वापी GPCB अधिकारी गज्जर की कमाउनीति का जीता जागता सबूत, दमन गंगा नदी का प्रदूषण!

वापी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों की जितनी तारीफ़ की जाए उतनी कम है। तारीफ़ वापी को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए नहीं, बल्कि औधोगिक इकाइयो को प्रदूषण फैलाने की अनुमति देकर अपनी जेबे गरम करने के लिए! ऐसा इस लिए कहा जा रहा है क्यो की वापी में अपनी लंबी सेवा देने वाले क्षेत्रीय अधिकारी अनिल पटेल के बाद अब नए अधिकारी गज्जर भी उसी राह पर चलते दिखाई दे रहे है जिस राह पर काम कम माल ज्यादा की मंजिल का पता लिखा है!

इतना ही नहीं जैसे पूर्व में अधिकारियों के तबादले के बाद नए क्षेत्रीय अधिकारी से मिलने उधोगपति कतार में खड़े रहते थे वैसा ही मंजर क्षेत्रीय अधिकारी गज्जर के कार्यकाल में भी देखने को मिल रहा है, जैसे ही गज्जर ने कार्यभार संभाला, प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयो के संचालक बिना किसी नोटिस के ही उक्त अधिकारी से भेंट करने इस तरह चले आए, जैसे उन्हे पक्का पता हो की पर्यावरण संबन्धित नियमों से उक्त अधिकारी ही उनकी इकाइयो की रक्षा कर सकता है और पर्यावरण को बर्बाद करने के लिए उनका साथ दे सकता है! वैसे इस प्रकार की चर्चा का एक कारण यह भी है कि वापी जीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी की कुर्सी पर क्षेत्रीय अधिकारी गज्जर के बैठने के बाद ना ही दमन गंगा के प्रदूषण में किसी प्रकार की कमी देखने को मिली ना ही इकाइयो द्वारा आधी रात को छोड़ने वाली गैस में।

कार्यालय के बाहर उधोग्पतियों की कतार और कार्यालय के अंदर गज्जर के साथ थोड़ा सा व्यवहार, दमन गंगा नदी के लिए हानिकारक!  

बात यह है कि इकाइयो द्वारा छोड़े जा रहे प्रदूषित जल एवं गैस पर नियंत्रण रखने, समय समय पर उनके नमूने की जांच करने तथा इकाइयो को नोटिस देने का काम क्षेत्रीय अधिकारी की देख-रेख में में बताया जाता है एवं पर्यावरण संबन्धित मामलो में इकाइयो से लिए गए नमूनो पर क्या कार्यवाही करनी है और कैसी रिपोर्ट बनानी है यह सब क्षेत्रीय अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में बताया जाता है। ऐसे में यदि उधोगों को मनमाना प्रदूषण फैलाने की छूट प्राप्त करनी हो तो वह छूट गज्जर के अलावे कोई और नहीं दे सकता, अब इस प्रकार की छूट का बाजार में मोल-भाव क्या है इसकी खोज-बीन क्रांति भास्कर की टीम कर रही है।

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मुख्यमंत्री तथा गृह मंत्री को जाने वाली शिकायते भी इस विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली नहीं बदल सकी!

बढ़ता प्रदूषण वैसे तो एक आम समस्या हो चुकी है लेकिन इस समस्या से जन-जीवन पर कितना दुष्प्रभाव पड़ता है तथा स्वास्थ्य को कितनी हानी होती है इसका अंदाजा चंद शब्दो में बयां करना बा-मुश्किल है। देखने वाली बात यह है कि हानिकारक प्रदूषण दिखाई भी देता है और महसूस भी होता है, लेकिन इसके एहसास से कोई नांक बंद कर लेता है तो कोई मुंह बंद, लेकिन उसका असर उसके बाद भी पीछा नहीं छोड़ता।

वापी में कई ऐसे बड़े उधोग है जिनके द्वारा छोड़े गए प्रदूषित जल एवं गैस से जनता परेशान देखी गई। दमन गंगा नदी में छोड़े जाने वाले प्रदूषित जल तथा रात को आसमान में छोड़ी जाने वाली गैस को देखकर लगता है की वापी की प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयो को वापी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा कोई विशेष छूट मिली हुई है और शायद उसी छूट के चलते वापी की इकाइयो ने अब तक ना ही दमन गंगा को प्रदूषित करना बंद किया और ना ही वायु प्रदूषण को। ऐसा नहीं है की जीपीसीबी के अधिकारियों को प्रदूषण संबन्धित मामलो में, जनता की परेशानियों के बारे में जानकारी नहीं है, जानकारी है और जनता से अधिक जानकारी है। वापी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी गज्जर के साथ साथ गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को भी जनता की परेशानियों की जानकारी है और वह प्रदूषण संबन्धित तमाम समस्याओ से भलीभाँति परिचित भी है, लेकिन इसके बाद भी प्रदूषण की समस्या से जनता को कोई राहत नहीं मिल पाने से जनता अब यही अंदाजा लगा रही है की वापी जीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी ने प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयो के हाथो अपना ईमान कितने में बेचा? यह सवाल कोई नया नहीं है वापी जीपीसीबी की इस कुर्सी पर बैठने वाले कई अधिकारियों पर ऐसे सवाल होते रहे है कई अधिकारियों की तो शिकायत मुख्यमंत्री और गृह मंत्री तक को की गई लेकिन उक्त तमाम शिकायतों ने भी लगता है जनता के लिए सवाल का रूप ले लिया, फिलवक्त यह सवाल भले-ही गज्जर जैसे अधिकारियों को खले लेकिन गुजरात प्रशासन के लिए यह सवाल तब तक कायम रहेगा जब तक जनता को किसी जांच के जरिए इस सवाल का सही जवाब नहीं मिल जाता।

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प्रदूषण से त्रस्त जनता शिकायते भी करती है लेकिन गज्जर तो फिर गज्जर है अशिक्षित तथा गरीब जनता के शिकायते भी गज्जर के लिए चेक का काम कर जाती है अब आप सोच रहे होंगे की यह कैसे होता है तो इस पर भी विस्तार में किसी और अंक में चर्चा करेंगे फिलवक्त पुनः पर्यावरण एवं बढ़ते प्रदूषण पर बात करते है। वैसे एक बात और भी है और वह यह है कि, अधिकतर मामलो में देखा जाता है की सालो तक नियमो को धतता बताने के बाद, कभी किसी एक मामले में अधिकारी प्रशासन की जांच के चुंगुल में फँसता है। लेकिन अधिकारी गज्जर ने तो आते ही दमन गंगा नदी के प्रदूषण का जीता जागता सबूत देकर अपनी कार्यप्रणाली के बारे में जनता और प्रशासन दोनों को खुली चुनौती दे डाली है। अब इस पर प्रशासन उक्त अधिकारी पर क्या कार्यवाही करती है यह तो गुजरात प्रशासन पर निर्भर करता है लेकिन जनता की यह मांग है की शिकायतों के ढेर का इंतजार किए बिना ही उक्त अधिकारी के कार्यकलापों एवं कमाउनीति की तत्काल जांच करें। शेष फिर।