कमेटी कि रिपोर्ट से कई बड़ी इकाइयों के नाम गायब!

औधोगिक इकाइयों कि चिमनियों से निकलता हुआ जहरीला धुआँ, नदियों में केमिकल युक्त प्रदूषित पानी ओर इकाइयों द्वारा जमीन पर फ़ेंका गया सोलिड वेस्ट तो सभी ने देखा होगा, लेकिन अब प्रदूषण से होने वाले नुकसान के बारे में भी जान लीजिए। प्रदूषण संबन्धित मामलो में समय समय पर सर्वे होते रहे है, कई रिपोर्टे सामने आती रही है, लेकिन सवाल यह है कि उन तमाम रिपोर्टों के बाद क्या सबक लिया गया? वर्ष २०१७ में, मेडिकल जरनल ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित एक अध्य यन की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि भारत में हर एक मिनट में दो लोगो कि जान जाती है। २०१९ में अमेरिका स्थित हेल्थ इफेक्ट इंस्टीट्यूट (एचईआई) और इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवेल्यूएशंस (आईएचएमई) की ओर से जारी स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर, २०१९ रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वायु प्रदूषण के कारण २०१७ में १२ लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई है। अब यदि इन आंकड़ों को आधार मानकर सवाल करे तो सबसे पहला सवाल यह होगा कि जो जाने गई क्या वह वापस आ सकती है? जवाब होगा नहीं। तो फिर सवाल यह उठता है कि जिस नुकसान कि भरपाई हो ही नहीं सकती उस नुकसान के लिए छूट क्यो?

पर्यावरण के नियमों के साथ उलंधन कर पर्यावरण को हानी पहुंचाने का मतलब है जनजीवन को हानी पहुंचाना। पर्यावरण नियमों में एक नियम ऐसा भी है जिसमे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले को आर्थिक दण्ड के साथ कारावास का भी दण्ड रखा गया है, लेकिन क्या कभी किसी इकाई के संचालक को पर्यावरण को हानी पहुंचाने पर कारावास का दंड दिया गया?

पर्यावरण की बढ़ती समस्या का एक कारण यह भी है कि भारत में प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों कि तदात, पर्यावरण प्रेमियों कि तुलना में काफी आधिक है। इसका यह मतलब नहीं है कि प्रदूषण के लिए पर्यावरण प्रेमी शिकायत नहीं करते, पर्यावरण प्रेमी जब भी इकाइयों के प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए स्थानिय अधिकारियों से शिकायते करते है तो उधोगपतियों से लेकर, सरकारी अधिकारियों तक उक्त पर्यावरण प्रेमी का साथ देने की बजाय उसे ऐसे आंखे दिखाने का काम करते है जैसे कि वह प्रदूषण पर नहीं बल्कि प्रदूषण फैलाने वाली इकाई तथा अधिकारियों कि आम्दानी पर प्रतिबंध की मांग कर रहा हो। अधिकारियों को लगता है कि प्रदूषण कि शिकायत करने वाला एक आम आदमी न्यायालय या एनजीटी में तो याचिका दायर करने से रहा, लेकिन अभी कुछ समय पहले आर्यावरत फाउंडेशन द्वारा, एनजीटी में दायर याचिका ओर याचिका पर एनजीटी के आदेश ने एक बार फ़िर यह साफ कर दिया कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले पर कठोर से कठोर कार्यवाही की जाएगी।

किसी भी इकाई का निरक्षण किए बिना बनी २४४ पेज कि रिपोर्ट।

सीईटीपी का तो विजिट किया लेकिन कमेटी के पास प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों कि विजिट के लिए टाइम नहीं है। जीपीसीबी ने कमेटी को डिफ़ाल्टर कंपनियों कि लिस्ट दी, लिस्ट के हिसाब से रिपोर्ट बनी। मतलब जीपीसीबी के अधिकारी ने प्रदूषण फैलाने वाली इकाई से पैसे लेकर इकाई को क्लोज़र ही नहीं दिया होगा, तो उसका डिफलटर लिस्ट में नाम भी नहीं होगा, ओर जब डिफ़ाल्टर लिस्ट में नाम ही नहीं तो कमेटी को कैसे पता चलेगा कि किस इकाई का प्रदूषण अधिक है ओर किस इकाई पर कितना जुर्माना लगाना है?

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आर्यावरत फाउंडेशन द्वारा, वापी कि औधोगिक इकाइयों द्वारा छोड़े जाने वाले प्रदूषण पर एनजीटी में एक याचिका दायर कि गई थी, याचिका पर सुनवाई करते हुए दिनांक ११-०१-२०१९ को एनजीटी ने २४ पन्ने का आदेश जारी कर, लगातार प्रदूषण फैलाने और क्लोजर वाली बड़ी कंपनियों को १ करोड़, मध्यम स्केल इंडस्ट्रीज को ५० लाख और लघु उद्योगों को २५ हजार जुर्माना करने का आदेश दिया था, एनजीटी ने प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों पर कुल १० करोड़ का जुर्माना लगाया था, साथ ही एक कमेटी गठित कर, प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों तथा सीईटीपी एवं दमण गंगा नदी पर रिपोर्ट तैयार कर एनवायरमेंट कंपनसेसन की काउंटिंग करने का आदेश भी दिया था। दिनांक ११-०१-२०१९ को एनजीटी द्वारा जारी २४ पन्ने वाला आदेश अवश्य एक बार पर्यावरण प्रेमियों को पढ़ना चाहिए।

एनजीटी के आदेश के बाद पांच सदस्यों कि कमेटी गठित हुई जिसमे (IIM) प्रोफ़ेसर अनीश सुगाथन, (IIT) चिन्मय घोरोई, (NEERI) एम कार्तिक, (GPCB) बी आर गज्जर, (CPCB) प्रतीक भारने, इन पाँच सदस्यों द्वारा दिनांक ०९-०५-२०१९ को एनजीटी के समक्ष २४४ पेज कि रिपोर्ट पेश कि गई। २४४ पेज़ कि इस रिपोर्ट में, कमेटी ने, एनवायरमेंट कंपनसेसन की काउंटिंग, औधोगिक इकाइयों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण, दमण गंगा नदी के नुकसान का मूल्यांकन, मरम्मत की लागत, इकाइयों तथा सीईटीपी कि जवाबदेही तथा देयताएं के साथ यह भी बताया है कि अब तक वापी कि प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों तथा वापी सीईटीपी के प्रदूषण से दमण गंगा नदी को कितना नुकसान हुआ। एनजीटी ने जहां पूर्व में १० करोड़ का जुर्माना लगाया था वही उक्त रिपोर्ट में ( River Restoration Programme ) के लिए अनुमानित लागत ७३१ से ७५१ करोड़ बताई गई है। २४४ पेज कि इस रिपोर्ट में प्रदूषण फेलाने वाली इकाइयों के नाम, क्लोज़र कि दिनांक, रिवोकेशन की दिनांक के अलावे भी कई जानकारियों पर प्रकाश डाला गया है। उक्त रिपोर्ट भी अवश्य एक बार पर्यावरण प्रेमियों को पढनी चाहिए।

२४४ पेज़ वाली रिपोर्ट देखकर लगता है या तो अब तक जीपीसीबी के अधिकारी निंद्रा में थे या फिर सबकुछ जानते बुझते प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों से पैसे लेकर, दमण गंगा का नाश देखते रहे।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद क्रांति भास्कर के प्रधान संपादक ने, कमेटी के सदस्य (ण्झ्ण्ँ) प्रतीक भारने से बात कि ओर उक्त मामले में कुछ सवाल भी किए गए। पहला सवाल यह किया गया कि उक्त रिपोर्ट में, आरती, हुबर, बायर, यूपीएल, आलोक, वेल्सपन, जैसी प्रदूषण फैलाने वाली बड़ी इकाइयों नाम क्यो नहीं है? कमेटी के सदस्य प्रतीक भारने (ण्झ्ण्ँ) ने बताया कि जीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी गज्जर ने कमेटी को डिफ़ाल्टर इकाइयों कि सूची दी तथा उक्त रिपोर्ट जीपीसीबी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर बनाई गई है। इस पर एक सवाल यह उठता है कि वापी जीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी गज्जर यदि कमेटी को उन इकाइयों की जानकारी ना दे जो अत्याधिक प्रदूषण फैलाने के लिए बदनाम है तो फिर कमेटी उन इकाइयों कि जानकारी कैसे हासिल करेगी, मामले में रिपोर्ट कैसे बनाएगी ओर एनजीटी के सामने पूरा सच कैसे आएगा? खेर इन सवालो के बारे में अब कमेटी को सोचना चाहिए क्यो कि अभी भी कमेटी कि जांच जारी है।

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पीडीलाइट, मिकास ओर्गेनिक, अमोली ओर्गेनिक जैसी कंपनियों को जीपीसीबी द्वारा क्लोज़र देने के बाद एEघ्AA का क्लियरेंस कैसे मिला?

०९-०५-२०१९ को एनजीटी के समक्ष २४४ पेज कि रिपोर्ट पेश करने के बाद, दिनांक १३-०५-२०१९ को एनजीटी ने कमेटी को पुनः एनवायरमेंट कंपनसेसन की काउंटिंग करने का आदेश दिया है, ०९-०५-२०१९ को एनजीटी के समक्ष २४४ पेज कि जो रिपोर्ट पेश कि गई थी उस रिपोर्ट में एक वर्ष के आस पास की अवधि का हिसाब किया गया, अब एनजीटी ने पाँच वर्षों का हिसाब-किताब (एनवायरमेंट कंपनसेसन की काउंटिंग) लगाने को कहा है ओर इसके लिए एनजीटी ने कमेटी को २ माह का समय दिया है। कमेटी अपने काम में लग गई है जानकारी मिली है लगभग २४४ कंपनियों को नोटिस जारी किया गया है ओर आने वाले समय में उन पर भी बड़ा जुर्माना लगाया जा सकता है।

वैसे उक्त पूरे मामले कि बारीकी से पड़ताल करने के लिए कमेटी को चाहिए कि वह इस बात की भी बारीकी से जांच करें कि पिछले पाँच साल में टोटल कितने क्लोज़र दिए गए, जिन इकाइयों को क्लोज़र दिए गए उनके नाम क्या है? टोटल कितने रिवोकेशन किए गए, जिन इकाइयो के क्लोज़र को रिवोक किया गया उन इकाइयों के नाम क्या है? टोटल कितनी इकाइयों का निरक्षण किया गया? जिन इकाइयों का निरक्षण किया गया उन इकाइयों का नाम क्या है? टोटल कितनी इकाइयों से नमूने लिए गए, जिन इकाइयों से नमूने लिए उन इकाइयों के नाम क्या है? कुल कितनी डिफलटर यूनिट को इन्वायमेंट क्लियरेंस दिया? जिन इकाइयों को जीपीसीबी नोटिस दे रहा है, क्लोज़र दे रहा है जुर्माना लगा रहा है, उन इकाइयों को, विस्तार, एक्सपानसन के लिए इनवायरमेंट क्लियरेंस कैसे दिया जा सकता है? इस सवालो के आलावे कमेटी को चाहिए कि वह गुजरात सरकार तथा एनजीटी से, वापी जीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी तथा जीपीसीबी के अन्य कर्मचारियों की सीबीआई जांच हेतु शिफारिश करे। क्यो कि वापी जीपीसीबी के अधिकारियों कि स्वीकृति ओर संरक्षण के बिना, वापी कि इकाइयों का पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना मुमकिन नहीं, इस लिए वापी जीपीसीबी के किस अधिकारी ने, प्रदूषण फैलाने वाली किस इकाई से, प्रदूषण फैलाने की खुली छूट देकर, कितनी काली कमाई की इसका पता लगाने के लिए उक्त विभाग से संबन्धित सभी अधिकारियों की सीबीआई से जांच करवानी चाहिए। शेष फ़िर।

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