातावरण तैयार करने कि जरूरत, पलायन रोकने के लिए, व्यवसाय तथा रोज़गार में टपोरिगिरी से से छुटकारे कि आवश्यकता।  

·          पिछले पांच वर्षों में भीमपोर तथा भीमपोर के आस पास के ओधोगिक क्षेत्रों से, उधोगिक इकाइयों के पलायन का कारण तलाशने हेतु प्रशासन को जमीनी हक़ीक़त पर अपनी पैनी नज़र अखने कि आवश्यकता, आने वाले समय में इकाइयों का पलायन ना हो इस लिए व्यवस्था दुरुस्ती तथा नई योजनाओं कि आवश्यकता।    

लगता है जिला पंचायत में सत्ता मिलने के बाद अब सुरेश पटेल उर्फ “सूखा पटेल” शायद यह समझ रहे है कि उन्हे यह अधिकार भी मिल गया कि वह अपने चेले-चमचो के सहगोग से यह तय करे कि, किस इकाई में कोनसा ठेकेदार ठेका चलाएगा, वह कितना कमाएगा और कितना कमाकर किसे देगा, भंगार किसको मिलेगा, कोन टेम्पो चलाएगा, कोन सिक्योरेटी सर्विस चलाएगा, तथा इकाइयों से जुड़े अन्य मलाईदार कार्य और व्यवसाय कोन करेगा, तथा उक्त प्रबंधन, जनता व मजदूरो कि गाढ़ी कमाई के हिस्से कितने होंगे और किस किस में बटेंगे? वैसे तो बताया जाता है कि सूखा पटेल कि अनुमति तथा स्वीकृति के बिना उक्त उधोगिक क्षेत्र में वह व्यापार नहीं किया जा सकता जिस पर सूखा पटेल तथा सूखा पटेल के नज़दीकियों कि तिरछी नज़र हो, लेकिन यह और बात है कि व्यापार, व्यवसाय तथा रोज़गार पर प्रतिबंध तो नहीं है लेकिन सूखा पटेल के नियम और शर्ते लागू है यदि वह व्यापार और व्यवसाय सूखा पटेल कि लिस्ट में आता है तो उक्त व्यक्ति तथा प्रबंधन को सूखा पटेल के नियम और शर्तों पर खरा उतरना होगा। वैसे तो अधोषित रूप से अब तक इन सारे अधोषित कार्यों को सूखा पटेल तथा उनके चेले-चमचे अंजाम देते रहे है जिनकी जानकारी अब तक प्रशासक श्री पटेल को नहीं है।

जिस जनता ने नेता बनाया, अब उसी जनता की जागीर ख़तरे में!
पंचायत जीतने के बाद अब जनता की जागीर पर सूखा की तिरछी नज़र।

जरा एक नज़र इनकी संपत्ति पर भी…

सुरेश पटेल, केतन पटेल, भरत एवं सूखा पटेल के अन्य सगे-संबंधियों कि संपत्ति इतनी बताई जाती है कि जांच उक्त संपत्ति कि जांच करने के लिए, आयकर विभाग को एक अलग टीम सिर्फ इसी मामले कि जांच के लिए लगानी पड़ेगी!

 

नेतृत्व करने वाले को नेता कहते है…

यहां तो नेतृत्व और नेता के माइने ही बदले हुए दिखाई देते है, जहां एक नेता को जन कल्याण और जनता के विकास के लिए कार्य करने चाहिए, वहां एक नेता अपनी तथा अपने चमचो कि ऐशगाह आबाद करने के लिए अघोषित रूप से अपना ही राज और अपना ही आर्डर अपने मनमाने ढंग से चला रहा है जहां एक और नेता जनता के रोज़गार के लिए लगता है वहीं यहां यह नेता अपने चमचो के रोज़गार के लिए लड़ता दिखाई दे रहा है। एक प्रबुद्ध का कहना है कि वैसे तो नेता जनता कि सुनने के लिए होता है लेकिन यहां तो जनता को नेता कि सुननी पड़ती है नहीं तो जो रोज़गार है वो भी चला जाएगा।

 

सूखा के पास करोड़ों कि संपत्ति कहां से आई?
दमन, परिया, उदवादा, परडी, सूरत, में सूखा पटेल कि कितनी संपत्ति, क्या आयकर विभाग को है इसकी जानकारी ?

दमन कि आम जनता तथा अपनी रोजी रोटी कमाने के लिए अन्य प्रदेशों से दमन में अपनी आजीविका तलाशने आए आम लोग, इस बात कि खुले में चर्चा कर रहे है कि, सुरेश पटेल उर्फ सूखा पटेल, तथा उनके कुछ गिने-चुने ख़ास शागिर्दों को खुश रखे बिना उनके क्षेत्र में काम करना अब धीरे- धीरे मुश्किल होता दिखाई दे रहा है, जनता में यह संशय है कि हमारे कारोबार तो कहीं सूखा पटेल के चेलो-चमचो कि नजर या “लिस्ट” में नहीं है क्यों कि यदि ऐसा है तो उन्हे सूखा पटेल और उनके चेलों कि अधोषित शर्ते माननी पड़ेगी, आखिर ऐसे कोनसे कोनसे व्यवसाय है जिनपर सूखा पटेल और उनके चेले-चमचो कि नज़र है तथा उन व्यवसायों पर सूखा और उनके चमचो कि क्या क्या शर्ते है? हालांकि क्रांति भास्कर के पास उक्त तमाम व्यवसाय तथा अधोषित शर्तों कि फेहरिस्त उपलब्ध है जिन पर सूखा पटेल और उनके चेले-चमचो कि तिरछी नज़र है, लेकिन उक्त फेहरिस्त को जनता के सामेन लाने से पहले फिलवक्त क्रांति भास्कर तथा क्रांति भास्कर कि टीम अपने सूत्रों से उन तमाम फहरिस्तों कि प्रामाणिकता पर अपनी पड़ताल कर रही है, जल्द क्रांति भास्कर उक्त व्यवसाय तथा अधोषित शर्तों की सूची जारी करेगी जिन पर सूखा पटेल और उनके चेले-चमचो कि तिरछी नज़र है। शेष फिर।

जिस तरह से सूखा पटेल अपने और अपने चेले-चमचो के पांव दमन में पसार रहे है उसे देखर लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब एक एक कर दमन-दीव के सभी नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे रह जाएंगे और सूखा पटेल सांसद पद पर अपना दावा कर देंगे! 

पढिए सूखा की टपोरिगिरी पर यह खास ख़बर…  

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